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29 मई 2023 · MAY 29 , 2023

संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

बुजुर्गों का दर्द

15 मई की आवरण कथा, ‘बेसहारा बुढ़ापा, अनचाहे दुख’ अपने आप में ही बहुत कुछ कहती है। अक्सर माना जाता है कि गरीबी की वजह से बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल करने में असमर्थ रहते हैं। क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा उपजने का मुख्य कारण आर्थिक दिक्कते होती हैं। क्योंकि जब संसाधन सीमित हों, तो बुजुर्ग सबसे आखिरी में आते हैं। लेकिन सच तो यह है कि बुजुर्गों की देखभाल और उनके प्रति संवेदनशीलता पैसे से ज्यादा भावनाओं का मसला है। क्योंकि यदि यह सिर्फ पैसे का मसला होता तो इसी अंक में एक और लेख है, ‘अपने ही घर में बेदम बुजुर्ग।’ इस लेख से पता चलता है कि पैसे की तंगी इस परिवार में नहीं थी। पोता आइएएस था, फिर भी उपेक्षित जीवन की वजह से उन्होंने प्राण त्यागे। यानी यहां पैसे नहीं बल्कि भावनाओं की कमी थी। फिल्म उद्योग में कुछ सितारे पैसा होने के बाद भी अकेले रहे और अकेले ही जीवन की आखिरी सांस ली। बुजुर्गों को अपने अनुरूप ढालने के बजाय परिवार को उनके अनुरूप ढलना होगा।  

शहरयार नमाजी | उदयपुर, राजस्थान

 

मेले में सब अकेले

तकनीक का दखल हमारे जीवन में इस कदर बढ़ गया है कि अब खुद हमारे पास अपने लिए ही समय नहीं बचा है। नई आवरण कथा, (‘गम की गोधूलि’, 15 मई) बुजुर्गों की जिस हालत की ओर इशारा करती है, उसमें तकनीक ने अकेलेपन या उपेक्षा जो भी कहना चाहे, उसे बहुत बढ़ाया है। किसी भी युवा या अधेड़ से पूछ लीजिए, उसके कई काम होंगे, जो लंबे समय से टल रहे होंगे। कारण वही मोबाइल। वक्त पहले भी उतना ही था, जितना अब है लेकिन अब मोबाइल से फुर्सत मिले, तो दूसरा कोई काम किया जाए या किसी के बारे में सोचा जाए। ऐसे में बुजुर्गों का खयाल रखने का विचार ही दिमाग में नहीं आ पाता। इस अकेलेपन में कभी-कभी वे लोग भी इसी मोबाइल के शिकार हो जाते हैं और अपनी उम्र इस साथी के साथ गुजारने को बाध्य होते हैं। कुछ बुजुर्गों की स्थिति वाकई दयनीय होती है लेकिन आजकल तकनीक के दखल के कारण संयुक्त परिवार के लोग भी अपनी दुनिया में गुम रहते हैं। यही वजह है कि बुजुर्गों की दुनिया बेहद कठिन होती जा रही है।

होशांग शाह | अहमदाबाद, गुजरात

 

समय किसके पास है

आउटलुक के नए अंक में (‘गम की गोधूलि’, 15 मई) बुजुर्गों के बारे में पढ़ कर लगा कि आज के बुजुर्गों को पैसे की ऐसी परेशानी नहीं है लेकिन उनके साथ दूसरी तरह की दिक्कतें हैं। भागमभाग के बीच कोई भी ठहरकर बुजुर्गों से बात करने वाला नहीं है। बच्चों की अपनी दुनिया है, बच्चों के बच्चों की अपनी। यानी न बेटे-बेटी के पास समय है न पोते-पोतियों के पास। सभी अपने आप में मस्त या टीवी-मोबाइल से उलझे हुए हैं। बुजुर्गों की क्या कहें, नौकरी करने वाले दंपती के बीच भी सुबह-शाम ही बात हो पाती है। कभी-कभी तो उसका भी वक्त नहीं मिलता है। अधिकतर बुजुर्ग कई बार शहर सिर्फ इलाज के लिए आते-जाते हैं, मगर जरूरत पूरी होते ही वापसी करने लगते हैं, क्योंकि शहरी वातावरण में या तो उनका मन नहीं लगता या फिर छोटे से फ्लैट में उनके रहने की कोई स्थायी जगह नहीं होती। बच्चे भी सोचते हैं कि ये लोग यहां से ज्यादा गांव में सुखी रहेंगे। बस यही वह सोच है, जो बुजुर्गों को निपट अकेला छोड़ देती है।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

