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8 अगस्त 2022 · AUG 08 , 2022

शख्सियत: सर्वोच्च पद का दायित्व

द्रौपदी मुर्मू का निम्नवर्गीय लिपिक से देश की राष्ट्रपति पद का सफर
द्रौपदी मुर्मु

राजनीति के चौसर की बाजी कहिए या कुछ और, साधारण जनजातीय संताल किसान परिवार में जन्‍मी, ओडिशा के मयूरगंज जिले के बलदापोसी गांव की बेटी देश के शाही सिंहासन पर बैठने जा रही है। यकीनन द्रौपदी मुर्मू ने भी शायद ही सोचा होगा कि वे देश की राष्‍ट्रपति होंगी। हालांकि निम्‍नवर्गीय लिपिक से जीवन शुरू करने का उनका सफर कम दिलचस्‍प नहीं रहा। यूं तो देश की पहली आदिवासी महिला राज्‍यपाल होने के साथ झारखंड में छह साल से अधिक सबसे लंबी पारी खेलने वाली राज्‍यपाल का खिताब भी उनकी झोली में है। अब सबसे कम उम्र की देश की पहली महिला आदिवासी राष्‍ट्रपति होने का गौरव भी उन्हें हासिल हो रहा है।

उनकी शख्सियत कैसे निखरी है, यह जानना और भी दिलचस्प है। आखिर उनके व्‍यक्तिगत जीवन में दुख भी कई आए। बैंक कर्मचारी रहे पति श्‍यामा चरण मुर्मू की 2014 में मौत हो गई। दो बेटों की क्रमश: 2009 और 2013 में मौत हो गई। उनकी इकलौती बेटी इतिश्री मुर्मू बैंक में काम करती हैं। बच्‍चों और पति की स्‍मृति में उन्होंने अपने घर को ट्रस्‍ट में बदल दिया है, जहां तीनों की मूर्ति लगी है।

उन्होंने मयूरभंज के केबीएचएस उपरबेड़ा से स्‍कूली शिक्षा के बाद ओडिशा के रमा देवी महिला कॉलेज से 1979 में स्‍नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद जीवन-यापन के लिए ओडिशा में ही सिंचाई विभाग में निम्‍नवर्गीय लिपिक के पद पर नौकरी की। 1983 में बच्‍चों की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ दी। उसके एक दशक बाद अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन ऐंड रिसर्च सेंटर में शिक्षक के रूप में काम किया।

उनके पिता और दादा ग्राम पंचायत के प्रधान थे। द्रौपदी मुर्मू ने भी अपना राजनीतिक सफर नगर पंचायत से शुरू किया। वे 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत की पार्षद चुनी गईं। 2000 में रायरांगपुर विधानसभा सीट से पहली बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर विधायक चुनी गईं। तब भाजपा के सहयोग से बनी नवीन पटनायक सरकार में वाणिज्‍य और परिवहन मंत्री बनीं। 2002 में मत्‍स्‍य एवं पशुपालन विभाग की मंत्री बनीं। 2006 में उन्‍हें भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा का ओडिशा का प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया गया। 2009 में रायरंगपुर सीट से ही भाजपा के टिकट पर पुन: विधायक बनीं। 2007 में उन्‍हें ओडिशा विधानसभा में सर्वश्रेष्‍ठ विधायक के नाते नीलकंठ पुरस्‍कार मिला। 2015 में उन्‍हें झारखंड का राज्‍यपाल नियुक्‍त किया गया। 2021 तक वे उस पद पर रहीं।

राज्‍यपाल के रूप में भी शिक्षा के साथ-साथ महिला और जनजातीय मसलों पर उनकी पूरी सक्रियता दिखी। सक्रियता की वजह से भाजपा के रघुवर दास की सरकार और झामुमो के नेतृत्‍व वाली हेमंत सोरेन की सरकार के साथ कई बार असहज स्थिति पैदा हुई। ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी में सदस्‍यों के मनोनयन से राज्‍यपाल की भूमिका को खत्‍म करने, आदिवासी महिला दरोगा रूपा तिर्की की मौत और भाजपा के शिष्‍टमंडल से मिलने के बाद पुलिस महानिदेशक को बुलाकर निर्देश देने के मामले में झामुमो का तेवर तल्‍ख रहा। झामुमो ने राजभवन पर खूब प्रहार किया। कोल्‍हान विवि में सीनेट और सिंडिकेट सदस्‍यों के मनोनयन में भाजपा से जुड़े लोगों को तरजीह देना, कुलपतियों को सेवा विस्‍तार देना जैसे मसलों पर हेमंत सरकार से तीखापन बढ़ता रहा। ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी नियमावली में संशोधन पर द्रौपदी मुर्मू ने आपत्ति की और फाइल तलब की। उनके जाने तक फाइल राजभवन में ही पड़ी रही।

प्रदेश में दुष्‍कर्म की घटनाएं बढ़ीं तो मुख्‍यमंत्री सोरेन को राजभवन बुलाकर बात की। उन्‍होंने हाइकोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश को फोन कर इन्‍हीं मसलों के लिए फास्‍ट ट्रैक कोर्ट गठित करने को कहा। उन्होंने जनजातीय मामलों में भाजपा की सरकार के प्रति भी रुख कड़ा रखा। सीएनटी-एसपीटी एक्‍ट में संशोधन संबंधी रघुवर सरकार के प्रस्‍ताव को पुनर्विचार के लिए वापस कर लोगों को चौंकाया।

 फिर नए राज्‍यपाल की घोषणा के बाद मुलाकातियों के लिए द्रौपदी मुर्मू ने राजभवन का दरवाजा खोल दिया। मगर हर छोटी-बड़ी बात को लेकर हेमंत सरकार को घेरने के लिए राजभवन पहुंचने वाले भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष, विधायक दल के नेता, रांची के सांसद, पूर्व मुख्‍यमंत्री रघुवर दास जैसे बड़े नेता विदा करने तक नहीं आए। हेमंत सोरेन ने राजभवन जाकर शिष्‍टाचार मुलाकात की। राज्‍य सरकार की ओर से विदाई समारोह का आयोजन किया। जब एनडीए की ओर से द्रौपदी मुर्मू को राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार घोषित किया गया तो राज्‍यपाल के रूप में विदाई के समय किनारा करने वाले नेता उनके साथ की तस्‍वीर लगाकर बधाइयां देने लगे और भाजपा से सख्‍त वैचारिक मतभेद के बावजूद झामुमो के स्‍वर बदल गए हैं।

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