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22 जनवरी 2024 · JAN 22 , 2024

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पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

हर हाल खुश

8 जनवरी की आवरण कथा, ‘इन नायकों को गैर-बराबरी की सुरंग से कौन निकालेगा?’ बहुत शानदार है। सही मायनों में ये लोग 2023 के सुपर हीरो हैं। लेकिन अफसोस कि समाज ऐसे नायकों की बात नहीं करता है। आउटलुक इसलिए खास है कि वह हर उस तबके पर रोशनी डालता है, उन्हें तवज्जो देता है, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। इन मजदूरों की सोच ने बहुत प्रभावित किया। जैक पुशिंग करने वाले इन लोगों को खुद ही नहीं पता था कि ये लोग रैट होल माइनर हैं। कौन सोच सकता था कि पानी, सीवर और गैस की पाइप लाइन डालने वाले ये लोग किसी की जिंदगी बचा सकते हैं। इस लेख में कासगंज के नसीरुद्दीन ने कहा है, “ये आप लोगों का ही दिया हुआ नाम है, हालांकि हमारे काम करने का तरीका तो चूहे जैसा ही है।” देखा जाए, तो यही पंक्ति पूरे लेख, उनकी पूरी जिंदगी और हमारी सोच का सार है। सरकार के अधिकारी सिर्फ इसी एक लाइन को पढ़ लें, तो उनके सिर शर्म से झुक जाएं। चूहों से भी बदतर जिंदगी जीने वाले ये लोग फिर भी हर हाल में खुश हैं। हर व्यक्ति को चाहिए कि उनकी मदद के लिए आगे आएं।

सौरभ शुक्ला | डाल्टनगंज, रांची

 

स्थायी समाधान

इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तरकाशी की घटना बहुत ज्यादा दिल दहलाने वाली थी। आउटलुक के नए अंक (8 जनवरी) में ‘2023 के सुपर हीरो’ आवरण कथा बहुत अच्छी लगी। उस घटना की तफ्सील से जानकारी इसमें दी गई है। 41 मजदूरों का 17 दिनों तक सुरंग में फंसे रहना कोई मामूली बात नहीं थी। लेकिन उन्हीं की तरह दूसरे मजदूरों ने अपनी जान की बाजी लगाकर उन्हें बचा लिया। मशीन और टेक्नोलॉजी से आगे बढ़ कर उन्होंने अपनी हिम्मत का परिचय दिया। यह भी विडंबना ही रही कि उनकी जान एक ऐसे तरीके से बची, जिसे सरकार गैर कानूनी करार दे चुकी है। लेकिन ये नायक कुछ समय मीडिया की चमक के बाद फिर वैसी ही अंधेरी सुरंग में खो जाएंगे, जहां से इन लोगों ने मजदूरों को बचाया था। बेहतर हो कि इनके जीवन में रोशनी का स्थायी समाधान हो।

मुकुंदा रस्तोगी | मेरठ, उत्तर प्रदेश

 

असली नायक

8 जनवरी की आवरण कथा, ‘2023 के सुपर हीरो’ सच में हीरो हैं। गड्ढे खोदने वाले इन मजदूरों ने वाकई बहुत बड़ा काम किया है। आउटलुक ने इन्हें 2023 की सुर्खियों के सरताज कहा, जो बिलकुल सही है। सच पूछा जाए, तो इतने वैमनस्य भरे माहौल में ऐसे ही नायकों की जरूरत है। 41 लोगों की जान बचाना हंसी-खेल नहीं है। वह भी तब जब खुद की जिंदगी भी खतरे में आ सकती हो। ठेकेदार के साथ काम करने वाले ये मजदूर तो जानते भी नहीं कि इनके हक क्या हैं। इतनी बड़ी घटना के बाद क्या सरकार को इस तबके के लिए कोई नियम नहीं बनाना चाहिए। क्या सरकार को ऐसे मजदूरों के लिए न्यूनतम स्वास्थ्य, शिक्षा, अच्छे रहन-सहन की व्यवस्था नहीं करना चाहिए। हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का हक है। लेकिन इन लोगों की गरिमा का ख्याल आखिर कौन रखेगा।

