संकल्प लेने का समय
16 फरवरी की आवरण कथा, ‘गणराज्य के दोराहे’ पढ़कर लगा कि भारत ने गणतंत्र के रूप में पिछले 76 वर्षों में जो भी प्रगति की है, उसके लिए सभी को गर्व होना चाहिए। यह एक तथ्य है कि तमाम समस्याओं और चुनौतियों के बावजूद भारत ने एक ओर जहां स्वयं को सफल गणतंत्र सिद्ध किया वहीं दूसरी ओर विश्व के प्रमुख राष्ट्र के भी रूप में भी खुद को उभारा है। आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की स्थिति कहीं अधिक सुदृढ़ है। इसी कारण 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखा देखा जा रहा है। इस स्वप्न को साकार करने के लिए संकल्पित होने का यही सही समय है। यह संतोष का विषय है कि देश सही दिशा में बढ़ता हुआ दिख रहा है। इसके साथ विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां भी प्राप्त कर रहा है लेकिन इसे लेकर सजग रहने की भी आवश्यकता है। विकसित भारत के लक्ष्य पाने के लिए हालांकि अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति कैसे हो इसकी चिंता शासन प्रशासन के लोगों के साथ-साथ आम जनता को भी करनी होगी। यह ठीक नहीं है कि जिन समस्याओं से हमें अब तक मुक्ति पा लेनी चाहिए वे पीछा नहीं छोड़ रही हैं। गहराई से सोचना चाहिए कि नौकरशाही का भ्रष्टाचार, वायु एवं जल प्रदूषण में वृद्धि, शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर उठते प्रश्न और शहरी ढांचे में उपेक्षित सुधार के अभाव आदि ने हमारी प्रगति को बाधित कर रखा है। यह समझा जाना चाहिए कि इन बाधाओं को दूर करके ही विकसित देश के सपने को साकार किया जा सकता है।
शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी | फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश
गणतंत्र की चुनौतियां
16 फरवरी की आवरण कथा, ‘गणराज्य के दोराहे’ गणतंत्र के विकास की आर्थिक असमानता को रेखांकित करती है। कहा जा रहा है कि हम विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था हैं। ऐसा होने के बावजूद हमारी प्रति व्यक्ति आय, जो ढाई लाख से ऊपर बताई जाती है, उसमें आधे से ज्यादा हिस्सा ऊपरी तबके का है। जो एक फीसदी है। ऊपरी दस फीसदी आबादी की आय घटा दें, तो तकरीबन नब्बे फीसदी आबादी की आय सालाना सत्तर हजार से नीचे बैठती है। इसका जिक्र इसलिए आवश्यक है क्योंकि मजबूत होती अर्थव्यवस्था का हम ढोल पीटते हैं। जबकि ऐसा है कुछ नहीं। इसी अंक में साइना नेहवाल के बैडमिंटन से संन्यास के बारे में लेख पढ़ा। वे भारत में महिला बैडमिंटन का चेहरा रहीं हैं। ‘संघर्ष और सफलता की दास्तान’ लेख में उनके करियर के बारे में बहुत अच्छे ढंग से बताया गया है। जावेद अख्तर का जादू इस उम्र में भी चल रहा है। ‘सफर अभी जारी है’ में उनके बारे में जानना अच्छा लगा। रचनात्मकता ताउम्र चलती है, तभी वे आज भी इतने सक्रिय हैं। ‘‘नबीन’ नेतृत्व के अक्स’ में भाजपा की कार्यशैली भी झलकती है। नितिन नबीन को सबसे कम उम्र का अध्यक्ष बना कर मोदी और शाह ने भाजपा पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। ‘डॉक्टरी के सपने पर डाका’ अच्छा लेख है। इसी लेख से पता चला कि ईरान में मेडिकल की पढ़ाई सस्ती है और कश्मीर के बहुत से छात्र वहां पढ़ने जाते हैं।
