सजावटी नायिकाएं
5 जनवरी की आवरण कथा, ‘नई उमर की नई फसल’ बॉलीवुड के दोगलेपन को बताती है। नायकों की यहां हमेशा से पूजा होती रही है। नायिकाओं को हर दौर में साबित करना पड़ा है। यह आज भी है। फर्क बस यह है कि अब नायिकाओं के काम को भी थोड़ा सराहा जाने लगा है। बॉलीवुड का रिवाज रहा है कि वह नएपन का दावा जरूर करता है, लेकिन दोहराता वह पुरानी चीजों से ही है। कहानियों में भले ही ताजगी न हो, लेकिन कलाकार उसे नए चाहिए। घिसी-पिटी कहानियों में भी नए नायक-नायिकाएं चाहिए। परदे पर नायिकाओं के लिए नाचने-गाने के अलावा दो-चार संवाद की ही गुंजाइश रहती है। नायक को ही फिल्म की पूरी जिम्मेदारी दे दी जाती है। इसकी वजह है कि नायिकाएं यदि नायक से आगे कुछ कर जाएं, तो समाज को ही यह बात हजम नहीं होती। इसलिए यदि बॉलीवुड में नई लड़कियां आती भी हैं, तो एक ही तरह के काम से दर्शक ऊब जाते हैं और उनकी जगह नई लड़की ले लेती है।
भानुतारा अग्रवाल | बड़ौदा, गुजरात
हाशिये पर नायिकाएं
बॉलीवुड में स्थायी कुछ नहीं होता। यह बात आज के दौर में यकीन से बोली जा सकती है। 5 जनवरी के अंक में ‘नई उमर की नई फसल’ में नई नायिकाओं के बारे में बात की गई है। इसमें एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आजकल मध्यमवर्गीय परिवार भी अपने घर की बेटियों का फिल्मों में आना बुरा नहीं समझते। यही वजह है कि हर दिन किसी न किसी नई लड़की की आमद फिल्म उद्योग में हो रही है। जब दर्जन भर नायिकाएं होंगी, तो जाहिर सी बात है, अलग-अलग चेहरे दिखाई देंगे। वैसे भी हिंदी फिल्मों में नायिकाओं के लिए मुट्ठी भर काम होता है। बाकी नायिकाएं, तो पूरी फिल्म में हाशिये पर ही रहती हैं। जब ये नायिकाएं दो-चार फिल्में कर लेती हैं, तो अच्छी भूमिका के अभाव में जल्दी मुरझा जाती हैं।
प्रकाश सिंह | अंबाला, पंजाब
नायिका प्रधान कुछ नहीं
5 नवंबर की आवरण कथा, ‘नई उमर की नई फसल’ बहुत अच्छी लगी। यह आवरण कथा नायिका प्रधान फिल्मों की धारणा को भी तोड़ती है। बॉलीवुड में बीच में एक बड़ा हल्ला मचा था, ‘नायिका प्रधान फिल्में’ लेकिन इसकी असलियत कुछ और ही थी। गौर कीजिए कि ज्यादातर ऐसी फिल्में, जिसमें नायिका की भूमिका ज्यादा या महत्वपूर्ण थी, उनके सामने कमजोर नायक थे या उनके मुकबले नए थे। इसी से पता चलता है कि बॉलीवुड नायिकाओं को लेकर क्या सोचता है। क्योंकि बॉलीवुड यदि नायिकाओं को उतनी ही तवज्जो दे, तो नायक भी उसके सामने दमदार ही रखा जाएगा, ताकि नायिकाएं खुद को बेहतर साबित कर सकें। दो-चार फिल्मों के बाद परदे पर नायिकाओं को मां-भाभी की भूमिकाएं एहसान के साथ दी जाती हैं, जबकि नायक तब भी नई लड़की के साथ रोमांस करता दिखता है। दर्शकों को भी नायिकाएं वैसी चाहिए, जो ठुमके लगाए, गाने गाए और नायक के पीछे खड़ी रह कर एकाध संवाद बोल दे। इसलिए नई लड़कियों की नई फसल लहलहाती रहती है।
चैतन्य त्रिपाठी | पटना, बिहार
गलती किसकी
