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6 मार्च 2023 · MAR 06 , 2023

संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

सर्वोत्तम का अर्थ

इस बार की आवरण कथा, ‘सुंदर सपना बीत गया’ (20 फरवरी) की महत्ता वही समझ सकता है, जिसने अमेरिका जाने का ख्वाब देखा और वह पूरा न हो सका। या पूरा हुआ और अब उसके सिर पर वापसी का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल भारतीयों के साथ परेशानी यही है कि उनके लिए सर्वोत्तम जीवन शैली का अर्थ अमेरिका की किसी मल्टीनेशनल में काम करने से ज्यादा कुछ नहीं है। भारत में रह कर काम करना इन्हें हेय लगता है। लेकिन वहीं विदेश में छोटी नौकरियां करने के बाद भी ये लोग वहां रहना शान समझते हैं। अब जब उनका यह सपना टूट रहा है, तब इतना हल्ला क्यों। भारत में नौकरियां जाती हैं, तो लोग सिर पर आसमान उठा लेते हैं। लेकिन अमेरिका में नौकरी जा रही हैं, तो वहां गिड़गिड़ाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते।

चारू जोशी | अहमदाबाद, गुजरात

 

नजरिये का फर्क

आवरण कथा, ‘सुंदर सपना बीत गया’ (20 फरवरी 2023) अच्छी लगी। दरअसल विदेश में रहना साख की बात होती है इसलिए इस वर्ग के ज्यादातर बच्चे विदेश जा कर समाज में धाक जमाना चाहते हैं। विदेश में बसने या वहां की जीवन-शैली हासिल करना हर उम्र की चाहत सूची में शामिल रहता है। उदारीकरण के बाद से तो यह चाहत बढ़ी ही है लेकिन उससे पहले भी विदेश जाकर नौकरी करना या वहां बस जाना प्रतिष्ठा की बात समझी जाती थी। आइटी उद्योग के आने के बाद से तो जैसे इसमें और तेजी आ गई। लेकिन अब यह ‘द ग्रेट इंडियन ड्रीम’ टूट रहा है। या यूं कहें कि वहां छंटनी से इसका तिलिस्म खत्म हो रहा है। भारत में रहने का जो सुकून है, उससे बढ़कर कुछ भी नहीं।।

बलवंत चंडोक | चंडीगढ़

 

टूट रहे सपने

कोविड महामारी के बाद नौकरियों पर वैश्विक संकट है। इसी क्रम में आइटी कंपनियों से लोगों की नौकरियां जा रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय कामगारों पर सबसे बड़ा संकट है। लेकिन यह संकट सिर्फ नौकरियां का नहीं है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो भारतीय नस्लवाद से भी जूझ रहे हैं। 20 फरवरी की आवरण कथा, ‘सुंदर सपना बीत गया’ (20 फरवरी) में सही मुद्दे उठाए गए हैं। विश्व में आइटी क्षेत्र में परचम फहराने के बाद भारतीय ही इस क्षेत्र में आ रहे संकट से जूझ रहे हैं। सुंदर पिचाई या सत्य नाडेला जैसे भारतीय मूल के लोग ही अब दूसरे भारतीयों को नौकरियों से निकाल रहे हैं। पिछले साल से ही वैश्विक मंदी के आसार दिखने लगे थे। लेकिन अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बड़े पैमाने पर हो रही छंटनी की लहर बता रही है कि यह संकट धीरे-धीरे बढ़ेगा। इन नौकरियों पर बिजली गिरने से संकट तो भारत पर ही आएगा। आखिर देश अपने लोगों को सहारा नहीं देगा, तो कौन देगा?

सत्यम शर्मा | हैदराबाद, आंध्र प्रदेश

 

बिखरता करियर

आउटलुक के 20 फरवरी 2023 अंक में आइटी क्षेत्र में नौकरियों के संकट के बारे में पढ़ा। प्रथम दृष्टि ‘सपनों का बिखरना’ और आवरण कथा, ‘सुंदर सपना बीत गया’ आलेख में भारतीय युवाओं के बिखरते करियर और महत्वाकांक्षा पर गंभीर चिंतन किया गया है। भारत में बेरोजगारों की संख्या ज्यादा नजर आने की सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां सिर्फ सरकारी नौकरी वाले ही खुद को रोजगारयुक्त मानते हैं। जहां तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जा रही छंटनी का सवाल है तो इतना तो तय है कि काम के प्रति समर्पित व्यक्ति को निकाला नहीं जा सकता। आउटलुक के 6 फरवरी के अंक के प्रथम दृष्टि बहुत प्रभावशाली लगा। बिहार की सरकारी स्वास्थ्य विभाग की चरमराती स्थिति ‘विकट ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा’ इसलिए भी अच्छा लगा क्योंकि कोई भी इस पर लिखता नहीं है। वैसे देखा जाए, तो केवल बिहार ही नहीं, बल्कि लगभग पूरे देश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था चौपट है। सरकारी डॉक्टरों की लापरवाही का एक ही निदान है कि उन पर ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का फार्मूला लागू किया जाए। इसी अंक में, ‘विकास का विनाश’ भी पर्यावरण की अनदेखी को बताता है। शहरनामा के तहत इस बार भी रेवाड़ी के इतिहास और वर्तमान की अच्छी जानकारी दी गई है।

