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23 जनवरी 2023 · JAN 23 , 2023

पत्र संपादक के नाम

भारत भर से आई पाठको को चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

पिता से बढ़कर क्या

आउटलुक के 9 जनवरी अंक में प्रकाशित आवरण कथा ‘छतनार बरगद सा पिता’ मार्मिक लगी। भारतीय संस्कृति और पौराणिक साहित्य में पिता को जो सर्वोच्च सम्मान और स्थान दिया गया है, शायद उतना कहीं और किसी सभ्यता और संस्कृति में देखने को नहीं मिलेगा। पौराणिक साहित्य में श्रवण कुमार, अखंड ब्रह्मचारी भीष्म, मर्यादा पुरुषोत्तम राम आदि अनेक आदर्श उदाहरण हैं, जो एक पिता के प्रति पुत्र के अथाह लगाव एवं समर्पण को बयां करते हैं। वैदिक ग्रंथों में पिता के बारे में स्पष्ट तौर पर उल्लेखित किया गया है कि पाति रक्षति इति पिता, अर्थात जो रक्षा करता है, वही पिता कहलाता है। इसी अंक में 2022 की झलकियां देखीं। इससे बीते वर्ष की वैश्विक और देश की घटनाओं की यादें फिर ताजा हो गईं।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

पिता की छवियां

पिता की कितनी छवियां हो सकती हैं, यह भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, आनन्द रावत, कीर्ति आजाद, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, राजीव चौरसिया, तीजन बाई, दिनेश शैलेन्द्र, नासिर खान, राजेश्वरी, राकेश बख्शी, नील नितिन मुकेश, रवीना टंडन, मनीष मुंद्रा, जयंत पाल, महावीर सिंह फोगाट और आनंद कुमार के अनुभवों से जाना। हर व्यक्ति का अलग अनुभव, हर व्यक्ति का पिता के प्रति अलग स्नेह। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का अनुभव दिल को छू गया। एक उम्र हो जाने के बाद कहते हैं कि न पिता बच्चों पर दबाव बनाते हैं न बच्चे उनकी सुनते हैं। लेकिन पिता के सत्याग्रह की धमकी के बाद उनका धूम्रपान छोड़ देना वाकई काबिले तारीफ है। रवीना का अपने पिता के प्रति अटूट स्नेह ही है कि वे चाहती हैं कि उनके बच्चों में उनके पिता के गुण आएं। पिता के प्रति इससे बड़ा स्नेह का उदाहरण क्या होगा। मृदुला गर्ग की साफगोई से पता चलता है कि उनका पिता के प्रति कितना आदर है। उन्होंने स्पष्ट रूप से पिता की कमियां भी लिखी, इससे पता चलता है कि उनके पिता ने उन्हें कितना आत्मविश्वास दिया होगा। ममता कालिया ने तो जैसे पिता के लिए शब्द चित्र ही खींच दिए। तीजन बाई के पिता के बारे में पहली बार पता चला। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले उनके पिता ने यदि उस वक्त तीजन के बारे में ऐसा सोचा यह बड़ी बात है। पिता की ऐसी छवियां दुर्लभ हैं।

सोनाक्षी परिहार | बैतूल, मध्य प्रदेश

बेटे की यात्रा

9 जनवरी को आउटलुक की आवरण कथा, ‘छतनार बरगद सा पिता’ के बहाने तिरुमारन की मार्मिक कहानी के बारे में पता चला। यह साधारण बात नहीं है कि पचपन साल की उम्र में तिरुमारन ने पिता की कब्र की खोज की। पिता के लिए इस तरह का प्रयास बताता है कि बच्चों के जीवन में पिता का भी अहम स्थान है। तिरुमारन के लिए यह यात्रा की पूर्णता थी या सुख यह वही बता सकते हैं लेकिन इस कहानी ने बताया कि पिता के संघर्ष और उनके प्यार को अभी भी परिभाषित करना बाकी है।

योगिता उपाध्याय | दिल्ली

जीवन का अवलंब

जब पिता को बरगद लिख ही दिया तो फिर उनके लिए इससे श्रेष्ठ और कोई उपमा नहीं बचती। इस मायने में तो आउटलुक की दाद देनी होगी कि यह पत्रिका हमेशा बहाव के विरुद्ध चलती है और अपना अलग मुकाम बनाती है। 9 जनवरी की आवरण कथा, सुखद आश्चर्य लिए हुए आई। मां का महिमामंडन या त्याग की भावना के बीच पिता हमेशा उपेक्षित से ही रहे। यदि मां घर और बच्चों को संभालती है तो पिता भी दुनिया के थेपेड़े खा कर, संघर्ष कर परिवार और अपने बच्चों के लिए तमाम तरह के साधन जुटाता है। पिता वाकई बरगद की तरह ही होते हैं, जिनके साए में एक तरह की निश्चिंतता होती है। अच्छा लगा कि यह अंक नए वर्ष पर आया, पाश्चात्य सभ्यता वाले फादर्स डे पर इतने सुंदर अंक का तेज ही खत्म हो जाता।

