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20 फरवरी 2023 · FEB 20 , 2023

पत्र संपादक के नाम

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

खुद का ही आसरा

6 फरवरी की आवरण कथा, ‘किस्तों में मौत’ अच्छी लगी। कर्ज के कारण जान गंवाते छोटे कारोबारी से लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा तक हर छोटी बात को इसमें सार्थक ढंग से दिखाया गया है। इस अंक से भारतीयों को संदेश दिया गया है कि तंत्र इतना लचर हो गया है कि सरकार बस दिखाने भर की रह गई है। आम जनता की जिंदगी ऐसे ही दरक रही है जैसे, जोशीमठ। सरकारी मनभावन योजनाओं के चक्कर में फंस कर आम जनता को अपना जीवन अपने तरीके से ठीक करने की कोशिश करना चाहिए।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

गरीबी के गर्त में

आउटलुक का 6 फरवरी का अंक महत्वपूर्ण विषय पर है। आखिर ऐसा क्यों है कि भारत के छोटे उद्योग दम तोड़ रहे हैं। इस पर विचार करने के बजाय सरकार बड़े-बड़े उद्योग लगाने में व्यस्त है। जबकि बड़े उद्योगों के मुकाबले छोटे उद्योग ज्यादा जरूरी हैं। लगभग हर विकसित देश के अस्सी फीसदी रोजगार कुटीर उद्योग में ही हैं। यह विडंबना ही है कि भारत के छोटे कारोबारी कर्ज की चपेट में हैं। देश की आर्थिक समस्या बढ़ रही है और कर्ज लेने वाले अपना जीवन खत्म कर रहे हैं। भारत सरकार हर दिन करोड़ों के विज्ञापन कर रही है। फिर भी देश गरीबी की गर्त में जा रहा है।  

हरीशचंद्र पांडे | हल्द्वानी, उत्तराखंड

 

कर्ज की मार

6 फरवरी की आवरण कथा, ‘शिकस्त की आवाज’ दिल तोड़ने वाली है। किसानों की आत्महत्या पर इतनी बात करने वाला देश छोटे व्यापारियों की मौत पर इतना चुप आखिर कैसे रह सकता है। मैं ऐसे पत्रकारों को भी जानता हूं, जो कोविड के बाद नौकरी जाने से आर्थिक बदहाली से जूझ रहे हैं। कुछ लोगों की हालत इतनी खस्ता है कि वे बच्चों को स्कूल में नहीं पढ़ा पा रहे हैं। उन पर भी कर्ज की वैसी ही मार है, जैसी व्यापारियों पर। लेकिन सरकार सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने में व्यस्त है। सरकार ही क्यों दूसरे पत्रकार जिनकी नौकरियां चल रही हैं वे भी बस बिना काम के विषय लेकर टेलीविजन पर लोगों को लड़वाने में व्यस्त हैं। हो सकता है कुछ पत्रकारों ने अपनी ईहलीला समाप्त कर ली होगी। जिस देश में किसान, व्यापारियों की आत्महत्याएं, सामान्य हैं वहां पत्रकारों की जान की किसे परवाह है। टीवी के चमकते-दमकते, लड़ते-झगड़ते पत्रकारों के बीच गुमनाम लोगों की किसे पड़ी है।

प्रज्ञा रावत | दिल्ली

 

आंकड़े झूठ नहीं बोलते

आउटलुक की 6 फरवरी की आवरण कथा, ‘शिकस्त की आवाज’ से यह नया तथ्य पता चला कि अब किसानों के मुकाबले कारोबार और व्यापार से जुड़े लोग ज्यादा आत्महत्या कर रहे हैं। 2020 और 2021 के एनसीआरबी के आंकड़ों में किसानों के मुकाबले कारोबारियों ने ज्यादा खुदकशी की है। इसके पीछे कहीं न कहीं, नोटबंदी और जीएसटी कारण है। ऊपर से कोरोना। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2021 में कुल 12,055 कारोबारियों ने अपनी जान ले ली। यह आंकड़ा 2020 में 11,716 था। दोनों साल किसानों की आत्महत्या के मामले कारोबारियों से कम देखने में आए। 2021 में स्वरोजगार करने वाले उद्यमियों की आत्महत्या के मामलों में 2018 के मुकाबले 54 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। इनवेस्टर मीट व्यापारियों के लिए जले पर नमक की तरह है। अन्नदाता कह कर किसान को कुछ नहीं मिल रहा और बड़े व्यापारियों के लिए दरवाजे खोलने वाली सरकार छोटे व्यापारियों की सुध नहीं ले रही।