चुभती है सलाह

15 मई के अंक में आवरण कथा, ‘गम की गोधूलि’ में वृद्धों की उपेक्षा, उत्पीड़न और त्रासदी पर विस्तार से चर्चा हुई है। समाज के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन जहां, आइपीएल, हर महीने दो महीने में होने वाले चुनाव, फिल्म की कमाई जैसे गंभीर मुद्दे हों, वहां बुजुर्गों की क्या हैसियत। लोगों को लगता है कि बुजुर्ग अपना जीवन जी चुके हैं इसलिए अब इन्हें किसी बात की जरूरत नहीं है। इसलिए आज की पीढ़ी को लगता है कि इन्हें अब चुप बैठना चाहिए। बच्चों को बुजुर्गों की सलाह चुभती है और इसलिए इन्हें किसी भी तरह बस चुप करा दिया जाता है। अक्सर बच्चों से सुनने में आता है कि दफ्तर के ही इतने तनाव हैं कि माता-पिता के पास बैठने का वक्त ही नहीं मिल पाता। यह बोलते वक्त बच्चे भूल जाते हैं कि जब पिता नौकरी कर रहे थे, या मां घर संभालती थी, तो उस जमाने के हिसाब से उनके पास भी बहुत सारे तनाव थे। बच्चों को यह बात कौन समझाए कि जितना वक्त वे मोबाइल में देते हैं, उस समय में जरा सी कटौती करने पर माता-पिता के लिए आसानी से समय निकाला जा सकता है।

मोहम्मद ज़ीशान | दिल्ली

 

माता-पिता का ऋण

आउटलुक का 15 मई का अंक, (‘गम की गोधूलि’) ऐसे विषय पर है, जिसे पढ़कर सभी दुखी होते हैं और घर में वृद्धों की उपेक्षा करते हैं। मुद्दा यह नहीं है कि वृद्धों की उपेक्षा हो रही है, मुद्दा यह है कि घर में ही वे कबाड़ की तरह पड़े हुए हैं। ‘मातृ देवो भव’, ‘पितृ देवो भव’ और जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी जैसी बस लिखने या पढ़ने भर के लिए हैं। अब ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ रही है, जो माता-पिता के ऋणों को भूलकर उन्हें एकाकी जीवन जीने को मजबूर कर देते हैं। वृद्धाश्रम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। संतान माता-पिता की सेवा को कर्तव्य नहीं मानती बल्कि वे इसे बोझ मानते हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में खून के रिश्ते सिसक रहे हैं। यह अंक निकाल कर आपने सराहनीय कार्य किया है। समाज पर इसका निश्चित प्रभाव पड़ेगा।

कुलदीप मोहन त्रिवेदी | उन्नाव, उत्तर प्रदेश

 

अकेलेपन का दंश

आउटलुक के 15 मई के अंक में प्रथम दृष्टि, ‘बुजुर्ग होने की कीमत’ आलेख में उपेक्षित एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे बुजुर्ग लोगों की आवाज है। देश में गिने-चुने संयुक्त परिवार रह गए हैं। आजकल लगभग होता यह है कि शादी के तुरंत बाद नव-दंपती अपनी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं। ऐसे में बुजुर्ग तो अकेले पड़ ही जाते हैं, बच्चों को भी न दादा-दादी का साथ मिलता है न चाचा-चाची जैसे रिश्ते वे समझ पाते हैं। अलगाव तक ठीक है लेकिन पिछले कुछ सालों से एक नया ही ट्रेंड देखने में आ रहा है कि अब बच्चे बुजुर्गों के साथ मारपीट भी करने लगे हैं। उनके साथ हिंसा करने से ज्यादा घृणित कुछ नहीं हो सकता। आखिर बच्चे ऐसी हिम्मत लाते कहां से हैं, यह समझना बहुत जरूरी है। इसी अंक में प्रकाशित नजरिया, ‘सवाल तो बड़े हैं’ में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए शासन, प्रशासन और अपराधियों की गठजोड़ को समाप्त करने पर बल दिया गया है। पुरानी कोढ़ समाप्त करने में समय लगता है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में योगी को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जिन दलों से मदद मिलने की उम्मीद की जाती है वही माफियाओं के समर्थन में धुन बजाने लगती हैं। अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है और यही लोग आम जनता का जीना दूभर कर देते हैं। कोई भी राजनीतिक दल इनसे अछूता नहीं है। ऐसी बातों पर लगाम लगाना जरूरी है।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

फायदा मिले तो बात बने

15 मई के अंक में ‘आनंद दांव के पेचोखम’ लेख ने सुशासन बाबू के नाम से विख्यात नीतीश कुमार की असलियत सामने ला दी। वोट बैंक की खातिर राजनीति अपने हिसाब से रूप रंग बदलती है यह तो सुना था लेकिन स्तर गिरा कर वोट हासिल करने का उदाहरण नीतीश के राज में ही देखने को मिल रहा है। जेल मैन्युअल में फेरबदल करने के बाद आनंद मोहन को बाहर निकाला गया। जबकि मुख्यमंत्री खुद जानते हैं कि आनंद मोहन ने क्या किया था। ऐसे तो ये लोग दलित-दलित करते नहीं थकते। लेकिन जब करने की बारी आती है तो आनंद मोहन जैसे दबंग को फायदा पहुंचाते हैं। आनंद मोहन बाहर आकर फिर वही सब करेंगे, जो अब तक करते आए हैं। सरकार को आपराधिक गतिविधियों को रोकने की कोशिश करना चाहिए और नीतीश कुमार हैं कि इन सब बातों को बढ़ावा दे रही हैं। आज एक दबंग को वोट की खातिर छोड़ा है, कल को यही ट्रेंड सेट हो जाएगा और जेल में बंद सभी दबंगों को सरकार को छोड़ना ही पड़ेगा। सियासी फायदे के लिए इतना बड़ा कदम उठाने के बाद नीतीश को कितना फायदा होगा यह देखना दिलचस्प होगा।  