सुरेश प्रसाद | सिलीगुड़ी, दार्जीलिंग

 

खिलाड़ियों के हाथ बागडोर

देश में हर वर्ग परेशान है। जब महिला खिलाड़ी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो प्रधानमंत्री किस सुरक्षा की बात करते हैं। 20 फरवरी के अंक में, ‘गए कुश्ती को गले पड़े दुराचारी’ गंभीर लेख है। ऐसे आरोप लगने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति पार्टी में है, तो खुद ही सोच लेना चाहिए कि सत्तारूढ़ पार्टी किस हद तक महिलाओं की हितैषी है। कुश्ती के नामी खिलाड़ियों के साथ ऐसा हो रहा है, जो पदक लेकर आए, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया तो आम आदमी अपनी गुहार कहां लगाए। खेल मंत्रालय ने भी बस एक कमेटी का गठन कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। उम्मीद तो है कि कमेटी सच खोज निकालेगी और दोषी को सजा दिलाने में अहम भूमिका निभाएगी। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि भारत में खेल और विवाद का चोली दामन का साथ है। शारीरिक शोषण की इस तरह की खबरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं। इससे महिला खिलाड़ियों का मनोबल तो गिरता ही है साथ ही नई लड़कियां खेल की दुनिया में आने से घबराती हैं। सबसे पहले तो महिला खिलाड़ियों को सुरक्षित वातावरण देना चाहिए ताकि देश के लिए मेहनत करने वाले खिलाड़ी सुकून से रह सकें। सबसे अच्छा तो यही हो कि सभी तरह के खेल संगठनों के संचालन करने की जिम्मेदारी नेताओं के बजाय भूतपूर्व खिलाड़ियों को ही दी जाए।

बाल गोविंद | नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

अशिक्षा बड़ा कारण

आउटलुक के 20 फरवरी के अंक में प्रकाशित ‘चमत्कार या अंधविश्वास’ पढ़ने के बाद लगा कि क्षणिक सुख एवं प्रचार के लिए लोग कैसी-कैसी तिकड़म से लोगों की आंखों में धूल झोंकते हैं। विज्ञान मानव के जीवन में गहरा प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने से प्रकृति के कई रहस्य जाने जा सकते हैं। विज्ञान का प्रयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। इसके प्रयोग से अंधविश्वास का समूल नाश किया जा सकता है। आज के युग में मानव दैनिक जीवन में विज्ञान को महत्व दे रहा है। शिक्षा से अंधविश्वास पर करारी चोट लग रही है। फिर भी अंधविश्वासी लोगों की कमी नहीं है। अंधविश्वास को जड़ से खत्म करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विस्तार जरूरी है। प्राकृतिक विज्ञान के अलावा अन्य क्षेत्रों-सामाजिक और नैतिक मामलों में भी वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग होना चाहिए। वैज्ञानिक सोच मानव व्यवहार में परिवर्तन लाती है। अंधविश्वास का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

चमत्कार नहीं एजेंडा

आउटलुक के 20 फरवरी के अंक में प्रकाशित ‘चमत्कार या अंधविश्वास’ में बहुत सटीक मुद्दे उठाए गए हैं। बागेश्वर धाम के बाबा को भारत के टीवी चैनलों और सत्ता में बैठे मंत्रियों ने प्रसिद्ध किया है। अगर उनके पास ऐसी ही दिव्य शक्तियां हैं, तो फिर भारत को किस बात की चिंता। वे ही देश की राजनैतिक और आर्थिक समस्यायों का निबटारा कर देंगे। गुप्तचर विभाग की भी फिर क्या जरूरत है, जो घटनाएं होनी होंगी उनके बारे में भी वे बता ही देंगे। उन्होंने गणतंत्र भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का भी आव्हान कर दिया है, यही तो उनका एजेंडा है। अंधविश्वास और अंधभक्तों की बदौलत जो जाहे, ऐसे बाबा कर सकते हैं।

डॉ. जसवंतसिंह जनमेजय | दिल्ली

 