5 जनवरी अंक में, ‘इंडिगो जमीं पर’ हवाई संकट के बारे में अच्छा लेख है। इंडिगो ने संकट से बचने के लिए अपनी हवाई सेवाएं निरस्त कर दीं। लेकिन इससे यात्रियों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा इसके बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। सरकार ने अब तक एयरलाइंस के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या कोई कंपनी किसी मजबूत देश और सरकार को इस हद तक हिला सकती है? इंडिगो के कारण देश की आधी उड़ानें प्रभावित हो गईं और सरकार कुछ नहीं कर पाई। सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या किसी एक एयरलाइंस पर इतना भरोसा सही है? इससे देश की छवि खराब हुई और जनता का सरकार से भरोसा उठ गया। यह ज्यादा बड़ा नुकसान है। देश आज उस बिंदु पर खड़ा है, जहां कोई भी पक्ष पूर्णतः निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता। अब कहा जा रहा है कि इंडिगो ने अपने संसाधनों और वास्तविक क्षमता का अनुमान लगाने में चूक की है, तो क्या यह सिर्फ कंपनी का दोष है। यह दोष सरकार का भी उतना ही है।
शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी | फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश
चमकदार व्यक्तित्व
धर्मेंद्र का जाना फिल्म उद्योग से एक अच्छे कलाकार का जाना है। उन्होंने अपने वक्त में बहुत अच्छी भूमिकाएं निभाईं और फिल्म उद्योग को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया। लेकिन बाद में वे एक तरह की भूमिकाओं में कैद होकर रह गए थे। हिंदी फिल्म उद्योग की यही विफलता है कि वह किसी भी कलाकार को एक फ्रेम में बांध देता है। बाद के दिनों में लगभग हर फिल्म में उन्हें हीमैन के रूप में ही दिखाए जाने का चलन बढ़ गया। उन्होंने शायद इसे बदलने की कोशिश भी नहीं की होगी। उस रूप में भी वे चमकते रहे। वक्त बदला, तो वे बदल नहीं पाए, जैसे अमिताभ बच्चन बदल गए। फिर भी धर्मेंद्र अपनी भूमिकाओं की वजह से इतिहास में दर्ज हैं। (22 दिसंबर, ‘जेंटलमैन से हीमैन तक का सफर’)
सोनाली शर्मा | इंदौर, मध्य प्रदेश
हर स्तर पर तैयारी जरूरी
22 दिसंबर के अंक में लेख, ‘बढ़ती आपदा’ दिल्ली की प्रदूषित हवा के बारे में बताती है। इस लेख की शुरुआत में लिखा है कि नए-नए बने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शिकायत की कि कुछ देर टहलने के बाद उनकी तबीयत नासाज हो गई। यह बड़ा ही दूर्भाग्यपूर्ण है। सीजेआइ कुछ कार्रवाई करने के बजाय खुद ही शिकायत कर रहे हैं। जब सीजेआइ का यह हाल है, तो आम आदमी का क्या होगा। यह आपदा हर साल बढ़ती ही जा रही है। देश के लोगों को साफ हवा के लिए लड़ना पड़ रहा है। दिल्ली राजधानी है, इसलिए चर्चा में बनी रहती है। लेकिन देश के कई बड़े शहरों में भी वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। आजकल कई छोटे शहरों में भी एक्यूआइ का स्तर चिंताजनक हो गया है। इस बारे में समाधान के लिए सभी नागरिकों को जोड़ना होगा। हर स्तर तैयारी करनी होगी। वरना प्रदूषण बस खबरों में हमेशा बना रहेगा और इसकी रोकथाम के लिए सिर्फ कमेटियां बनेंगी। बेहतर हो कि हर नागरिक अपने स्तर पर जहां संभव है, वहां पेड़ लगाएं, आसपास हरियाली का ध्यान रखें, सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें। वरना आने वाले साल में दिल्ली में रहने वाला कोई नहीं मिलेगा।
अशोक चौधरी | जोधपुर, राजस्थान