यशवन्त पाल सिंह | वाराणसी, उत्तर प्रदेश
नई पीढ़ी को संदेश
16 फरवरी के अंक में, ‘‘नवीन’ नेतृत्व के अक्स’ लेख भाजपा की सोच को ठीक ढंग से विश्लेषित करता है। बिहार से पांच बार के विधायक नितिन नवीन भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। उन्होंने 2023 और 2024 में छत्तीसगढ़ में भाजपा के बदलाव और जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युवा चेहरों को लाने का फायदा यह होता है कि इससे समाज में सकारात्मक संदेश जाता है। नई पीढ़ी राजनीति में आने के बारे में सोचती है। इससे भरोसा होता है कि यदि काम करने का जज्बा हो, तो मौका जरूर मिलता है। बस अब देखना यह है कि क्या नबीन प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की छाया से बाहर आ पाएंगे? सभी इस सवाल का उत्तर जानने के लिए बेचैन हैं। लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा। यह भी संभव है कि उनका चुनाव इसलिए किया गया हो क्योंकि उनका राजनैतिक कद अभी बड़ा नहीं है, तो उन्हें स्वतंत्र फैसले लेने से रोकना आसान हो सकता है। आने वाला वक्त ही बताएगा कि नवीन कैसे अध्यक्ष साबित होंगे।
बृजेश कुमार|मथुरा, उत्तर प्रदेश
संयम सीखने की दरकार
प्रथम दृष्टि में, ‘खबरो की विश्वसनीयता’ (16 फरवरी) में मार्क टली के बारे में पढ़ना अच्छा लगा। वे वाकई बहुत विश्वसनीय पत्रकार थे। बीबीसी के प्रखर संवाददाता टली भारतीय आबोहवा में ऐसे रच-बस गए थे कि उन्हें भारतीय ही माना जाना चाहिए। मार्क टली ने पत्रकारिता को नई दृष्टि दी थी। वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और बहुलता में गहरी आस्था रखते थे। भले ही उनकी रिपोर्टिंग और लेखन की भाषा उम्दा अंग्रेजी हो पर उसमें सुगंध हिंदी और इस भाषा से जुड़े बहुसंख्यक जनमानस की होती थी। उनकी रिपोर्टिंग में भारतीय आम जनता की सोच घुली रहती थी। जब वे किसी खबर पर काम कर रहे होते थे, तब आश्वस्ति रहती थी कि खबर का सच ही बाहर आएगा। उन्होंने पत्रकारिता को प्रोफेशन के बजाय मिशन की तरह जिया। तभी वे मूल्य आधारित पत्रकारिता कर पाए। प्रामाणिकता और निष्पक्षता उनकी खबरों का आधार रही। आज के सनसनीखेज और गलाफाड़ू पत्रकारों को उनसे संयम और संतुलित पत्रकारिता सीखने की बहुत जरूरत है।
डॉ. हर्षवर्द्धन | पटना, बिहार
ऊंचा कद
16 फरवरी के अंक में, ‘अजातशत्रु मराठा’ में अजित पवार के बारे में सही लिखा है। वे वाकई में अजातशत्रु थे। उनमें एक तरह की जिद थी, जो वे ठान लेते थे, करके रहते थे। हारना न उन्हें आता था, न उन्हें पसंद था। अजित 36 साल के राजनैतिक जीवन में एक भी चुनाव इसलिए नहीं हारे क्योंकि वे जनता से संवाद बनाए रखते थे। यह भले ही कहा जाता रहे कि उन्होंने शरद पवार से राजनीति के दांवपेच सीखे लेकिन सच्चाई तो यही है कि वे शुरू से ही राजनीति में माहिर थे। उन्हें अपनी क्षमता पर भरोसा था इसलिए उन्होंने शरद पवार के उस फैसले का विरोध किया, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को राकांपा प्रमुख बना दिया था। शरद पवार ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे जानते थे कि यदि उन्होंने अजित को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाया, तो उनका कद बहुत ऊंचा हो जाएगा। भले ही वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री न बन सके, लेकिन उन्होंने राजनीति में जो जगह हासिल की वो किसी मुखिया के पद से भी बहुत बड़ी है।