कीर्ति | दिल्ली

 

सस्ती जान

भारत जैसे देश में जहां, आबादी का विस्फोट है, वहां मजदूर की जान की क्या कीमत होगी। आउटलुक की आवरण कथा, बहुत सारे सवाल खड़े करती है। 8 जनवरी का अंक इन मजदूरों की जरूरत, जीवन यापन, रहन-सहन सब पर सवाल उठाती है। लेकिन इनके जवाब कब और कैसे मिलेंगे यह किसी को नहीं पता। भारत में ही ऐसा दोहरा मापदंड चल सकता है कि जिस रैट होल माइनिंग पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था, उसे करने वाले लोग भी सरकार को मिल गए और सरकार ने अपना काम भी उनसे करा लिया। जिस तकनीक पर प्रतिबंध है, तो ऐसे लोग अब तक सिस्टम में कैसे हैं, जो यह काम करते हैं। लेकिन ये सवाल कौन पूछे, क्योंकि सरकार ने तो अपना काम करा लिया और कुछ ईनाम बांट कर उन्हें भूल गई। अब सरकार फिर तभी जागेगी, जब दोबारा ऐसा कोई हादसा हो जाएगा।

शंकर दोहरे | ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

बिना बात बतंगड़

आउटलुक के 8 जनवरी अंक में प्रकाशित लेख, ‘आइए संसदीय ‘तंत्र’ लोक में’ पढ़ा। संसद की सुरक्षा में सेंध को लेकर विपक्ष के हंगामे का कोई औचित्य नहीं था। लोकसभा की सुरक्षा की जवाबदेही लोकसभा स्पीकर की है, तो इस संबंध में गृह मंत्री से बयान दिलवाने की जिद पर क्यों अड़ना। विपक्षी दलों के सदस्यों ने सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की कि उनका सदन से निलंबन हो जाए। वैसे भी अभी तक विपक्षी दलों के सदस्यों ने कभी भी शांति से सदन नहीं चलने दिया है। विपक्ष का लक्ष्य भले ही सरकार को उखाड़ फेंकना हो लेकिन सरकार का लक्ष्य भारत का भविष्य उज्ज्वल सुनिश्चित है। टीएमसी के निलंबित सदस्य कल्याण बनर्जी द्वारा राज्यसभा अध्यक्ष तथा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिम्रिक्री करना भी उनकी ओछी मानसिकता दर्शाता है। दुखद तो यह है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इसमें शामिल थे।

 

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

ओछी सोच

8 जनवरी की आवरण कथा, ‘जिंदगी से बदहाल गुदड़ी के लाल’ भारत की असली तस्वीर दिखाती है। एक ओर जहां कुछ मजदूरों ने उत्तर प्रदेश से जाकर उत्तरकाशी की सुरंग में फंसे 41 मजदूर बाहर निकाला, वहीं कुछ लोग बचाने वाले लोगों के धर्म की पड़ताल करने लगे। कितना दुखद है यह सब। बचाने वाले कब से हिंदू और मुस्लिम हो गए हैं। ऐसा करने वालों को शर्म ही आना चाहिए। भारत बस कहने भर को सेक्युलर देश है। वरना यहां सेकुलरिज्म की जितनी धज्जियां उड़ाई जाती हैं, वैसा शायद ही किसी दूसरे देश में होता हो। मजदूर जब तक मजदूरी कर रहे थे किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन जैसे ही इन लोगों को थोड़ी प्रशंसा मिली, कुछ लोगों को तकलीफ हो गई कि दूसरे धर्म के लोगों को, तो एक खास खांचे में दिखाया जाता है, सारे गलत काम की तोहमत उन पर जड़ी जाती है, फिर इन्हें कैसे प्रशंसा मिल रही है। ऐसे काम में भी जो लोग जाति और धर्म लाते हैं, वे ही देश का बेड़ा गर्क कर रहे हैं।

आशुतोष झा | पटना, बिहार

 