सौरभ सुमन | पटना, बिहार

 

तंत्र में सेंध

आनंद मोहन का जेल से छूट जाना, दुर्भाग्य की बात है। 15 अंक में रिपोर्ट, ‘आनंद दांव के पेचोखम’ से ऐसा लग रहा है कि यह सिर्फ वोट बैंक की खातिर उठाया गया कदम है। लेकिन यदि पूरे घटनाक्रम को देखें, तो पता चलता है कि ये सत्ता पर बने रहने के लिए नेताओं को हमेशा से ही दबंगों की जरूरत रहती है। चाहे कोई भी सरकार हो ऐसे लोग उनके लिए पैसा उगाहते हैं, विरोधियों को चुप कराते हैं और धमकाने का भी काम करते हैं। जाहिर है, नीतीश को भी ऐसे किसी व्यक्ति की जरूरत होगी। यही वजह है कि जेल मैन्युअल में बदलाव के बाद कानूनी तरीके से आनंद मोहन की रिहाई संभव हो पाई है। नीतीश जब उनके बेटे की सगाई में गए थे, तभी से लग रहा था कि यह मामला अलग मोड़ लेगा। यह भारत में ही संभव है कि कोई दबंग गाड़ी से निकालकर बेरहमी से किसी सरकारी अधिकारी को पीटे और गोली मार दे। जेल में भी वह मजे में रहे और फिर आराम से छूट कर बाहर आ जाए। निचली अदालत फांसी की सजा सुनाए और हाइकोर्ट फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दे। सुप्रीम कोर्ट भी उस पर मुहर लगा दे और कुछ साल बाद फिर वही खेल शुरू हो जाए। जब तंत्र में सेंध लगाना इतना आसान हो, तो फिर अपराधी डरेंगे क्यों?

सिद्धार्थ चौधरी | रोहतक, हरियाणा

 

धार्मिकता नहीं, राजनीतिक विखंडन

आउटलुक के 1 मई के अंक में, क्या ब्रिटेन भी झेलेगा बंटवारे का दर्द पढ़ा। विडंबना ही है कि अतीत का ग्रेट ब्रिटेन अब बंटवारे की राह पर है। आज के लोकतांत्रिक ब्रिटेन के लिए यह विखंडन दुर्भाग्यपूर्ण होगा। हालांकि ऋषि सुनक अकेले इस विभाजन को रोक पाएंगे, ऐसा लगता नहीं है। वह कितना भी कहें कि वह यूनाइटेड किंगडम में आए थे और यही से उन्होंने ताकत ली, लेकिन स्कॉटलैंड के लोग भी मन बना चुके हैं कि अब वे ज्यादा दिन ब्रिटेन के साथ नहीं रहेंगे। अलग देश की मांग का दर्द भारतीयों से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता। देश बांटने से समस्याएं नहीं बंट जाती। यह लोगों को समझना होगा कि वे ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। देखते हैं, सुनक और हमजा के बीच जीत किसकी होती है।

अरविन्द पुरोहित | रतलाम, मध्य प्रदेश

 

पुरस्कृत पत्र: एकाकी जीवन

बुजुर्गों के प्रति किया गया खराब व्यवहार आज के दौर की आम समस्या है। 15 मई के अंक में, ‘शोहरत, फिर एकाकी अंत’ ऐसा लेख है, जो बताता है कि चमक-दमक और सितारे जब बुलंद हों, तभी बुढ़ापे के बारे में सोच लिया जाना चाहिए। हालांकि कुछ सितारे ऐसे हैं, जो पैसा होने के बावजूद अकेले रह गए। भारत ही क्यों दुनिया की हर जगह में इंसान के बूढ़ा होने पर उसकी कीमत घट जाती है। नई पीढ़ी को बुजुर्ग बेकार की वस्तु लगने लगते हैं। यह किसी भी व्यक्ति के लिए दुखद है कि उसका आखिरी वक्त मुफलिसी में बीते। अब जरूरत है कि भारत में बुजुर्गों के लिए सामुदायिक रहने की व्यवस्था बने, ताकि बुजुर्ग आखिरी वक्त तक सम्मान से जी सकें।

रोशनी नागर | मंदसौर, मध्य प्रदेश