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यह महंगाई अच्छी है

देश के अधिकांश हिस्से में गोरक्षा की नीति नुकसानदेह रही, क्योंकि किसानों के लिए दूध नहीं देने वाले गोवंश को संभालना मुश्किल हो गया है
धरती कथा

सरकारें और नीति-निर्माता जनता की वाहवाही लूटने और अपने राजनैतिक हित साधने के लिए कुछ ऐसे फैसले करते हैं, जो दूसरों पर भारी पड़ते हैं, लेकिन वे खुद इसका कोई बोझ नहीं उठाना चाहते। ऐसा ही मामला दूध की कीमतों से जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों एनडीडीबी की कंपनी मदर डेयरी और गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (अमूल) ने दूध की कीमतों में दो से तीन रुपये का इजाफा किया। जब बाजार में प्याज की आसमान छूती कीमतें हों और फल-सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही हो, तो दूध के दाम में बढ़ोतरी लोगों को बेचैन करेगी ही। लेकिन इसके पीछे की जमीनी हकीकत को समझने की जरूरत इस बेचैनी के मुकाबले अधिक अहमियत रखती है। हालांकि यह बात भी चौंकाने वाली है कि अक्सर अगस्त के बाद शुरू होने वाले सीजन में दूध के दाम नहीं बढ़ते हैं, क्योंकि इस दौरान आपूर्ति में इजाफा होता है।

इस दौरान किसानों को दी जाने वाली खरीद कीमतें भी नहीं बढ़ती हैं। लेकिन इस बार दोनों बातें हुई हैं। डेयरी कंपनियों को दूध की आपूर्ति यानी उनकी खरीद पांच से छह फीसदी गिरी है, इसके चलते कंपनियों को दूध की खरीद कीमत में आठ से दस रुपये तक का अच्छा-खासा इजाफा करना पड़ा है। अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर आर.एस. सोढ़ी इस लेखक के साथ बातचीत में कहते हैं कि हम गाय के दूध के लिए 31 से 33 रुपये प्रति लीटर दे रहे हैं। इसमें बोनस जोड़ने पर किसानों की कीमत 36 से 37 रुपये प्रति लीटर हो जाती है। वहीं, भैंस के दूध के लिए यह कीमत 41 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है। वह कहते हैं कि आपूर्ति बढ़ रही है और दूध की कोई किल्लत नहीं है।

असल में जमीनी हकीकत के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। पिछले साढ़े पांच साल में दूध की रिटेल कीमत में मात्र आठ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। यानी इसकी महंगाई दर तीन फीसदी से भी नीचे रही है। यानी किसानों को लागत से भी कम दाम मिल रहा था। किसानों को इसका खामिजाया भुगतना पड़ा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने का यह भी एक बड़ा कारण रहा। कर्नाटक में पूर्ववर्ती सिद्धरमैया सरकार ने तो उस समय दूध किसानों को अपने खाते से अतिरिक्त बोनस दिया था। लिहाजा, राज्य में दूध की खरीद बढ़ गई थी। यहां एक और राजनीतिक संयोग देखिए, जहां महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार के समय किसानों को दूध का दाम 29 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है, वहीं यह साल भर पहले मात्र 19 रुपये लीटर था।

वैसे इस स्थिति के पीछे सरकार की नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। पिछले दिनों दूध की कीमतों के गिरने के साथ ही देश के अधिकांश हिस्सों में गोरक्षा की नीति भी नुकसानदेह रही, क्योंकि किसानों के लिए दूध नहीं देने वाले गोवंश को संभालना मुश्किल होता जा रहा है। नतीजा यह हुआ कि कमजोर कीमत और गैर-जरूरी गोवंश किसानों के लिए मुसीबत बन गया। इसके चलते बड़े पैमाने पर किसानों ने पशुओं की संख्या में कटौती की। इसका नतीजा कुछ हद तक इस साल दूध की आपूर्ति में कमी के रूप में देखने को मिल रहा है। हालांकि डेयरी उद्योग के लोग इसकी वजह देर तक मानसून के बरकरार रहने और फ्लश सीजन में देरी को बता रहे हैं। वे धीरे-धीरे आपूर्ति सामान्य होने की बात कर रहे हैं। लेकिन यह पूरी तरह सच है, ऐसा कहना मुश्किल है, क्योंकि फ्लश सीजन में दूध की खरीद में कमी आने का यह शायद पहला मौका है। बात यहीं पर रुकने वाली नहीं है। दूध की कम उपलब्धता के चलते दूध पाउडर के उत्पादन में भी कमी आएगी। वहीं, जब फ्लश सीजन में यह हाल है तो अप्रैल के बाद लीन सीजन (दूध का उत्पादन घटने का समय) में दूध की खरीद और गिरेगी। नतीजा, दाम फिर बढ़ सकते हैं।

ऐसी स्थिति में महंगाई के प्रति संवेदनशील सरकार दुग्‍ध पाउडर आयात की अनुमति दे सकती है, जो देश के दूध किसानों के लिए घातक होगा। प्याज और चीनी के मामले में अक्सर यही होता है। जब किसानों की आय बढ़ने का मौका आता है, तो सरकार को शहरी उपभोक्ताओं की याद आने लगती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर शहरी आय का कुछ हिस्सा किसानों की बढ़ती आय के रूप में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नहीं जाएगा तो उनकी स्थिति कैसे सुधरेगी। इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक समेत तमाम नीति-निर्धारकों को यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि दूध की यह महंगाई अच्छी है क्योंकि दूध किसानों को कई साल के घाटे के बाद उनकी आय में कुछ इजाफा होने का रास्ता इसी से बनेगा।

 

 

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