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कब बंद होगा युद्ध

आउटलुक के 30 मार्च के अंक में, ‘मोर्चे पर अब समूची दुनिया’ में युद्ध का तथ्यपरक विश्लेषण है। फिलहाल यह युद्ध रुकने वाला नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के जिस तरह ईरान के विरुद्ध बयान आ रहे हैं, उससे यही लगता है कि ईरान अपनी तरफ से जवाबी हमले रोकने वाला नहीं है। अमेरिका और इज्राएल ईरान के सर्वोच्च नेता को मारने के बाद उनके उत्तराधिकारी मोजत्बा को भी मारने की फिराक में हैं। उधर, ईरान ने कसम खाई है कि वह अंतिम सांस तक अपने नेता और मासूम बच्चों की मौत का बदला अमेरिका से लेगा। अमेरिका, इज्राएल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़े संकट के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है। राजनयिक स्तर पर दुनिया भर के नेता बातचीत के जरिए इस तनाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कठिन दौर है, सभी देशों को धैर्य रखना होगा।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

उम्दा अंक

30 मार्च के अंक में, ‘मोर्चे पर अब समूची दुनिया’ युद्ध के हाल सरलता से समझाती है। अमेरिका का ईरान में सत्ता परिवर्तन का उद्देश्य नाकाम होता नजर आ रहा है। हालत ऐसी लग रही है लड़ाई लंबी चलेगी। ऐसा हुआ, तो तेल संकट और गहराएगा। इसी अंक में नेपाल चुनाव के बारे में जाना। बालेन्दु शाह की स्वतंत्र पार्टी की भारी विजय ने सभी पुरानी पार्टियों को धूल चटा दी है। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, (सियासत के ‘बागी’ को ताज)। नीतीश कुमार का राज्यसभा की ओर करने तक तो ठीक था लेकिन निशांत कुमार को किस गणित के तहत जदयू में लाया गया है, यह समझ से परे है, (‘विरासत बचाएं निःशांत’)। अन्नाद्रमुक से तीन बार के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे पनीरसेल्वम का द्रमुक के साथ जाना भले ही अस्तित्व की लड़ाई हो लेकिन यह निर्णय समीकरण बदल सकता है, (‘ओपीएस द्रमुक के दरवाजे’)। भारत का तीसरी बार टी20 में चैम्पियन बनना जसप्रीत बुमराह और संजू सैमसन की बदौलत हुआ। इस तरह भारत झंडा गाड़ प्रदर्शन से क्रिकेट की दुनिया में अव्वल बन गया, (‘हैट्रिक के छक्के-चौके’)। आइटम गीत के रूप में नारी देह की भोंडी नुमाइश कोई नई नहीं है, (‘स्क्रीन पर सजी स्त्री देह’)। शहरनामा में जलेबी के लिए मशहूर  हरियाणा  के कस्बे गोहाना की उम्दा जानकारी है।

यशवन्त पाल सिंह | वाराणसी, उत्तर प्रदेश

 

कम आंकने की भूल

30 मार्च की आवरण कथा, ‘जुनूनी जंगमंच’ पढ़कर लगा कि अमेरिका-इज्राएल का ईरान युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि व्यापक भू-राजनैतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। इस युद्ध में ईरान को भारी जनहानि हुई है लेकिन अमेरिका और इज्राएल भी उससे अछूते नहीं रहे। अमेरिकी सैनिकों की मौत, सैन्य उपकरणों का नुकसान और तेल बाजार में अस्थिरता अमेरिका के लिए चुनौती है, जबकि इज्राएल को मिसाइल हमलों और आर्थिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। युद्ध जारी रखने के पीछे ईरान का मुख्य कारण उसकी रणनीतिक सोच है। वह मानता है कि वह दृढ़ता दिखाएगा, तो अमेरिका और इज्राएल को एक न एक दिन पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। इसी कारण धमकियों के बावजूद संघर्ष जारी है। ईरान यह भी समझता है लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले इज्राएल और अमेरिका में जनमत महत्वपूर्ण है। अमेरिका में युद्ध का विरोध अधिक और समर्थन कम है। ईरान यह संदेश भी देना चाहता है कि भविष्य में ईरान को कम आंकने की भूल न करे। अमेरिका युद्ध के पहले सप्ताह में ही लगभग 12 खरब डॉलर का नुकसान उठा चुका है। इस युद्ध का समाधान नहीं होता, तो पूरी पश्चिम एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रह सकती है।

शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी|फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश

 

नया इतिहास

30 मार्च के अंक में टी20 विश्व कप विजेता टीम इंडिया से जुड़ा अच्छा लेख पढ़ने को मिला। इस लेख में (‘हैट्रिक के छक्के-चौक्के’) क्रिकेट को सिर्फ खेल नहीं, बल्कि भावना के रूप में प्रस्तुत किया गया। टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल में भारत ने न्यूजीलैंड को हराकर तीसरी बार खिताब जीत दर्ज करके इतिहास रच दिया। कप्तान सूर्यकुमार यादव की अगुआई में टीम इंडिया ने तीसरी बार टी20 वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम किया। खास बात यह रही कि भारत ने लगातार दूसरी बार यह ट्रॉफी जीती और पहली बार अपने ही घर में विश्व चैंपियन बना। टीम इंडिया ने खुद को विश्व चैंपियन के रूप में स्थापित कर दिखा दिया कि टीम इंडिया मौजूदा समय में विश्व की सबसे शक्तिशाली टीम है। बैटिंग हो, या बॉलिंग टीम इंडिया इस समय विश्व की किसी भी टी20 टीम से इक्कीस ही है। टीम इंडिया इसी तरह आगे बढ़ती रहे और लोगों को खुशी देती रहे।

विजय किशोर तिवारी | नई दिल्ली

 

शानदार जीत

30 मार्च के अंक में, ‘हैट्रिक के छक्के-चौक्के’ अच्छा लेख है। टीम इंडिया की जीत ने देशवासियों को भी उत्साह से भर दिया। लगातार दो टी20 वर्ल्ड कप जीतना मायने रखता है। घरेलू मैदान पर अक्सर भारतीय टीम दबाव में आ जाती है। लेकिन इस बार वह इस दबाव से उबर गई, यह देख अच्छा लगा। निश्चित तौर पर टीम अपने अच्छे दौर से गुजर रही है। अब खिलाड़ियों को चाहिए कि वे यही प्रदर्शन बनाए रखें, क्योंकि जीत को बरकरार रखना ही सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस बार देखने में आया कि टीम इंडिया दबाव में भी शांत रही। उसने दक्षिण अफ्रीका की हार को खुद पर हावी नहीं होने दिया, क्योंकि एक हार के बाद अक्सर खिलाड़ियों का उत्साह खत्म हो जाता है और खेल बिखर जाता है। सभी को लग रहा था कि अभिषेक शर्मा खराब फॉर्म में चल रहे हैं। लेकिन उन्होंने यह बात गलत साबित की और बहुत अच्छा खेले। बुमराह और संजू सैमसन के अलावा भी सभी खिलाड़ियों ने जान लगा दी। इस जीत से यह तो पता चलता ही है कि मेहनत का कोई तोड़ नहीं है। सभी खिलाड़ियों ने जी-तोड़ मेहनत की, जिसका नतीजा जीत के रूप में देखने को मिला। इसके लिए कोच और मैनेजर को भी धन्यवाद दिया जाना चाहिए, जिन लोगों ने टीम को एक सूत्र में बांध कर रखा।

प्रमोद कुमार मिश्रा | जोधपुर, राजस्थान

 

