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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

आवरण कथा/जेल डायरीः ‘‘अंडा वॉर्ड की तन्हाई में, हमने गाने की हिम्मत की’’

हर मुद्दे में संघर्ष था। जेल में, कोई भी अनुरोध, चाहे वह कितनी भी बुनियादी चीज का हो, तुरंत स्वीकार नहीं होता। यह इनकार से ही शुरू होता है
गौतम नवलखा

‘यहां जो इंसानियत की बात करते हैं

अरे, उन्हें जेल में डालो

‘अपराध विज्ञान’ से वाकिफ कराओ’’

वरवर राव, स्कूल और जेल’’

उम्मीद और नाउम्‍मीदी बुनियादी भावनाएं हैं। सभी इंसान, कभी-न-कभी, इन दोनों छोरों के बीच झूलते हैं। जेल में मैंने इन भावनाओं को गहराई से महसूस किया। मुझे याद है, मैं थोड़ी-थोड़ी देर में इन दोनों स्थितियों के बीच झूलता रहता था। कोर्ट में जमानत खारिज होने   पर या मेरी रिहाई (आरोपों से मुक्ति) अर्जी में कोई प्रगति न होने पर, कानूनी प्रक्रिया की लंबी अवधि या सबसे जरूरी चीजों के लिए राहत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर निराशा हुई।

बाहर की जिंदगी के मुकाबले जेल में अनेक पल होते हैं जो कैदियों के मूड को बदलते रहते हैं। क्योंकि जेल कैदियों को सजा देने के लिए बनाया गया है, चाहे वह दोषी हो या विचाराधीन। जिनके संरक्षक, अजीब है कोर्ट और जेल अधिकारी होते हैं।

कैदियों पर अपना हुक्म चलाना जेलर का बुनियादी काम माना जाता है। लेकिन कैदियों और जेल अधिकारियों के बीच इस बारे में बातचीत, बहस और यहां तक कि गुस्से वाली बातें भी होती थीं। लेकिन मैंने सीखा कि ऐसी पाबंदियों से कैसे निपटना है। हमने जेल के उन नियमों को तोड़ा जो हमें गाने, जोर से बात करने या हंसने से रोकते थे। अंडा वॉर्ड की तनहाई में हमने गाने की हिम्मत की, गज भर की दूरी से एक-दूसरे से बात की और हंसे। हमने एक-दूसरे से आमने-सामने मिलने और बात करने के तरीके ढूंढे। कुछ नियम तोड़ने के लिए ही बनते हैं।

जेल की जिंदगी सबसे जरूरी चीजों के इर्द-गिर्द घूमती थी: खाना, पानी और मेडिकल मदद, जिसके बाद कई तरह की पाबंदिया थीं, लाइब्रेरी तक पहुंच, खुली जगहों पर मनोरंजन। हमारी जानकारी के बिना खतों और लेखों पर सेंसरशिप, नियमों का उल्लंघन कर एजेंसियों के साथ हमारी निजी और कानूनी चिट्ठियां साझा करना और परिवार से कपड़े, स्टेशनरी, वगैरह मिलने में दिक्कत। हमने इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी।

हर मुद्दे में संघर्ष था क्योंकि जेल में, कोई भी अनुरोध, चाहे वह कितनी भी बुनियादी चीज का हो, तुरंत स्वीकार नहीं होता। यह इनकार से ही शुरू होता है। फिर कैदियों को अपनी मांग पर अड़े रहना पड़ता है, जब तक कि उसे स्वीकार न कर लिया जाए या वे समाधान के लिए कोर्ट का रुख न कर लें। मांग दर्ज करने से लेकर सुनवाई की धीमी गति, कोर्ट से इनकार, इन सबने मुझे भावनात्‍मक रूप से प्रभावित किया। दो मुद्दे जो कैदी को प्रभावित करते हैं, वे कानूनी प्रक्रिया में देरी और सही मेडिकल सहायता पाने के लिए लड़ाई है।

सजा के दौरान सबसे ज्यादा परेशान करने वाला पल वे 28 दिन थे, जो मैंने क्वारंटाइन में बिताए। अप्रैल 2020 में मेरी गिरफ्तारी के दो महीने से भी कम समय में मुझे अचानक तिहाड़ जेल से मुंबई लाया गया। महामारी के दौरान, तालोजा जेल गेट पर आने वाले नए कैदियों को एक स्कूल में जाने के लिए कहा गया। स्कूल के एक विंग को जेल क्वारंटाइन में बदल दिया गया था। वहां पहले से ही लगभग 300 कैदी सात क्लास रूम में ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे, जिन्हें बैरक में बदल दिया गया था। जब मैं वहां से निकला, तब तक कैदियों की संख्या 400 हो गई थी।

 

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