संजय यादव | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

जाति से बड़ा कौन

6 फरवरी के अंक में ‘जाति का जायजा’ बहुत से नए अर्थ खोलता है। नीतीश का यह कदम तारीफ योग्य है कि उन्होंने जाति जनगणना शुरू कराने का निर्णय लिया। आखिर जाति का गणित कहां नहीं है। हर प्रदेश में कहीं न कहीं जाति का गणित हावी रहता ही है। बस बात इतनी सी है कि बिहार इसके लिए बदनाम है। इसके लिए बहुत हद तक चुनाव विश्लेषक भी दोषी हैं, जो केवल बिहार चुनाव के वक्त ही इस मुद्दे को जोर शोर से उछालते हैं। इससे लगता है कि बिहार के अलावा कोई राज्य ऐसा नहीं जहां जाति के गणित के हिसाब से टिकट न बंटते हों या मतदाता वोट न करते हों। 2021 में भी नीतीश यह काम कराने वाले थे लेकिन केंद्र के अडंगे के बाद ऐसा नहीं हुआ। केंद्र से मांग खारिज किए जाने के बाद बिहार सरकार नहीं रुकी यह सबसे अच्छी बात है। अब बिहार सरकार अपने स्तर पर राज्य में जाति गणना करा रही है यह स्वागत योग्य है।

मणि यादव | आरा, बिहार

 

हर जगह जाति

भारत में कहीं भी चले जाइए आखिर जाति कहां नहीं है। फिर इसकी जनगणना कराने में सरकार हिचकती क्यों है। केंद्र सरकार जाति के आंकड़ों को आखिर क्यों छुपाना चाहती है। जैसे बिहार सरकार ने जाति आधारित जनगणना शुरू की है, वैसे हर राज्य को अपने स्तर पर यह काम शुरू कर देना चाहिए। इस कदम के लिए नीतीश की आलोचना भी नहीं की जानी चाहिए। आखिर वे गलत क्या कर रहे हैं। वैसे तो सरकार साधारण जनगणना भी नहीं करा रही, तो फिर जाति पर बात कौन करे। केंद्र सरकार हर काम अपनी सुविधा और चुनावी एजेंडे से करती है। जब उसे लगेगा कि जनगणना या जाति जनगणना से उसका कोई फायदा है, तो ही वह इसे कराएगी। (जाति का जायजा, 6 फरवरी)। यह विडंबना ही है कि केंद्र सरकार को वोट तो हर जाति से चाहिए पर उनकी गिनती नहीं चाहिए।

रामानंद कहार | गोंडा, उत्तर प्रदेश

 

तीर्थ की दुर्दशा

नए अंक (6 फरवरी, ‘विकास’ का विनाश) में जोशी मठ पर लेख से जोशी मठ बनने और उजड़ने की पूरी कहानी पता चली। एक ऐसे स्थान को जिसे सहेजना चाहिए था, वहां न सिर्फ सेना की तैनाती शुरू हो गई बल्कि इसे छावनी बना दिया। जैसे कि इतना भी काफी नहीं था, जो आइटीबीपी का मुख्यालय भी यहां बना दिया गया। और फिर जब चार धाम यात्रा ने जोर पकड़ा तो जोशीमठ छोटी सी रिहाइश से अहम प्रवेश द्वार के रूप में तब्दील हो गया। लेख में सही लिखा है कि “हमारे तीर्थ की परंपरा में पर्यटन की परिकल्पना नहीं है लेकिन इन बदलावों के साथ यहां होटल खुलने लगे। तहसील मुख्यालय यहां खुल गया। सरकारों ने तीर्थ को भ्रष्ट परिसरों में बदलना शुरू कर दिया।” तीर्थ की एक पवित्रता होती है जो वाकई पर्यटन की मानसिकता से यहां आने वालों ने भंग कर दी। सरकार ने आखिर क्या सोच कर स्कींग करने वालों को इजाजत दी होगी। विंटर स्पोर्ट्स के लिए इस जगह का इस्तेमाल करना वाकई निंदनीय है। जो अधिकारी ऐसे निर्णय लेते हैं, उनकी सोच पर ही तरस आता है। क्योंकि सरकार तो विकास दिखाना चाहती है, फिर भले ही उसके लिए डायनामाइट से विस्फोट कर सड़कें बनानी पड़ें। पहाड़ पर रहने वालों की ऐसी अनदेखी करने वालों सख्त से सख्त सजा देनी चाहिए।

होशियार सिंह | गढ़वाल, उत्तराखंड

 