सुहास भिड़े | मुंबई, महाराष्ट्र
खबरों की विश्वसनीयता
फेक न्यूज के दौर में आज की पीढ़ी समझ ही नहीं सकती कि मार्क टली होने के क्या मायने हैं। अगर आज की पीढ़ी के बच्चे मार्क टली के योगदान के बारे में पढ़े, तो उन्हें लगेगा कि यह कोरी कल्पना है। आज के दौर में जब हर खबर को जानने के बाद समझने की जरूरत है होती है, उसकी विश्वसनीयता जांचना जरूरी होता है, तब मार्क टली का जाना अखरता है। हालांकि वे लंबे समय से खबरों की दुनिया में सक्रिय नहीं थे लेकिन उन्होंने जो सटीक और प्रमाणिक खबरों की आदत लोगों में डाली थी, वह पीढ़ी आज भी उन्हें याद करती है। अब खबरें नहीं बल्कि फेक न्यूज ज्यादा है। तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पहले भी पेश किया जाता था। लेकिन अब तो विचार ही सबसे महत्वपूर्ण है। सब अपने-अपने विचार की सुविधा से खबरें लिखते या दिखाते हैं। अब वाकई यह समझना कठिन हो गया है कि कौन सी खबर सही है और कौन सी गलत। पहले संवाददाता खुद ही सही खबरें जनता तक पहुंचाने को अपनी जिम्मेदारी समझते थे। लेकिन अब बस न्यूज होना चाहिए फिर भले ही बाद में वह फेक निकल जाए। अगर तथ्य गलत पाए गए, तो बाद में देखा जाएगा। इसमें भी कोढ़ में खाज यह हुई कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ने खबरों की दुनिया पर डाका डाल दिया है। अब समझना मुश्किल है कि कौन-सी खबर सही है और कौन सी नहीं। टीवी की ब्रेकिंग न्यूज को मोबाइल के डिजिटल दौर ने बिलकुल बदल दिया है। (‘खबरो की विश्वसनीयता’ (16 फरवरी, 2026)
राजेश पाराशर | भिवानी, हरियाणा
जल ही मौत
‘जल ही जीवन है,’ कहावत इंदौर में बिलकुल पलट गई। वहां दूषित पानी से जो हुआ, उससे कहा जा सकता है कि जल ने ही ले लिया जीवन। विकसित देश बनने की दौड़ में हम ऐसे भाग रहे हैं कि हमें यह भी खयाल नहीं कि जो लोग दौड़ नहीं सकते उनका भी ध्यान रखना पड़ता है। सारे दरवाजे सिर्फ व्यापारियों के लिए नहीं खोले जाते, कुछ आम नागरिकों के लिए भी होना जरूरी होते हैं। (‘अफसोस बहुत, जवाबदेही कोई नहीं’, 2 फरवरी 2026)
प्रमोद कुमार साहू | धार, मध्य प्रदेश
पुरस्कृत पत्रः गणतंत्र की यात्रा
भारत ने अपना संविधान बनने के बाद से लंबी यात्रा तय की है। पिछले 76 साल में भारत ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। चाहे वह राजनैतिक हों, आर्थिक हों या सामाजिक। किसी भी देश को बनाने में उसकी नीतियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। देश ने इन वर्षों में युद्ध देखे, बड़े आंदोलन देखे, कई बार भीषण दंगे देखे फिर भी कारवां बढ़ता गया। सरकारें आईं गईं लेकिन संविधान नजर सब पर बराबर बनी रही। विदेश नीति पर कभी हमने मात खाई, कभी हमने आंखें दिखाईं। कभी किसी सरकार के गलत फैसले ने हमें पीछे धकेला, तो कभी किसी सरकार के कदम पर हमारा सीना चौड़ा हुआ। यही हमारे गणतंत्र की खूबसूरती है, जिसे हमें बनाए रखना है। (‘किस-किस मुकाम से गुजरा गणंत्र’, 16 फरवरी 2026)
साधना शर्मा|उदयपुर, राजस्थान