मुफ्त का प्रचार

20 फरवरी के अंक में, ‘चमत्कार या अंधविश्वास’ जैसे लेख को पत्रिका में स्थान ही नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसे बाबा-बैरागियों के बारे में जितना लिखा जाता है, उतना ही फायदा इन ढोंगियों को मिलता है। अगर मीडिया इनके बारे में न लिखे, बताए या दिखाए तो बहुत से लोगों के बारे में पता ही नहीं चलेगा और इनका प्रचार ही नहीं होगा। एक तरह से देखा जाए, तो इस तरह के कोई भी लेख उनका मुफ्त में प्रचार ही है। भले ही आपने उनकी महिमा या किसी चमत्कार का समर्थन नहीं किया। लेकिन कई अंधविश्वासी लोग हैं, जिन्हें लगता है कि बाबा में जरूर कोई खास बात है, तभी कुछ मीडिया विरोध में हैं। ये सारे बाबा राजनैतिक संरक्षण की वजह से यहां तक पहुंचे हैं। यदि इनमें चमत्कार करने की ताकत होती, तो फिर दुनिया में कहीं कोई दुख दर्द ही नहीं रहता।

वैष्णवी ठाकुर | कटिहार, बिहार

 

महज ढोंग

वर्तमान में चल रहे चमत्कार, दावे और चुनौतियों के बीच इतना तो स्पष्ट है कि यह सब राजनीति से प्रेरित है। मध्य प्रदेश की संस्कृति मंत्री और नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्री ने तो खुलकर धीरेंद्र शास्त्री को अपना समर्थन दे दिया। इतना ही नहीं संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री उषा ठाकुर तो धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अनन्य भक्त बन गईं हैं। जब हर कोई ढोंगी हो, तो फिर सिर्फ धीरेंद्र कृष्ण को ही क्यों गलत ठहराया जाए। और यदि कोई उनका ज्यादा विरोध करे तो उन्हें राष्ट्रद्रोही और वामपंथी जैसे तमगे लगा दो। हरदीप सिंह डंग को ऐसे संत वाली भारत की भूमि पर गर्व है। अब बताइए, गर्व के लिए उन्हें और कुछ नहीं मिला, सिर्फ धीरेंद्र कृष्ण ही मिले। वाह क्या बात है। कोई अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को ही चुनौती दे रहा है। यानी पूरे कुएं में ही भांग डली हुई है।

रोली भार्गव | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

संघर्ष करना जरूरी

6 फरवरी 2023 के अंक में, ‘रुपहले परदे के पराजित चेहरे’ लेख बहुत हद तक सही है। आत्महत्या की राह चुनने वाले सितारे गुरु दत्त से लेकर कुलदीप रंधावा तक की सूची में कई सितारे ऐसे भी हो सकते हैं, जिनके बारे में पता नहीं होगा। कमजोर मानसिक स्थिति और संघर्ष न करने की सामर्थ्य न होने से ये लोग ऐसा कदम उठा लेते हैं। वर्तमान में जो सितारे सफलता के उच्चतम शिखर पर हैं उनमें से भी कई हैं, जिन्होंने लंबा संघर्ष किया है। लेकिन लड़ने का माद्दा होने से ये लोग हर तरह की परेशानी झेल जाते हैं। कुछ लोग तो अपनी परेशानी के लिए खुद जिम्मेदार हैं। खराब संबंध, ड्रग्स ऐसी बातें हैं, जिनकी वजह से ये लोग आत्महत्या कर लेते हैं। वंशवाद एक हद तक हो सकता है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इसकी वजह से कोई अपना जीवन ही खत्म कर ले।

इंदु सिन्हा इंदु’ | रतलाम, मध्य प्रदेश

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पुरस्कृत पत्र : बरकरार रहे शान

शाहरुख सच्चे कलाकार हैं, जो दर्शकों को भरपूर प्यार और सम्मान देते हैं। उन्हें एक वर्ग विशेष का कलाकार कहना वाकई उनका अपमान है। लेकिन ऐसा सोचने वाले लोग मुट्ठी भर हैं, यह पठान की सफलता से पता चल गया है। अगर अच्छी कहानी और फिल्मांकन हो, तो दर्शक उस फिल्म का स्वागत करते हैं। यह साबित हो गया है। पिछले दिनों जो फिल्में नहीं चलीं उनमें कहीं से भी बायकॉट की भूमिका नहीं थी। तीनों खानों में से उनका जलवा ही अलग है। सबसे गजब बात ही यह है कि उनकी फिल्म का बेशर्म रंग सफलता का रंग बन गया और कई लोगों के चेहरों का रंग उड़ा गया। इसी को कहते हैं, एकता की ताकत जो शाहरुख के मसले में दिखाई दी। (‘शान से लौटा बादशाह’, 20 फरवरी 2023)

नीता श्रीवास्तव | भोपाल, मध्य प्रदेश