अनदेखे रोमांच के चलते हमारी सड़क यात्रा लंबी हो जाए, तो शायद हममें से कई लोग उत्साहित हो उठेंगे लेकिन यात्रा अगर धरती से बाहर के अंतरिक्ष की हो और ऐसा हो जाए तब? नासा के अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर ऐसी ही अप्रत्याशित नौ महीने लंबी अंतरिक्ष यात्रा के बाद बीते 18 मार्च को धरती पर लौट आए। दोनों फिलहाल स्वास्थ्य बहाली कर रहे हैं जबकि दुनिया भर के लोग उनके अनुभवों को सुनने के लिए सांस रोके इंतजार कर रहे हैं।
अल्फोंसो क्वारोन की फिल्म ग्रैविटी (2013) के किरदार डॉ. रायन स्टोन (सांड्रा बुलक) की बात उधार लें, तो उनके पास निश्चित रूप से ‘‘सुनाने के लिए एक शानदार कहानी’’ होगी। घटनाओं का अप्रत्याशित सिलसिला जिसके कारण नासा की जोड़ी अंतरिक्ष में फंस गई, स्वाभाविक रूप से इस साइ-फाइ थ्रिलर की याद दिलाता है जिसने 86वें अकादमी पुरस्कार समारोह में सात पुरस्कार जीते थे।
ग्रैविटी में डॉक्टर रायन स्टोन और मैट कोवाल्स्की (जॉर्ज क्लूनी) को हबल स्पेस टेलिस्कोप ठीक करने के लिए ‘एक्सप्लोरर’ नाम के स्पेस शटल में अंतरिक्ष में भेजा जाता है। अंतरिक्ष में प्रवास के आठवें दिन जब वे टेलिस्कोप की मरम्मत कर रहे होते हैं, ग्राउंड कंट्रोल उन्हें सूचित करता है कि मलबे का एक बादल तेज रफ्तार से उनके करीब आ रहा है। इसके बाद खून जमा देने वाली घटनाओं का एक ऐसा सिलसिला है जहां हर पल स्टोन और कोवाल्स्की की जिंदगी का आखिरी पल लगता है। स्टोन अंततः पृथ्वी पर लौट आती है लेकिन कोवाल्स्की वापस नहीं आ पाता।
फिल्म के अधिकांश हिस्से में स्टोन का संघर्ष दिखाया गया है। बिलकुल इसी तर्ज पर विलियम्स और विल्मोर को भी अंतरिक्ष में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा। उनका मिशन धरती की निचली कक्षा की यात्रा के लिए बोइंग कंपनी के अंतरिक्ष कैप्सूल स्टारलाइनर का परीक्षण करना था। इसका मकसद निजी कंपनियों के बनाए अंतरिक्ष यानों से अंतरिक्ष की व्यावसायिक यात्रा का दायरा बढ़ाना था। वे जिस लक्ष्य पर काम कर रहे थे, उसमें नासा के अंतरिक्ष स्टेशन की जगह धरती की निचली कक्षा में निजी कंपनियों के स्टेशनों को स्थापित करना है ताकि नासा अब चंद्रमा और मंगल ग्रह के अभियानों पर अपनी ऊर्जा लगा सके।
स्टारलाइनर कैप्सूल के पहले निर्धारित लॉन्च से ही इसमें कई गड़बड़ियां सामने आईं। दोनों अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में तो सफलतापूर्वक पहुंच गए लेकिन कैप्सूल में बार-बार आई गड़बडि़यों ने उनकी वापसी को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया। 28 जून, 2024 को जब वे अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर थे, उन्हें आगाह किया गया कि एक टूटे हुए रूसी उपग्रह का मलबा स्टेशन से टकरा सकता है। ग्रैविटी में भी स्टोन और कोवाल्स्की के शटल पर रूसियों द्वारा निष्क्रिय किए गए एक उपग्रह के मलबे का हमला हुआ था।
फिल्म की शुरुआत में ही कोवाल्स्की ग्राउंड कंट्रोल को बताता है कि उसे ‘‘इस मिशन के बारे में कुछ बुरा आभास हो रहा है।’’ यह सुनते ही दर्शक भी किसी अनिष्ट की आशंका से भर जाता है। इसके उलट, पिछले साल जुलाई में अपने मिशन की प्रगति के बारे में आयोजित ‘स्पेस-टू-अर्थ प्रेस कॉन्फ्रेंस’ में विलियम्स काफी सकारात्मक दिखी थीं। तब उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे मन में भरोसा है कि यह अंतरिक्ष यान हमें घर वापस ले आएगा, कोई दिक्कत नहीं है।’’
स्टारलिंक का कैप्सूल उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, लिहाजा उन्हें स्पेसएक्स के भेजे कैप्सूल से धरती पर लौटना पड़ा। फिर भी दुनिया ने राहत की सांस ली कि उनकी नियति ग्रैविटी के यात्रियों जैसी नहीं रही।
कल्पना चावला: अंतरिक्ष का साहसी परिंदा
हरियाणा के करनाल में 17 मार्च 1962 को जन्मी कल्पना चावला सितारों के बीच उड़ना चाहती थीं। उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और सपनों के पंख फैलाकर अमेरिका पहुंच गईं। वहां टेक्सस और कोलोराडो विश्वविद्यालय से मास्टर्स और पीएचडी की डिग्रियां लीं और नासा में कदम रखा। कल्पना ने पहली बार 1997 में स्पेस शटल कोलंबिया (एसटीएस-87) से उड़ान भरी, 31 दिन अंतरिक्ष में बिताए, पृथ्वी के 252 चक्कर लगाए और तारों के बीच खोज की नई कहानी लिखी। दूसरी बार वे 2003 में एसटीएस-107 मिशन पर गईं। इस अभियान में अंतरिक्ष में जैविक, भौतिक और सामग्री विज्ञान के 80 प्रयोग किए गए। 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी के वायुमंडल में लौटते वक्त शटल का थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम फेल हो गया और हादसे में उनकी मृत्यु हो गई।