अहमियत विहीन

सीधी सी बात है कि राजनीति में जो नेता अपनी उपयोगिता की मियाद पूरी कर जाते हैं, उन्हें सम्मानजनक ढंग से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। बिहार में लंबी राजनैतिक पारी खेलने वाले नीतीश कुमार के साथ भी यही हुआ। उन्हें राज्यसभा की गरिमापूर्ण लेकिन सूबे की राजनीति से कोसों दूर ले जाकर भाजपा ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। भाजपा ने बिहार में अपना वर्चस्व बनाने के लिए बहुत सोची-समझी चाल चली है। भाजपा की यह पुरानी फितरत रही है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों का स्वागत तो करती है, लेकिन उन्हें सत्ता में स्थायी साझेदार नहीं बनने देती। असम गण परिषद से लेकर शिवसेना और महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी तक के घटनाक्रम उसके उदाहरण हैं। ऐसे में नीतीश का बिहार से बाहर जाना आश्चर्य में नहीं डालता। (‘नीतीश चुप्पी के मायने’, 30 मार्च)

डॉ. हर्षवर्द्धन कुमार | पटना, बिहार

 

एकता का सपना

16 मार्च के अंक में, ‘एक गांव जाति-मुक्त’ पढ़कर एहसास हुआ कि जो सपना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, महात्मा ज्योतिबा फुले और छत्रपति साहूजी महाराज जी जैसे राष्ट्र नायकों ने देखा था वह अब सच होता दिख रहा है। जाति, धर्म की जंजीरों की जकड़न से मुक्त भारत आज विकास के पथ पर अग्रसर है। जहां एक ओर गंगा जमुनी तहजीब घर-घर एकता-अखंडता की मिसाल कायम कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ हमारे जांबाज सिपाही सरहद पर जाति-धर्म भुलाकर एकजुट होकर अपने शौर्य पराक्रम से दुश्मनों को उनकी असली औकात दिखा रहे हैं। जाति भूलो, धर्म भूलो, पर राष्ट्रधर्म, मानव धर्म न भूलो। यही सोच एक दिन भारत को विश्वगुरु के सिंहासन पर विराजमान करेगी।

विमल वर्मा | पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

 

हर गांव हो ऐसा

16 मार्च के अंक में, ‘एक गांव जाति-मुक्त’ अच्छा लेख है। इस लेख से उम्मीद जगती है कि भारत के गांवों में अभी भी सुधार की गुंजाइश है। हर तरफ से निराश करने वाली खबरों के बीच यह पढ़ कर सुखद लगता है कि कुछ लोग अभी भी मौजूद हैं, जो जाति को बहुत सी बातों के ऊपर रखते हैं। अगर भारत से जाति व्यवस्था खत्म हो जाए, तो बहुत सी समस्याओं का हल खुद ही हो जाएगा। अगर कोई गांव ऐसी कोशिश कर रहा है, तो यह सराहनीय है।

प्रीति वाल्मीकी | दिल्ली

 

पुरस्कृत पत्रः पुरस्कार के बहाने

दो देश अपने वर्चस्व की झूठी लड़ाई और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के लिए पूरी दुनिया के लिए मुसीबत बन गए हैं। दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी सनक से लाखों बच्चे बेघर और अनाथ हो गए हैं, उनकी पढ़ाई छूट गई है और उन्हें भरपेट खाना भी नहीं मिल रहा। पूरे के पूरे परिवार तबाह हो रहे हैं। किसी का बेटा है, तो पिता नहीं, कोई पत्नी पति-बच्चों को खो चुकी है। फिर भी ये लोग अपनी संतुष्टि के लिए हमले किए जा रहे हैं। यह पागलपन कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। दो देश लड़ते हैं, तीसरा मध्यस्थ बनता है फिर नोबेल शांति पुरस्कार की मांग करता है। बेहतर हो यह शांति पुरस्कार हमेशा के लिए बंद ही कर दिया जाए। (‘मोर्चे पर अब समूची दुनिया’, 30 मार्च) है।

राज नवानी|नवसारी, गुजरात

 

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