आपदा का इलाज
22 दिसंबर के अंक में, ‘बढ़ती आपदा’ अच्छा लेख है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश, जो कुछ कुछ देर टहलने पर बीमार हो गए, उनसे मुझे कहना है कि वे बीमार होने पर इसका प्रचार करने के बजाय कोई भी बीमार न पड़े इस पर ध्यान दें। सरकार को भी चाहिए कि वह सीजेआइ की बात को गंभीरता से ले। राहुल गांधी ने संसद में चर्चा करने के लिए बोला है, तो इस पर भी बात होनी चाहिए। प्रदूषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है। इसलिए जरूरी है कि इस पर कोई ठोस निर्णय लिया जाए। विश्व के कई शहर पहले प्रदूषित थे, लेकिन वहां मेहनत की गई, तो प्रदूषण पूरी तरह समाप्त हो गया। दिल्ली में भी ऐसा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने कहा उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, उनके पास कानून की छड़ी है, वे उससे ही इलाज करें।
कैलाश सिधवानी | आगरा, उत्तर प्रदेश
लड़कियों का दम
22 दिसंबर के अंक में, ‘बेमिसाल रोशन लड़कियां’ जज्बे की रोशनी से भरी लड़कियों की चमकदार कहानी है। भारत की बेटियां नया सवेरा लेकर आई हैं। इस लेख ने न केवल महिलाओं की अद्भुत उपलब्धियों को उजागर किया, बल्कि उनके साहस, संघर्ष और नेतृत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत भी किया। क्रिकेट की पिच पर निर्णायक इनिंग्स हों, टी-20 ब्लाइंड क्रिकेट में ऐतिहासिक विजय, या कबड्डी और एथलेटिक्स के अंतरराष्ट्रीय मंच, हर जगह इन लड़कियों ने सफलता का परचम लहराया है। भारतीय बेटियां अब केवल प्रतिभागी नहीं, विजेता हैं। इन लड़कियों ने साहस, नेतृत्व और प्रेरणा की मिसाल कायम की है। 1970 और 80 के दशक में परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत थीं। खेलों में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक हिचक, सुविधाओं की कमी और पारंपरिक मान्यताओं के कारण सीमित थी। कुश्ती, बॉक्सिंग, क्रिकेट—सभी क्षेत्रों को ‘पुरुषप्रधान’ माना जाता था। उस समय किसी लड़की का मैदान में उतरना केवल खेल नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और साहस की साहसिक काम था। अब परिस्थितियां बदलीं, तो लड़कियों ने भी दिखा दिया कि उनमें दम है। अब नारा होना चाहिए, बेटियां पढ़ाओ, बेटियां खिलाओ।
बृजेश कुमार | मथुरा, उत्तर प्रदेश
पुरस्कृत पत्रः धर्म के बहाने
सरकार का काम उजाड़ना नहीं, बल्कि बचाना होना चाहिए। नासिक की घटना बताती है कि सरकार ऐसा नहीं सोचती। पर्यावरण हमारी प्राथमिकता सूची से बाहर होता जा रहा है। विकास के नाम पर जंगल काटना नया फैशन है। सड़कें, हाइवे, एयरपोर्ट के लिए खेती की जमीन, हरे-भरे जंगलों को साफ करने के बाद महाराष्ट्र सरकार सिंहस्थ के लिए तपोवन काट रही है। सिंहस्थ एक महीने में खत्म हो जाएगा, लेकिन क्या इतने पेड़ एक महीने में जंगल बन सकते हैं? आश्चर्य होता है कि सरकार में बैठे लोग इतना भी नहीं सोच पाते। सरकार सोच रही है शायद धर्म के नाम पर वह छूट ले सकती है। जब जंगल साफ हो जाएगा, तो सरकार यहां इमारत बना कर मुनाफा कमाएगी। (5 जनवरी, ‘महाराष्ट्र का चिपको आंदोलन।’)
विपुल सरदेसाई|कोल्हापुर, महाराष्ट्र