असंभव काम का बीड़ा

आउटलुक के 6 फरवरी के अंक में प्रकाशित ‘पेंशन पुरुष की चुनौतियां’ में नए कांग्रेसी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह ‘सुक्खू’ की छवि फिल्म नायक (2001) के हीरो शिवाजी राव गायकवाड़ जैसी दिखाई गई है, जो तमाम बाधाओं को पार करते हुए प्रदेश में सुशासन की सरकार स्थापित करने में तत्पर है। पूरे 18 साल बाद नई पेंशन योजना की जगह पुरानी को बहाल किया गया है जिसके दायरे में राज्य के 1.36 लाख कर्मचारी आएंगे। हालांकि केंद्र सरकार पुरानी पेंशन योजना की बहाली के विरुद्ध है। वैसे कानून के अनुसार एनपीएस के केंद्रीय कोष में जमा पैसा राज्यों को वापस नहीं दिया जा सकता। यह केवल योगदान देने वाले कर्मचारी को ही लौटाया जा सकता है, किसी एक इकाई या अधिकरण को नहीं। सुक्खू की अगली चुनौती ओपीएस को जमीन पर उतारना और उसके लिए फंड जुटाना है। सरकार इस घाटे की पूर्ति के लिए अन्य उपायों पर विचार कर रही है। नियत एवं आचरण बेदाग हो तो हर असंभव काम सरल तरीकों से होने लगता है। यही हिमाचल में शुरू हो गया है। इस मिशन में सुक्खू सफल होते हैं, तो देश में आगामी 9 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को मुश्किल हो सकती है।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

कौन करेगा जीवंत अभिनय

आउटलुक के 23 जनवरी 2023 अंक में प्रथम दृष्टि और अब पैदाइशी सितारों की चमक तो देखिए में आज की फिल्मी दुनिया (बॉलीवुड) में परिवारवाद के जारी रहने की बेबाक विवेचना की गई है। जिसकी कड़ी में शाहरुख खान की बेटी सुहाना से लेकर अमिताभ के नाती जैसे स्टार किड्स अपनी मौजूदगी दिखा रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि इनमें से कितने हैं, जो जीवंत अभिनय कर पाएंगे। इसी अंक में, कोरोना वायरस पर आधारित आलेख ‘नई लहर का इंतज़ार या राहत’ के मुताबिक लोगों में विकसित प्रतिरक्षा प्रणाली से भारत में महामारी के नियंत्रण की संभावना है। ‘फिर खुले जेल दरवाजे’ में कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज की रिहाई डराने वाली है। रिहाई के बाद वह क्या कर बैठेगा यही आशंका है। शहरनामा में गाजीपुर के इतिहास और वर्तमान की अच्छी जानकारी दी गई है।

सुरेश प्रसाद | सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

 

खूबसूरत एहसास

आउटलुक में 9 जनवरी की आवरण कथा, ‘पिता मेरे पास’ अंक खूबसूरत एहसास के तौर पर सहेजकर रखने वाला अंक है। पिता पर कम ही लिखा गया है। मुझे लगता है पिता पर इसलिए कम नहीं लिखा गया क्योंकि लिखने वाले कम थे बल्कि इसलिए कम लिखा गया है क्योंकि पिता और संतान के खूबसूरत एहसास को शब्दों में कहना आसान नहीं है। इस अंक में तिरुमारन और उनके पिता की कहानी को जिस तरह समेटा गया है, वो भावुक करने वाला है। इसके साथ ही इसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने अपने पिता को याद किया है। इस आशय से भी यह महत्वपूर्ण अंक है। इस अंक के जरिए आउटलुक ने अपने पाठकों को एक खूबसूरत एहसास देने की कोशिश की है। इतना ही नहीं पत्रिका का आखिरी पन्ना बहुत महत्वपूर्ण है। शहरनामा में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के एक कस्बे अम्बाह के बारे में पढ़ा। इसे पढ़कर पता चलता है कि एक शहर या कस्बे को उसके अतीत और वर्तमान के साथ ऐसे भी याद किया जा सकता है।

अनुशान्त सिंह तोमर | मुरैना, मध्य प्रदेश

 

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पुरस्कृत पत्र: सस्ता जीवन

इस समय जीवन से सस्ता कुछ नहीं है। जान की कीमत इतनी ही है कि यदि मरने वाले के परिवार की किस्मत ठीक रही, तो मामला प्रकाश में आ जाता है और सरकार दस-बीस लाख की मदद कर हाथ झाड़ देती है। आवरण कथा, (6 फरवरी, ‘शिकस्त की आवाज’) उन तमाम छोटे व्यापारियों, रेहड़ी वालों और दिहाड़ी मजदूरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है, जो अपने परिवार सहित या अकेले अंतहीन यात्रा पर निकल गए। कितना दुखद है कि परिवार का मुखिया अपने ही हाथों पहले पूरे परिवार को खत्म कर दे फिर खुद मौत को गले लगा ले। क्योंकि वह क्रूर दुनिया की सच्चाई जानता है। अगर वह अपने पीछे परिवार छोड़ गया तो उनकी क्या दुर्गति होगी। अंत तक जो परिवार का साथ न छोड़े वह कायर कैसे हो सकता है।

यश शर्मा | बाराबांकी, उत्तर प्रदेश