जंग के बारे में एक पुरानी कहावत मशहूर है, यह ऐसा संजीदा मसला है, जिसे न वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के हवाले किया जा सकता है, न नेताओं के। किसी भी देश की सेना युद्ध के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से हमेशा तैयार रहती है, लेकिन सत्ताधीशों के लिए यह अक्सर उसके राजनैतिक दांव का हिस्सा होता है। हालांकि हर परिस्थिति में युद्ध में शामिल मुल्कों की आम-अवाम को ही उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जब सियासी वजहों से दो मुल्कों की बीच लड़ाई हुई, जिन्हें बातचीत से आसानी से सुलझाया जा सकता था। इन उदाहरणों में दोनों विश्व युद्ध भी शामिल किए जा सकते हैं।
युद्ध के कारण आम लोगों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह बताने की जरूरत नहीं। इसलिए हमेशा से कहा गया है कि युद्ध किसी मसले का समाधान नहीं, बल्कि यह मसले और बढ़ा देता है। अगर वाकई जंग की बदौलत दुनिया में शांति स्थापित की जा सकती, तो बीसवीं सदी में लंबे समय तक देखे गए युद्ध उन्माद के बाद आज हर देश में अमन-चैन कायम हो गया होता। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। आज भी युद्ध अप्रासंगिक नहीं हुए हैं, तभी सत्ताधीशों में युद्ध का फितूर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। रूस और यूक्रेन में जारी जंग को शुरू हुए चार साल से अधिक हो चुके हैं। उस युद्ध के कारण होने वाले व्यापक असर से विश्व समुदाय अभी उबरा भी नहीं है कि ईरान बनाम इज्राएल-अमेरिका जंग शुरू हो गई। इस वर्ष फरवरी के आखिरी दिन जब ईरान पर हुए हमले में ईरान के अयातुल्ला खामेनेई सहित वहां के शीर्ष नेता मारे गए, तब दुनिया के कई युद्ध रणनीतिकारों को लगा कि वहां स्थानीय जनता के समर्थन से सत्ता परिवर्तन होगा और देश की सियासत में नए युग का आगाज होगा। यह आकलन निस्संदेह अमेरिका द्वारा हाल ही में वेनेजुएला पर किए गए अभियान के अनुभवों पर आधारित था, क्योंकि उसने वहां रातोरात सत्ता परिवर्तन कराने में सफलता पाई। शायद इसी मंसूबे के साथ अमेरिका ने इज्राएल के साथ मिलकर ईरान पर हमले कर दो-तीन दिनों में ही अपनी योजना को अंजाम देने की रणनीति बनाई।
ईरान दरअसल लंबे समय से अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है। उसका आरोप है कि ईरान वर्षों से परमाणु शक्ति विकसित करने में लगा है, जो न सिर्फ अमेरिका बल्कि विश्व शांति के लिए बड़ा खतरा है। इसलिए उसे रोकने के लिए अमेरिका-इज्राएल ने ताबड़तोड़ बमबारी की जिसमें ईरान के पूरे शीर्ष नेतृत्व का एक ही झटके में खात्मा हो गया। लेकिन, जीवन की तरह जंग में भी घटनाएं तय स्क्रिप्ट के अनुसार घटित नहीं होतीं। युद्ध शुरू हुए अब लगभग महीना होने जा रहा है लेकिन ईरान ने अमेरिकी उम्मीदों के विपरीत अभी तक घुटने नहीं टेके हैं। दरअसल, उसने इज्राएल के साथ-साथ पश्चिमी एशिया में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों को मिसाइल और ड्रोन की मदद से लगातार निशाना बनाया है, जिसकी आशंका न तो अमेरिका को थी न ही शायद इज्राएल की सरकार को।
ईरान की प्रतिक्रिया देखने के बाद युद्ध के शुरुआत दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया था कि यह युद्ध अधिकतम चार सप्ताह में खत्म हो जाएगा और ईरान में एक नई लोकप्रिय सरकार सत्ता में आ जाएगी। लेकिन चौथे हफ्ते में ट्रम्प ने जंग में पांच दिनों के ठहराव का ऐलान किया, अलबत्ता सिर्फ बिजली और अन्य नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले के मामले में। दरअसल, युद्ध अब और भीषण रूप ले चुुका है और ईरान और इज्राएल में तो भारी तबाही हो ही रही है, पश्चिमी एशिया के उन देशों को भी इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है, जहां अमेरिका ने लंबे समय से सैन्य ठिकाने बना रखे हैं। यह वाकई चिंता का विषय है क्योंकि खाड़ी देशों पर हमले से इस युद्ध के विस्तार होने से भारत सहित पूरे विश्व की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। ईरान द्वारा होर्मुज को ‘दुश्मन’ देशों के लिए प्रतिबंधित करने से तेल और गैस संकट भी सामने आ गया है, जिसकी कीमत उन देशों को भी चुकानी पड़ रही है, जिनका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है। संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं भी आजकल ऐसे मसलों में हस्तक्षेप कर समाधान करने में सक्षम नहीं दिख रही हैं। हालांकि शीत युद्ध के दौरान उसकी भूमिका ज्यादा असरदार थी।
जरूरी है कि अविलंब युद्घ बंद हो, चाहे उसके राजनैतिक या तात्कालिक कारण जो रहे हो। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी को मिल बैठकर समाधान खोजना चाहिए। आज की लड़ाई में तकनीक की बड़ी भूमिका है और ईरान के जवाबी आक्रमण ने सिद्ध कर दिया है किसी देश को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह भी समझना चाहिए कि जंग का अंतिम परिणाम जो भी हो, नुकसान की भरपाई होने में वर्षों लग जाएंगे। जानमाल और कीमती संसाधन नष्ट करने के बजाय एक-दूसरे से संवाद करने में ही सबका भला है।