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रोजगार की कितनी उम्‍मीद

कई उद्योगों पर पड़ी नोटबंदी की मार, क्‍या बजट के प्रावधानों से बदलेगी महंगाई और रोजगार की स्थितियां
नौकरी की आस

बजट के साथ ही लोगों की उम्‍मीद भी बढ़ रही है। महंगाई और बेरोजगारी का जो संकट है वह बजट के प्रावधानों से कितना उबर पाएगा यह देखने वाली बात है। वहीं कई योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। नोटबंदी की मार से जूझ रहे औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ बड़ी संख्‍या में बेरोजगार हुए लोग भी इस उम्‍मीद में हैं कि शायद बजट आने के कुछ समय बाद स्थितियों में सुधार होगा। वैसे भी सरकार लगातार दावा करती रही है कि जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा। क्‍योंकि बजट में योजनाएं और प्रावधान बहुत हैं लेकिन इसका क्रियान्वयन कैसे होगा यह महत्वपूर्ण है।

गाजियाबाद के साहिबाबाद औद्योगिक एरिया में सैकड़ों लोग रोजगार की उम्‍मीद लिए घूमते हुए नजर आ जाते हैं कि किसी फैक्‍ट्री के बाहर बोर्ड लगा हुआ मिल जाए कि यहां वैकेंसी है। कुछ ऐसा ही नजारा नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद के औद्योगिक क्षेत्रों में भी देखने को मिलेगा। ऐसा ही नजारा देश के अन्य शहरों में भी देखने को मिल रहा है। आठ नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की थी तो इसकी सर्वाधिक मार उन छोटे कामगारों पर पड़ी जो दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते थे। इसके साथ ही कई उद्योगों में खर्च कम करने की कवायद शुरू हो गई और हजारों लोगों को बेरोजगार होना पड़ गया। नोटबंदी के बाद कितने लोग बेरोजगार हुए इसका सीधा-सीधा आंकड़ा तो नहीं है लेकिन एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कई उद्योगों में 60 से 70 फीसदी की गिरावट आई है और इससे 75 फीसदी कामगार बेरोजगार हो गए हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली

नोटबंदी का विरोध विपक्षी दल और तमाम कर्मचारी संघ तो करते ही रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित भारतीय मजदूर संघ के नोटबंदी का विरोध करने से एक बात तो साफ हो गई है कि हालात सामान्य नहीं हैं। भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बैजनाथ राय कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों का रोजगार छिन गया। राय के मुताबिक तीन करोड़ से ज्यादा मजदूर अपने घर लौटने को मजबूर हुए और करीब पांच करोड़ मजदूर कंस्ट्रक्‍शन सेक्‍टर में काम करते हैं जिसमें से आधे से ज्यादा रोजगार खत्म होने की वजह से पलायन कर गए। राय कहते हैं कि अगर इसमें दूसरे असंगठित क्षेत्र पर पडऩे वाले असर को देखा जाए तो हमारा अनुमान है कि नोटबंदी का असर चार से पांच करोड़ मजदूरों के रोजगार पर पड़ा है। राय बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शासनकाल में करीब 1 लाख 35 हजार लोगों को नौकरी मिली लेकिन लाखों लोग बेरोजगार भी हो गए।

निर्माताओं की सबसे बड़ी संस्था ऑल इंडिया मैन्युफैक्‍चरर्स आर्गनाइजेशन (एआईएमओ) ने तो नोटबंदी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। एआईएमओ के अध्ययन के मुताबिक नोटबंदी का फैसला लागू होने के 34 दिनों के भीतर सूक्ष्म-लघु स्तर के उद्योगों में 35 फीसद लोग बेरोजगार हो गए, वहीं राजस्व में भी 50 फीसदी की गिरावट हुई। अध्ययन के मुताबिक, नोटबंदी से लगभग सभी उद्योग में एक ठहराव देखने को मिला है, लेकिन छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।  नोटबंदी के प्रभाव को लेकर  एआईएमओ ने अभी तक तीन बार अलग-अलग अध्ययन किया और चौथी बार करने की तैयारी चल रही है। एआईएमओ द्वारा किए गए अध्ययन में मार्च 2017 से पहले नौकरियों में 60 फीसदी की गिरावट और राजस्व 55 फीसदी घटने की आशंका भी जताई गई है। एआईएमओ के अंतर्गत मैन्युफैक्‍चरिंग और एक्‍सपोर्ट से जुड़े 3 लाख सूक्ष्म, मध्यम और बड़े स्तर के उद्योग आते हैं।

