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पुस्तक समीक्षाः लोक कला का कथानक

लेखक ने सदियों से चली आ रही इस मिथिला चित्रकला के आधुनिक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पर भी पुस्तक में काफी सामग्री दी है
मिथिला चित्रकला का सिद्धांत

राकेश कुमार झा की यह शोध-पुस्तक ‘मिथिला चित्रकला का सिद्धांत’ सीधे शब्दों में मिथिला चित्रकला का व्याकरण है। यहां प्रश्न उठता है कि क्या लोक को किसी नियम में बांधा जा सकता है? लोक तो वह बहती हुई धारा है, जिसे हम किसी व्याकरण में नहीं बांध सकते। वास्तव में आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, जिसमें सदियों से चलती आ रही आस्था वैज्ञानिकता के नाम पर खंडित हो रही है, हम लोक-परंपरा को एक खुली धारा के रूप में बचाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। पिता से पुत्र को तथा सास से बहू को मिलने वाली जो संस्कृति की थाती कुछ दशकों तक लोक-परंपरा को बचाए रखने में भूमिका निभाती थी आज बिखर गई है। नए-नए कलाकार बाजार के नाम पर लोक-कला को काफी तेजी के साथ सुविधानुसार विकृत करने पर तुले हुए हैं। ऐसे में परंपरा के अपने मूल रूप में बचा पाने में यह पुस्तक कहां तक सफल हो पाएगी ये भविष्य की बात है पर इस विषय पर लिख कर मिथिला की लोक सांस्कृतिक चित्रकला का मिथिला से संबंध को टूटने से बचाने में लेखक जरूर सफल हुआ है। अतः आज लोक को बचाने के लिए उसके मूल स्वरूप का प्रतिलेखन आवश्यक हो गया है।

इसी आवश्यकता को यह पुस्तक पूरा करती है। प्राचीन विदेह जनपद जो आज सांस्कृतिक मिथिला के रूप में उत्तर बिहार के जिलों में तथा नेपाल में फैली हुई है, चित्रकला के क्षेत्र में अपनी भारतीय स्तर पर पहचान रखती है। तिब्बत की थंका पेंटिग की मूलभूत शैली भी हम इसमें पाते हैं। रेखा, बिंदु, त्रिकोण, कमल की पत्तियां, वनस्पतियों तथा ग्रहों के रैखिक संकेत के माध्यम से आध्यात्मिक रहस्य को अपने अंदर समेटती हुई यह चित्र शैली सदियों से जन-जीवन में घुली-मिली रही हैं। नई बहू के लिए बने कक्ष में बांस, कमल, मछली आदि का चित्र हमें सुखद वैवाहिक जीवन के संदेश देते हैं, तो चावल के पीठा और सिंदूर से मिट्टी पर बने ‘अरिपन’ के बिना किसी देवता की पूजा नहीं हो सकती है। तंत्र में वर्णित रहस्यमय यंत्रों को अरिपन के रूप में परंपरागत विधि से चित्रित करना इसका एक अभिन्न अंग है। इसका अपना एक शास्त्र है, व्याकरण है। त्रिभुज का शीर्ष यदि नीचे की ओर होगा तो वह शक्ति का प्रतीक योनि है और ऊपर की ओर होगा तो शिव का प्रतीक लिंग है। दोनों का संयोग शिव-शक्ति का योग षट्कोण बनाया जाता है। इसके बन जाने के बाद हमें देखने में कोई अंतर नहीं लगेगा, पर पहले योनि का रेखांकन होगा या लिंग का, इसके भेद से भी अरिपन के उपयोग में अंतर आ जाता है। यदि इसका ध्यान कलाकार नहीं रखेंगे तो वह अशुद्धि मानी जाएगी। इन विधानों का ज्ञान कलाकार के लिए आवश्यक है। यह पुस्तक मिथिला चित्रकला के पीछे के ऐसे ही लोक ज्ञान परंपरा के दस्तावेजीकरण का सफल प्रयास है।

लेखक ने सदियों से चली आ रही इस मिथिला चित्रकला के आधुनिक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पर भी पुस्तक में काफी सामग्री दी है। बिहार में 1934 ईस्वी के भूकंप के बाद राहत कार्य के सिलसिले में यूरोपीय कलाप्रेमियों की दृष्टि इस लोक-चित्रकला पर पड़ी तथा देश-विदेश के कला-समालोचकों ने इस पर काम किया। आज यह चित्रकला एशियाई देशों में अपना विशिष्ट स्थान बना चुकी है। ‘मधुबनी पेंटिंग’ के नाम से इसे जी.आइ. टैग भी मिला हुआ है। व्यापारिक स्तर पर इस शैली में की गई चित्रकारी के साथ नए-पुराने परिधान बाजार में बेचे जा रहे हैं। पर बाजार जनित दोषों से बड़ी ही तेजी से ग्रसित हो रही इस कला को संरक्षित करने के लिए ऐसी स्थिति में यह पुस्तक बारीकियों के साथ पढ़ना अपेक्षित हो गया है। लेखक ने भित्ति-चित्र, भूचित्र, देहचित्र, तथा तंत्र-चित्र इन चार भागों में पूरी पुस्तक को बांट कर सामान्य सिद्धांतों का विवेचन किया है। भविष्य में इन प्रत्येक खंड पर विस्तृत विवेचन की आवश्यकता होगी।

 

मिथिला चित्रकला का सिद्धांत

राकेश कुमार झा

प्रकाशक | एमएसए फाउंडेशन, मधुबनी 

पृष्ठ:162 | मूल्य: `551