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6 मार्च 2023 · MAR 06 , 2023

प्रथम दृष्टि: शब्द सम्हारे बोलिये...

आजकल अपशब्दों का प्रयोग उच्च अधिकारियों और नेताओं से सुनने को मिल रहा है जिनसे सुसंस्कृत व्यवहार की उम्मीद की जाती है। क्या बदलते परिवेश में इसे ‘न्यू नार्मल’ समझकर स्वीकार किया जा सकता है?
भाषा की मर्यादा जरूरी

शब्द सम्हारे बोलिये, शब्द के हाथ न पांव। एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।’ पता नहीं मसूरी के लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी या हैदराबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आइएएस/आइपीएस प्रशिक्षुओं को इस दोहे का मतलब समझाया जाता है या नहीं! बिहार के प्रशासनिक हलके में फिलहाल जो हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि उन्हें कबीर पढ़ाने की बजाय अनुराग कश्यप की फिल्में ज्यादा दिखाई जाती हैं। हाल में एक अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी एक आधिकारिक मीटिंग में मातहत डिप्टी कलेक्टर को खरी-खोटी सुनाते समय शब्दों की मर्यादा भूल गए और गाली-गलौज का इस्तेमाल किया। इस घटना पर विवाद थमा भी न था कि एक इंस्पेक्टर-जनरल (आइजी) रैंक के अधिकारी ने अपने विभाग की बॉस, एक पुलिस महानिदेशक स्तर की अधिकारी पर उन्हें अपशब्द कहने का आरोप लगाया। इसी बीच एक महिला सांसद द्वारा एक ऐसे शब्द के प्रयोग की खबर आई, जिसे आम बोलचाल की भाषा में गाली समझा जाता है।

नौकरशाही हो या राजनीति, वाणी पर नियंत्रण होना अतिआवश्यक है। भारत की संसदीय परंपरा में अनेक ऐसे शब्द हैं जिन्हें असंसदीय समझा गया है और सदन में उनका प्रयोग वर्जित है। इसलिए प्रजातंत्र के दो मजबूत स्तंभ, विधायिका और कार्यपालिका की गरिमा बरकरार रखने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर रहती है, उनसे भाषाई शालीनता की उम्मीद हर किसी को होती है। आखिरकार सदन से लेकर सचिवालय तक कड़वी से कड़वी बातों को भी शिष्टता के साथ पेश किया जा सकता है। यही तो हर भाषा की खूबसूरती होती है। विगत में आपस में धुर विरोधी रहे अधिकारी हों या नेता, वे एक दूसरे के लिये गरिमामय शब्दों का प्रयोग करते थे। लेकिन, आजकल अपशब्दों का प्रयोग उन तबकों में सुनने को मिल रहा है जिन्हें आम तौर पर समाज में सुसंस्कृत समझा जाता है। क्या बदलते परिवेश में इसे ‘न्यू नार्मल’ समझकर स्वीकार किया जा सकता है?

वैसे तो पाश्चात्य संस्कृति में अक्सर कहा जाता रहा है कि समुद्र में जाने वाले नाविक आपस में बेरोकटोक अपशब्द बोलते हैं। वहां सभ्य समाज के लोगों से अपेक्षा रही है कि वे ‘सेलर्स लैंग्वेज’ यानी नाविकों जैसी बोली बोलने से परहेज करेंगे। लेकिन आज, जब ऐसे शब्दों का प्रचलन पढ़े-लिखे वर्गों में भी बढ़ रहा है तो लगता है कि नाविकों को नाहक बदनाम किया गया। ऐसा आखिर क्यों हो रहा है?

क्या इसका ठीकरा भी फीचर फिल्मों के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जा रही वेब सीरीज पर फोड़ दिया जाए, जिनके संवादों में आजकल गाली-गलौज की भरमार होती है। परदे पर वास्तविकता दिखाने के नाम पर उनमें ऐसी गालियों का समावेश होता है, जो कुछ साल पहले तक पूर्णतः प्रतिबंधित थीं। फिल्मों में ऐसे शब्दों का सेंसर हो जाता था और टेलीविजन पर उन्हें ‘बीप’ कर दिया जाता था। धीरे-धीरे सेंसर बोर्ड लिबरल हुआ और गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) जैसी फिल्मों में ऐसी गालियां सुनने को मिलीं, जिन्हें पहले ‘गटर भाषा’ समझा जाता था। अब ओटीटी पर न तो कोई सेंसर बोर्ड है, न ही उनके आकाओं में स्वनियंत्रण के प्रति कोई संजीदगी दिखती है। हालांकि इसका तात्पर्य ओटीटी माध्यम पर सेंसरशिप की वकालत करना कतई नहीं है, न ही उन लोगों की मुखालफत करना है जो ओटीटी को सामूहिक मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष के मनोरंजन का जरिया बताकर गाली-गलौज के उपयोग को उचित बताते हैं।

लेकिन क्या परदे से इतर, हकीकत की दुनिया में भी गाली-गलौज आज इतना फैशनेबल बन गया है कि जिम्मेदार ओहदों पर बैठे लोग अपने मातहतों के लिए उनका प्रयोग करने से गुरेज नहीं कर रहे? जिस तरह मारधाड़ वाली फिल्मों में दिखाए गए हिंसात्मक दृश्यों का दुष्प्रभाव समाज पर अक्सर देखा गया है, क्या कथित रूप से परिष्कृत समझे जाने वाले समाज में गालियों का बढ़ता प्रयोग भी उसी की देन है?

सियासत को छोड़ भी दें, जहां भाषाई मर्यादा का ख्याल रखने वालों की संख्या दिनोदिन कम हो रही है, लेकिन साहबों से तो यह उम्मीद लगाई ही जा सकती है कि वे बोलचाल में, खासकर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ बातचीत में वाणी पर संयम रखेंगे। वे उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं और उन्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार रखना है, उसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बावजूद अगर उनकी भाषा स्तरहीन रहती है तो वे या तो पद की गरिमा भूल गए हैं या उन लोगों के प्रति असंवेदनशील हैं जिनके साथ या जिनके लिए उन्हें काम करना है। भले ही वे कितने भी कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी हों और उन्हें कई तमगों से नवाजा भी गया हो, लेकिन अगर उनकी भाषा अशिष्ट रहती है तो उनके बाकी सारे प्रशासनिक गुण धूमिल होंगे। इसलिए हर अधिकारी को कबीर के उपरोक्त दोहे को मन में गांठ बांधकर बोलने से पहले यह सोचना चाहिए कि उनके शब्द लोगों के दिलों पर जख्म देंगे या उनके लिए दवा की तरह काम करेंगे?