दूसरी ओर इंफ्रास्ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट से जुड़े मध्यम और बड़े स्तर के उद्योगों में 35 फीसदी नौकरी घटी और 45 फीसदी राजस्व में गिरावट हुई। मार्च तक नौकरी और राजस्व में 40 फीसदी गिरावट होने की आशंका है। निर्यात से जुड़े मध्यम और बड़े स्तर के उद्योगों में 30 फीसदी नौकरी और 40 फीसदी राजस्व घटा है। मार्च तक नौकरियां घटने का आंकड़ा 35 फीसदी और राजस्व में गिरावट का आंकड़ा 45 फीसदी तक पहुंच सकता है। नोटबंदी के बाद संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट ने इस बात की ओर इशारा किया कि साल 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में इजाफा हो सकता है। 2017 में वैश्विक रोजगार एवं सामाजिक दृष्टिïकोण पर आधारित इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि रोजगार की कमी के कारण आर्थिक विकास पिछड़ता प्रतीत हो रहा है और इसमें पूरे 2017 के दौरान बेरोजगारी बढऩे तथा सामाजिक असमानता की स्थिति और बिगडऩे की आशंका प्रबल हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में साल 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्‍या 1.78 करोड़ और साल 2018 में 1.8 करोड़ हो सकती है।

राज्यों से नोटबंदी के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं वे काफी चौंकाने वाले हैं। नोटबंदी के बाद मध्य प्रदेश में 28 फीसदी कर्मचारी/मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। सबसे ज्यादा असर छोटी कंपनियों और कारोबार पर पड़ा है। एक अखबार द्वारा राज्य के 32 जिलों की 110 कंपनियों में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि छोटी कंपनियों में करीब 65 फीसदी लोग बेरोजगार हो गए। कई जगह तो मिलें बंद कर कर्मचारियों को छुट्टी दे दी गई। मझोली कंपनियों ने 25 फीसदी कर्मचारियों को घर बैठा दिया है। बड़ी कंपनियों में अधिकतर स्थायी कर्मचारी काम करते हैं, इसके बावजूद इनमें 20 फीसदी की रोजी-रोटी चली गई। अध्ययन में कई कारोबारियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि नोटबंदी के बाद कर्मचारियों से काम कराना संभव नहीं था इसलिए उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया।

पश्चिम बंगाल सरकार ने तो बाकायदा एक सर्वेक्षण ही करा डाला। इस सर्वेक्षण के आधार पर राज्य की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला भी बोला कि नोटबंदी के चलते उनके राज्य को 5,500 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है और 81.50 लाख लोगों का रोजगार छिन गया। ममता बनर्जी के मुताबिक बंगाल में नोटबंदी से 1.7 करोड़ लोग बुरी तरह प्रभावित हुए। ममता कहती हैं कि बेरोजगार होने वालों में चाय, जूट, बीड़ी और ज्वैलरी सेक्‍टर के ज्यादा लोग हैं। ममता के मुताबिक नोटबंदी से कृषि क्षेत्र को तगड़ा झटका लगा है और नकदी को कमी के चलते किसानों को भी भारी नुकसान हुआ है।

अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो नोटबंदी का असर ऐसा हुआ कि कई उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो गए। अलीगढ़ का ताला उद्योग संकट में आ गया। कानपुर और आगरा का चमड़ा उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक आगरा, कानपुर और कोलकाता में नोटबंदी के कारण खालों की उपलब्‍धता में 75 प्रतिशत तक गिरावट आ गई। रिपोर्ट के मुताबिक चमड़ा उद्योग को उत्पादन के मोर्चे पर भी कड़ी चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। चमड़ा फैक्ट्रियों में उत्पादन 60 फीसदी तक गिर चुके हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस गिरावट से 75 फीसदी कामगार बेरोजगार हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी से हुए इस नुकसान से उबरने में इस उद्योग को 9 से 12 महीने लग सकते हैं। इस उद्योग से जुड़े लोगों की उम्‍मीद है कि बजट के प्रावधान से मंदी की मार से उबरा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी के औद्योगिक क्षेत्र उरला, सिलतरा, भनपुरी एवं बिलासपुर के सिरगिट्टी तथा भिलाई-चरौदा, रायगढ़ और राजनांदगांव के औद्योगिक क्षेत्र भी नोटबंदी के असर से नहीं उबर सके हैं। उद्योगों सेे बेरोजगार हुए लोग अब इस उम्‍मीद में हैं कि शायद अर्थव्यवस्था सुधरे तो नौकरी मिलेगी। जानकार मानते हैं कि देश की आर्थिक वृद्घि को रफ्तार देने के लिए सरकार को कई बड़े फैसले लेने होंगे क्‍योंकि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को करारा झटका लगा है। अगर योजनाओं का क्रियान्वयन सही तरीके से होता है तो कई सारी चुनौतियों से निपटा जा सकता है।

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