गरीब देश के नेता

भारत गरीब देश है और यहां के नेताओं के यहां ज्यादा नहीं बस तीन-साढ़े तीन करोड़ रुपये मिलते हैं। 8 जनवरी के अंक में, ‘धीरज का कारू खजाना’ लेख बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। चुनाव आते ही छापों का खेल शुरू हो जाता है। भ्रष्टाचार खत्म करने का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ कांग्रेस को डराने का खेल है। मोदी सरकार अब जनता के बीच जाकर बताएगी कि देखिए कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य धीरज साहू के घर से इतने रुपये मिले हैं। भाजपा ने छापे मार कर अपने लिए बस मुद्दा तलाशा है। चुनाव के वक्त इसका बहुत असर पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के तमाम नेता इस मुद्दे को ले उड़े हैं। अब कांग्रेस कितनी भी सफाई दे दे कि उसका धीरज साहू या उसके पैसे से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जो नुकसान होना था वह तो हो चुका है।

चंद्र महतो | रांची, झारखंड

 

चुनावी स्टंट

हेमंत सोरेन ईडी के राडार पर हैं और अब कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य धीरज साहू ने भाजपा को प्लेट में चुनावी मुद्दा परोस दिया है। ‘धीरज का कारू खजाना’ (8 जनवरी) में झारखंड की चुनावी बिसात की भी जानकारी मिली। प्रदेश भाजपा ने तो विरोध प्रदर्शन शुरू कर ही दिया है। धीरज साहू की गिरफ्तारी के बहाने भाजपा कांग्रेस को एकदम बैकफुट पर ला देगी। जैसे ही चुनाव खत्म होंगे, भाजपा भूल जाएगी। अगर झारखंड में भाजपा सरकार बना लेती है, तो हो सकता है कुछ दिन बाद यही धीरज साहू, ‘पवित्र’ होकर भाजपा में शामिल हो जाएं। राजनीति में सब संभव है। पहले भी ऐसा कई बार दूसरे राज्यों में हो चुका है। जिन लोगों पर भाजपा हमलावर रही है, उन्हीं लोगों को फिर पार्टी में शामिल कर उनकी तारीफ करती रहती है। ऐसे छापों पर अब जनता का कोई भरोसा नहीं है। जनता भी समझती है कि यह कोरा चुनावी स्टंट है और इन पैसों की जब्ती से भी राज्य या देश के किसी व्यक्ति का कुछ भला होने वाला नहीं है। ऐसे स्टंट में अब जनता की कोई रुचि नहीं है।

के.एस. राणा | हिसार, हरियाणा

 

कुशल प्रबंधन

25 दिसंबर की आवरण कथा, ‘जीत का मोदी सूत्र’ जादूगरी नहीं बल्कि कुशल प्रबंधन है, जिसे कांग्रेस नहीं समझ पाई। कांग्रेस के लिए जाति जनगणना मुद्दा था लेकिन उसने इस पर सिर्फ सनसनी फैलाई। यही कारण है कि हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में जनता का कांग्रेस के प्रति रुझान होने के बाद भी भाजपा सामुदायिक नेतृत्व के बल पर चुनाव जीत गई।

डॉ. फूल सिंह नरवरिया | ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

पुरस्कृत पत्र: निःस्वार्थ मदद

‘जिंदगी से बदहाल गुदड़ी के लाल’ आवरण कथा (8 जनवरी) दिल दुखाती है। हर तरह की सुख-सुविधा मिलने वाली जिंदगी में भी हमें कमी नजर आती है। एक ये लोग हैं, जो इतने खराब हालात में भी सकारात्मक रहते हैं। हर हाल में खुश रहने वाले इन लोगों के मन में न सरकार के प्रति बहुत ज्यादा गुस्सा है, न इनका शोषण करने वालों के खिलाफ नफरत। इन लोगों ने जिस तरह मदद का हाथ उठाया उससे लगा कि मदद को इतना ही निःस्वार्थ होना चाहिए। हम लोग, जो खुद को पढ़ा-लिखा बताते हैं, कभी भी इन लोगों की बराबरी नहीं कर पाएंगे। ये लोग हमसे कहीं ऊंचे स्थान पर हैं। आए दिन अपनी मांगों के लिए हड़ताल करने वाले सरकारी कर्मचारियों को इन लोगों से सीख लेनी चाहिए।

पुष्कर मिश्रा | बांदा, उत्तर प्रदेश