जेल में सुबह बहुत जल्दी शुरू हो जाती है, लेकिन उसमें आजादी का एहसास नहीं होता। बाकी अरोपियों की तुलना में मुझे जमानत देर से मिली। जब मुझे रिहा किया गया, तो खुशी में थोड़ा गम घुला हुआ था क्योंकि दो सह-आरोपी सुरेंद्र और रमेश मुझे सिर्फ गेट तक छोड़ने ही आ सके। मैंने जी.एन. साईबाबा के लिए आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी थी। वे मेरे सहकर्मी थे, जिन्हें गलत तरीके से गिरफ्तार कर उनका नाम माओवादियों के साथ जोड़ा गया। जेल से बाहर आने के अठारह महीने बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। जब मैंने जाति और आरक्षण के मुद्दे उठाने शुरू किए, तो मेरे लिए एक्टिविज्म स्वाभाविक रास्ता था। लेकिन कई बार इसकी सबसे ज्यादा मार परिवार पर पड़ती है। मेरी बेटी मजबूत दिखने की कोशिश करती थी, लेकिन उसे घबराहट के दौरे पड़ते थे। उसने मुझसे कहा था कि जेल में ऐसा कुछ न करूं, जो मेरी अंतरात्मा को स्वीकार न हो। उसने कहा था, “आप निर्दोष हैं।”
2020 में गिरफ्तारी के बाद मुझे कोविड हो गया और उसी दौरान आंखों में संक्रमण हो गया। मेरी स्थिति बहुत खराब हो गई। अगर मेरी पत्नी और मेरे वकील न होते, तो शायद मैं जिंदा बाहर न आ पाता। जेल में बीमार होने पर किस्मत पर भरोसा करना पड़ता है। मरीज पूरी तरह स्टाफ की दया पर होता है। इसलिए मैं कहता हूं कि मेरा जिंदा बाहर आना चमत्कार है। हमने जेल में जो चिकित्सीय लापरवाही झेली है, उसका सही आकलन होना बाकी है। कुछ महीनों बाद मेरी एक सर्जरी होने वाली है।
हमने पहले ही बहुत कुछ झेला है। फिर घर ढूंढने के नाम पर हमें जेल के बाहर एक और बड़ी जेल का सामना करना पड़ा। नए शहर में जगह ढूंढना अपने आप में मुसीबत है। तलाश सिर्फ छत की नहीं, बल्कि ऐसी जगह की होती है, जहां आपको घुसपैठिया न समझा जाए। हैरानी की बात है, जेल में हुई कुछ जान-पहचान वालों के जरिये ही मुझे रहने की नई जगह मिली। सच में जिंदगी सबसे अप्रत्याशित जगहों पर रिश्ते बनाती है। दिल्ली में मेरा पहले से ही एक घर है, मेरी मां केरल में रहती हैं और अब यहां यह मेरा तीसरा ठिकाना है। कागज पर देखने में सब अच्छा दिखता है, लेकिन असलियत में लगता है, जैसे हम नक्शों पर बिखरे पड़े हैं। आर्थिक सुरक्षा होने की वजह से मैं अपना ठिकाना बदल पाया, वरना मैं भी उन बहुत से लोगों की तरह सड़कों पर होता जिन्हें रहने के लिए कोई जगह नहीं मिलती।
अदालत का आदेश है कि मुझे मुंबई में रहना होगा, लेकिन एक अनजान शहर में अपने लोगों को कहां ढूंढना है, यह कोई नहीं बताता। कानूनी आदेश से अपनापन नहीं आ सकता। हर सीढ़ी जिस पर मैं चढ़ता हूं, हर मकान मालिक जिससे मैं बात करता हूं, मुझे याद दिलाता है कि मैं एक ऐसे अतीत के साथ आया हूं, जिसे कोई छूना नहीं चाहता। पड़ोसियों की तिरछी निगाहें, शिष्टतापूर्ण दूरी और ऐसे सवाल जो कभी सीधे नहीं पूछे जाते। हमारी एजेंसी इस मामले की जांच करने वाली कोई साधारण एजेंसी नहीं थी, यह एक राष्ट्रीय एजेंसी थी और यह पहचान किसी भी सजा से ज्यादा समय तक आपका पीछा करती है।
मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्होंने मेरे घर पर छापे के तुरंत बाद, मेरी गिरफ्तारी से पहले ही, मेरा नंबर डिलीट कर दिया था। मैं उन्हें दोष नहीं देता, डर संक्रामक होता है। सबसे बड़ा झटका मेरी मां को लगा। वे आज तक मुझसे मिल नहीं पाई हैं। यात्रा करने के लिहाज से वे बहुत बूढ़ी हैं। यह बेबसी मुझे उन वर्षों से भी ज्यादा चुभती है, जो मैंने अंदर बिताए। आजादी का मतलब दुनिया का विस्तार होना चाहिए, लेकिन मेरी दुनिया उस कोठरी से भी छोटी हो गई है, जिसे मैं पीछे छोड़ आया हूं। मुझे नहीं पता कि मैं फिर से कब पढ़ा पाऊंगा। फिर भी मुझे जेल जाने का कोई पछतावा नहीं है। बाहर से यह क्रूर लगता है, जो कि कई मायनों में है भी लेकिन अंदर आपको ठहरकर सोचने और जिंदगी को उसके सबसे मूल रूप में अनुभव करने का समय मिलता है। मैंने विरोध किया था, बोला था, लिखा था। लेकिन खुद जेल के अंदर होना अलग अनुभव था। फिर भी मैं यह नहीं कहूंगा कि जेल के अंदर या बाहर मेरा ही कष्ट सबसे ज्यादा रहा है। यह जाति व्यवस्था की तरह है, आप चाहे कितने ही नीचे क्यों न हों, आपसे नीचे कोई न कोई हमेशा होगा, पीड़ा के साथ भी यही सच है।
(1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में हिंसा भड़क गई थी। वहां मौजूद एल्गर परिषद के वक्ताओं से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में पूछताछ की गई और कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था।)