सुहानी बलदेव सिंह | जालंधर, पंजाब

अच्छी पहल

9 जनवरी को आउटलुक की आवरण कथा, ‘छतनार बरगद सा पिता’ कई वजह से याद रह जाएगी। केरल के तिरुमारन की कहानी, पुराणों में पिता के उल्लेख, पिता को महिमामंडित करने के बजाय संतुलित रूप से उनके अवदान को बताना आदि। आवरण कथा की शुरुआत ही इतनी अच्छी थी कि शुरू से आखिर तक पढ़ गई। कहा जाता है कि बेटियां पिता के सबसे ज्यादा करीब होती हैं और बेटे पिता के सामने आने से घबराते हैं। लेकिन नए परिवेश में अब चीजें बदल रही हैं। पिता और पुत्र का संबंध अब मजूबत हो रहा है। बेटे भी पिता से अपने मन की बात कहने लगे हैं। तिरुमारन ने तो पिता को देखा तक नहीं था। लेकिन यदि वे मलेशिया तक गए, तो इससे पता चलता है कि अब बेटे पिता के बारे में अलग ढंग से सोचने लगे हैं। पिता को समझने के बारे में यह अच्छी पहल है। पिता को अनूठे ढंग से प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद।

अवंतिका सिन्हा | बेगूसराय, बिहार

हर संदर्भ की व्याख्या

पुराणों से लेकर नए जमाने तक 9 नवंबर की आवरण कथा में पिता के हर रूप को समेटा गया। दरअसल पिता को समझने के लिए पहले उसके संघर्ष को समझना जरूरी है। मां चूंकि बच्चों की देखभाल करती है इसलिए स्वाभाविक रूप से बच्चों का मां के प्रति झुकाव रहता है। पहले के पिता बच्चों से एक निश्चित दूरी भी रखते थे इसलिए उन पर ध्यान कम गया। कम लिखा गया और वे ऐसे महिमामंडित नहीं हो पाए जैसे मां। लेकिन आज का जमाना अलग है। आजकल पुरुष वैसी ही संवेदनशीलता से बच्चों का ध्यान रखते हैं। नए जमाने के पिता बच्चों की परवरिश में बराबर का सहयोग देते हैं। परवरिश ही ऐसा हिस्सा है कि यदि उस दायरे में पिता आ जाएं, तो फिर झुकाव दोनों के प्रति हो जाता है। इस आवरण कथा ने हर वो पहलू पर नजर डाली जो पिता को परिभाषित करने के लिए जरूरी है। पिता के व्यवहार का संतान पर असर एक अलग ही जादू करता है। वह जादू क्या है, इस लेख ने खूबसूरती से बताया।

शालिनी श्रीवास्तव | कानपुर, उत्तर प्रदेश

भारी पड़ेगी अनदेखी

भाजपा को 2024 में परिवारवाद ले डूबेगा। (मुझे नहीं, बेटे-बेटी को टिकट दो, 26 दिसंबर) गत दो दशक पहले‌ भाजपा ने कांग्रेस के परिवारवाद की राजनीति की जड़ों में सेंध लगाकर उसे धराशाही कर दिया। इससे भाजपा शक्तिशाली तो बन गई लेकिन अब इस पार्टी के लिए भी परीक्षा की घड़ी है। संसद में बहुमत आने के बाद पार्टी की चुनौतियां बदल जाती हैं। मोदी है तो मुमकिन है के कारण कुछ बातें वाकई मुमकिन हुईं लेकिन पिछले कुछ साल में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी बदलाव आ गया है। पार्टी वहां जीत रही है इसलिए हर नेता चाहता है कि किसी न किसी तरह उसका वजूद वहां बना रहे। अगर वे चुनाव न लड़ पाएं, तो कम से कम उनके रिश्तेदार चुनाव लड़ कर जीत जाएं, ताकि उनका जलवा बरकरार रहे। टिकट काटने का असर हिमाचल में दिख ही गया है। आगामी चुनाव के लिए मध्य प्रदेश में टिकट के लिए जोर शोर से जो आवाजें उठ रही हैं, मोदी के लिए उन्हें दबाना आसान नहीं होगा। कैलाश विजयवर्गीय, नरेन्द्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा और सुमित्रा महाजन जैसे नेताओं की अनदेखी इतनी आसान भी नहीं। पार्टी के लिए यह भारी भी पड़ सकती है। अगर विधानसभा चुनाव में प्रदेश में विद्रोह होता है, तो लोकसभा चुनावों में यह भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। भाजपा जिस परिवारवाद के लिए कांग्रेस को घेरती थी, अब उसी में वह खुद फंसती नजर आ रही है। अगर भाजपा विधानसभा में मात नहीं खाना चाहती तो उसे अभी से समर्पित लोग खोजने होंगे, जिनके पास अपनी जमीन हो।

