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दाले-नादां तुझे हुआ क्‍या है

दि ल का दाल से भी कोई संबंध है क्‍या? सुना नहीं कभी। दिल का विल से जरूर संबंध रहा है, जिसका खुलासा पहली बार फिल्म 'शागिर्द’ में हुआ था।
ग्राफिक

इस फिल्म की हीरोइन सायरा बानू हैं, जो कि ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार की पत्नी भी हैं। फिल्म के एक गाने के अनुसार वह दिल-विल कुछ नहीं जानतीं। जानने को तो वह प्यार-व्यार भी कुछ नहीं जानतीं, अगर कुछ जानती हैं तो बस इतना कि फिल्म के हीरो जॉय मुखर्जी को अपना जानती हैं। जैसे-जैसे गाना आगे बढ़ता है, उनकी अज्ञानता का भी खुलासा होता जाता है।

हमारे लिए इस गाने का इसलिए भारी महत्व है,

क्‍योंकि पहली बार इसी से पता चलता है कि मनुष्य के शरीर में धडक़ने वाले दिल का विल से गहरा संबंध है और हीरोइन भले ही दिल-विल, प्यार-व्यार कुछ न जानती हों पर जीवन में लड़कियों को उसके बारे में जरूर जानना चाहिए और जिसे विल कहे, उसे ही दिल देना चाहिए, फिर चाहे उसका अर्थ 'इच्छा’ हो या 'वसीयत।’    

दिल पहले इतना नादान होता था कि उसे कभी भी कुछ भी हो जाता था और बंदे की समझ में ही नहीं आता था कि इसे क्‍या हो गया है? मिर्जा गालिब तक को एक बार अपने दिल से पूछना पड़ गया था कि दिले-नादां तुझे हुआ क्‍या है? दिल से कोई माकूल जवाब न मिलने पर उन्हें शायद किसी वैद्य-हकीम से भी पूछना पड़ा था कि आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है? आगे चलकर देश में बड़े-बड़े अस्पताल खुल गए, जहां दिल के मर्ज का सही-सही पता भी चलने लगा और उसका इलाज भी होने लगा। लिहाजा दिल के बारे में यह सवाल पूछा जाना बंद हो गया।

चूंकि जमाना नया है तो यह दिल-विल के चक्‍कर दाल में तब्‍दील हो गए हैं। वैसे भी आपने सुना होगा प्यार करने वालों को अक्‍सर नसीहत दी जाती है कि आटे दाल का भाव पता चलेगा तब प्यार समझ में आएगा। इस नसीहत में दाल का भाव बेशकीमती सलाह है जिससे अब प्रेमियों को भी डर लगने लगा है। बीती दिवाली पर चने की दाल के कारण लोगों को लोहे के चने चबाने जैसा आनंद प्राप्त हुआ। दाल के सवाल कई जगह तक फैल गए हैं। दाल के बारे में माहौल ऐसा है कि दिल का मरीज तक अपने दिल को भूलकर दाल से पूछने को बाध्य है कि दाले-नादां तुझे हुआ क्‍या है? जिस तेजी से दालों की कीमत बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए कोई वित्तीय डॉक्‍टर यह बताने में सक्षम नहीं कि इस मर्ज की दवा क्‍या है? उधर सरकार की कोशिशों का आलम यह है कि मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की। पहले अरहर की दाल ने 'यह मुंह और मसूर की दाल’ वाला मुहावरा बदलकर 'यह मुंह और अरहर की दाल’ किया और अब चने की दाल लोगों को नाकों चने चबवा रही है और यह साबित करने पर तुली है कि अकेला चना भी अगर अपनी पर आ जाए तो आदमी के बजट में तोड़-फोड़ कर सकता है।

 

साहित्य का हंस

हंस के कार्यक्रमों का इंतजार लेखकों-पाठकों को हमेशा रहता है। ऐसे आयोजन कम होते हैं जिसमें सहमति-असहमति के स्वर मंच पर साथ बैठते हैं और श्रोताओं की भागीदारी भी बराबर बनी रहती है। राजेन्द्र यादव की पुण्यतिथि पर हंस साहित्योत्सव में मन्नू भंडारी, विश्वनाथ त्रिपाठी और निर्मला जैन ने हंस वेबसाइट का उद्घाटन किया। चार सत्रों में लगभग 50 लेखकों, आलोचकों ने हिस्सा लिया। इतने वक्‍ताओं  को सुनना अलग अनुभव रहा। हंस और नवें दशक की हिंदी कहानियां, विमर्शों का दौर और हिंदी कहानियां, कहानी का समकाल : नएपन की पहचान, कहानी और अपेक्षाएं सत्रों में बंटी हुई इस गोष्ठी में साहित्य और साहित्य से इतर कई बातें हुईं। कार्यक्रम की कसावट का ही कमाल था कि सुबह दस बजे से शुरू हुए सत्रों में रात आठ तक श्रोता डटे रहे। युवा और वरिष्ठ जनों को ऐसे बांटा गया कि हर विषय पर दोनों पीढ़ी का प्रतिनिधित्व रहे। हंसाक्षर ट्रस्ट हमेशा से ही राजेन्द्र यादव और उनसे जुड़े सरोकारों पर काम करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ रहता है। जैसा कि संजय सहाय और रचना यादव ने कहा भी था कि वह गंभीरता ओढ़े सेमिनार के बजाय जीवंत और आत्मीय संवाद चाहते हैं और यह उन्होंने कर दिखाया।

 

युवा साम्राज्य

गजानन माधव मुक्तिबोध जन्मशती शुरू होने के उपलक्ष्य में रजा फाउंडेशन और कृष्णा सोबती-शिवनाथ निधि ने एक अनूठा आयोजन किया। युवाओं को लेकर कई कार्यक्रम पहले भी होते रहे हैं। इस कार्यक्रम में चालीस से कम उम्र के लगभग,0 साहित्यकारों ने पूरे भारत से शिरकत की। यह पहला मौका था जब आगरा, अलीगढ़, बनारस से लेकर सरगुजा, बोकारो, हल्द्वानी और उत्तरकाशी जैसे क्षेत्रों का भी प्रतिनिधित्व हुआ। युवाओं को सुनने भारी संख्‍या में श्रोता मौजूद थे। दस सत्रों में कहानी, कविता, भाषा और आलोचना पर खुल कर बात हुई। कविता-कहानी के साथ आलोचना और नाटक-मीडिया पर भी बात हुई। युवाओं के उत्साह को सुनने उनकी समझ को परखने के लिए कई वरिष्ठ साहित्यकार, विद्वान भी उपस्थित थे। युवाओं के जोश और वरिष्ठ पीढ़ी की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊर्जा दी और उत्साह का आशीर्वाद भी। युवा 2016 नाम से हिंदी युवा लेखकों का रजा समारोह भारतीय ज्ञानपीठ, राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन के सहयोग से संपन्न हुआ।

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