कल्पना भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री थीं जिन्होंने तकनीकी क्षेत्र में स्त्री-विरोधी रूढ़ियों को तोड़ा। उनकी सफलता ने भारतीय महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित में करियर बनाने का आत्मविश्वास दिया। 1997 में भारत लौटने पर स्कूलों में बच्चों से उनकी मुलाकात ने युवाओं को सपने देखने की प्रेरणा दी। उनकी मृत्यु के बाद भारत ने 2004 में मौसम उपग्रह ‘कल्पना-1’ लॉन्च किया और नासा ने उनके नाम पर एक सुपरकंप्यूटर समर्पित किया।
कल्पना का मानना था कि शिक्षा और जिज्ञासा इंसान को कहीं भी ले जा सकती है। उनकी जिंदगी यह साबित करती है कि छोटे शहर से निकलकर भी वैश्विक मंच पर छाप छोड़ी जा सकती है और लगन से कोई भी ऊंचाई हासिल की जा सकती है।
सुनीता विलियम्सः सितारों के बीच नौ महीने
जब सुनीता विलियम्स 19 मार्च 2025 की सुबह स्पेस एक्स ड्रैगन कैप्सूल से बाहर निकलीं, तो दुनिया ने राहत की सांस ली। वह ऐतिहासिक लम्हा था, न केवल इसलिए कि एक अंतरिक्ष मिशन पूरा हुआ, बल्कि इसलिए भी कि यह नौ दिनों का छोटा मिशन था जो तकनीकी खामियों के कारण नौ महीने लंबा हो गया। 286 दिन तक अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आइएसएस) पर फंसे रहने के बाद सुनीता और उनके साथी बुच विलमोर धरती पर लौटे। तकनीक की नाकामी के बीच यह धैर्य और जीवट की परीक्षा जैसा था, लेकिन सुनीता के लिए यह पहली चुनौती नहीं थी।
ओहायो में 19 सितंबर 1965 को जन्मी सुनीता भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री हैं। उनके पिता डॉ. दीपक पंड्या गुजरात के मेहसाणा में झूलासन गांव से थे और मां स्लोवेनियाई मूल की थीं। दीपक पांड्या गुजरात भाजपा के नेता हरेन पांड्या के रिश्ते में चाचा लगते थे, जिनकी 2002 में हत्या का मामला अब भी अनसुलझा है। बचपन से ही सुनीता खेल-कूद, तैराकी और पढ़ाई में तेज थीं। उनका सपना पशु चिकित्सक बनने का था, लेकिन 1987 में उन्होंने अमेरिका की नेवल एकेडमी से भौतिक विज्ञान में स्नातक किया और अमेरिकी नौसेना में शामिल हो गईं। वहां उन्होंने हेलीकॉप्टर पायलट के रूप में काम किया, 30 से अधिक विमानों को उड़ाया और 1,600 घंटे की उड़ान भरी। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री ली और नासा के अंतरिक्ष यात्री कार्यक्रम के लिए आवेदन किया। पहली बार नासा से लौटा दी गईं, लेकिन दोबारा आवेदन किया तो 1998 में चयनित हो गईं। इसके बाद कठोर ट्रेनिंग और फिर 2006 में उनका पहला अंतरिक्ष मिशन आया। 9 दिसंबर 2006 को वे स्पेस शटल डिस्कवरी से अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुंचीं और 195 दिन बिताए, जो उस समय किसी महिला अंतरिक्ष यात्री के लिए सबसे लंबी अवधि थी। उन्होंने चार स्पेसवॉक किए, जो कुल 29 घंटे 17 मिनट के थे। खास बात यह थी कि उन्होंने अंतरिक्ष से बोस्टन मैराथन भी पूरी की। यह पहली बार था जब किसी महिला अंतरिक्ष यात्री ने ऐसा किया था।
फिर 2012 में उनका दूसरा मिशन आया। इस बार उन्होंने आइएसएस पर 127 दिन बिताए और तीन स्पेसवॉक किए। कुल मिलाकर, उनकी स्पेसवॉक की अवधि 50 घंटे और 40 मिनट हो गई, जो एक नया रिकॉर्ड था। 2024 का मिशन बिल्कुल अलग था। 5 जून 2024 को सुनीता और बुच विलमोर स्टारलाइनर यान से आइएसएस के लिए रवाना हुए। यह सिर्फ नौ दिनों का मिशन था, लेकिन स्टारलाइनर में हीलियम रिसाव और प्रणोदन प्रणाली की नाकामी के कारण वे वहां फंस गए। पांच थ्रस्टर काम करना बंद कर चुके थे। नासा ने यान को खाली वापस भेजने का फैसला किया, लेकिन सुनीता और बुच को वहीं रहना पड़ा।
आखिरकार, नासा ने स्पेसएक्स के क्रू-9 मिशन के जरिये उनकी सुरक्षित वापसी का रास्ता तैयार किया। 18 मार्च 2025 को वे आइएसएस से रवाना हुए, हालांकि जानकारों का मानना है कि कुछ महीने सुनीता विलियम्स के काफी चुनौतीपूर्ण होंगे। इतने लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी में रहने का असर उनके शरीर पर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि उनकी हड्डियों का घनत्व 10-12 फीसदी तक कम हो चुका होगा क्योंकि स्पेस में हर महीने हड्डियों की मजबूती 1-2 फीसदी घटती है। नासा ने उनके लिए 45 दिन का पुनर्वास प्लान तैयार किया है।
राजीव नयन चतुर्वेदी