डॉ. जसवंतसिंह जनमेजय | नई दिल्ली

विकल्प कौन

आउटलुक के 26 दिसंबर अंक में भारतीय राजनीति के अलग-अलग रंग दिखे। हर राज्य का परिणाम अलग आया। क्षेत्रियता का शोर है, लेकिन फिलहाल कहीं भी भाजपा का विकल्प नहीं दिख रहा। आगामी लोकसभा चुनाव में दूर-दूर तक ऐसा कोई भी दल नहीं जो भाजपा को चुनौती दे सके। भाजपा पर कितना भी वंशवाद का आरोप लगे लेकिन यह आरोप कुछ ही हिस्सों तक सिमट कर रह जाएगा। कांग्रेस में अब वह बात ही नहीं रही। समाजवादी पार्टी अपने यादववाद से ही ऊपर नहीं उठ पा रही है। बंगाल में ममता अलग राग रखती हैं। इस भी मोदी सरकार ही है, जो हर मोर्चे पर लड़ रही है। देश में भाजपा के रथ ने गति पकड़ ली है। रुकते-रुकते भी इसमें वक्त लगेगा। भाजपा लोगों की मानसिकता जान गई है। उनके पास हर व्यक्ति की जरूरत का सामान है। ऐसे में कौन दल है, जो उनकी बराबरी करेगा।

अरविन्द पुरोहित | रतलाम, मध्य प्रदेश

पारदर्शी न्याय व्यवस्था

आउटलुक के 26 दिसंबर अंक में ‘मृत्यु दंड समय की मांग’ है में कई मुद्दों पर चर्चा की गई है। मृत्यु दंड ही एकमात्र समाधान नहीं है। बल्कि समय की मांग है, शासन तंत्र को मजबूती से अपना वर्चस्व स्थापित करना। ऐसी घटना देश के कई दूर दराज इलाके में हर रोज घटित हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों में कई लोग यह भी सोचते है कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में साल बीतते जाएंगे और फिर भी नतीजा उनके हक में नहीं आएगा। यही सोचकर कई बार आपसी समझौता भी हो जाता है। इससे ही अपराधियों का मनोबल ऊंचा हो जाता है। समय की मांग है कि संसाधनों को बढ़ाया जाए। सही तरीके मामले की जांच हो, इसके उपाय किए जाएं। इसमें यह भी देखना जरूरी है कि महिलाओं द्वारा यदि निजी स्वार्थ से पुरुष पर आरोप लगाए गए, हों तो उसकी भी निष्पक्ष जांच हो। लेकिन निर्भया, छावला पीड़ित जैसे मामलों में देरी का तो कोई कारण होना ही नहीं चाहिए। कानून व्यवस्था में इतनी तो पारदर्शिता हो कि पीड़ित के परिवारजन न्याय मिलने की आस में जीवन भर इंतजार ही करते न रह जाएं। कानून कड़े होंगे, सजा में देरी नहीं होगी, तभी अपराधियों को डर रहेगा।

रवि राजन कुमार | भरूच, गुजरात

पुरस्कृत पत्र : अलग पहलू

9 जनवरी की आवरण कथा, ‘पिता से पाई फौलादी इरादों की सीख’ लेख ने गांधी के बारे में अलग नजरिया दिया। यह सही लिखा है कि गांधी के पिता के बारे में कम और रस्किन, थोरो और टॉलस्टाय पर अधिक बात हुई है। उनके पिता का सहयोग और साथ अलग तरह का था। लेकिन पिता करमचंद के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जाता। नन्हे गांधी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला और उनके अंदर फौलादी इरादों से लेकर एक करुणा भरा दिल बनाने में उनके पिता का बड़ा योगदान था। विडंबना ही है कि गांधी के अपने बेटे के साथ बहुत अच्छे संबंध नहीं रहे। लेख से पिता-पुत्र के रिश्तों की जटिलता के बारे में पता चलता है। यह तो ऐसा रिश्ता है, जो गूंगे के गुड़ के समान है, जिसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है।

श्रीरंग कुलकर्णी | पुणे, महाराष्ट्र