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'बुरे चरित्र ही याद रह जाते हैं’

इंटरव्यू
शाहरूख खान

'वो आए घर हमारे खुदा की कुदरत है, कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।’ बॉलीवुड के बादशाह शाहरूख खान यदि किसी के घर आएं तो गालिब का ये शेर इस मौके के लिए बिलकुल सटीक बैठेगा। मगर शाहरूख के लिए इस शेर के जुदा मायने हैं। दरअसल उनके पास प्रमोशनल भीड़-भाड, साथी कलाकारों या निर्माताओं से मिलने के लिए एक वैनिटी वैन से दूसरे में आना-जाना, देर से खाना, बोरिंग इंटरव्यू के बीच बेटे अबराम का अपने पिता के लिए मचलना आदि के बीच शायरी के बारे में सोचने का सुख नहीं है। बॉलीवुड में 25 साल पूरे कर चुके हिंदी फिल्म जगत के बादशाह, शाहरूख खान की रईस 25 जनवरी को रिलीज हुई है। शाहरूख के साथ प्राची पिंगले-प्लंबर की बातचीत के संपादित अंश:

 

ऐसा लगता है कि आप बुरे चरित्रों वाली भूमिकाओं की ओर लौट रहे हैं। पहले 'फैन’ फिर 'रईस’?

मैं थियेटर से आया हूं... हेमलेट, मैकबेथ, रिचर्ड आदि ऐसे चरित्र हैं जो आपको याद रहते हैं। अच्छे चरित्र आपको अधिकांश समय याद नहीं रहते। आपको डार्क अंत के कारण रोमियो और जूलियट याद रहते हैं। जहर ले लिया, नकली था, खुद को मार दिया, ये क्‍या हो गया, ओ माई गॉड, 'कॉमेडी ऑफ एरर्स’ मगर बेहद अकाल्पनिक और डरावना। आपको ऐसी ही चीजें याद रह जाती हैं। बादलों की गरज, बारिश, बिजली की चमक हमेशा से खिले फूलों और धूप के मुकाबले ज्यादा आकर्षक होती है।

रईस ज्यादा वास्तविक है। पत्रकारों ने यह छानबीन की कि गुजरात और दूसरी जगहों पर किस प्रकार शराब का अवैध कारोबार होता है। यह 'हैप्पी न्यू ईयर’ की तरह नहीं है कि ऊपर से आया, गटर के रास्ते निकला, अंदर चला गया। कुछ क्षण जैसे कि अवैध शराब की बिक्री... ज्यादा दिलचस्प हैं क्‍योंकि ये कहीं न कहीं सच में होते हैं। उदाहरण के लिए सब्‍जी की दुकान पर इसकी बिक्री, जहां वो इसे टमाटर में इंजेक्‍शन से भर कर बेचते हैं। मर्द अपनी पत्नियों से कहना शुरू कर देते हैं कि वे सब्‍जी खरीदने जाएंगे। पत्नी खुश हो जाती है। फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं। छोटे मगर वास्तविक दृश्य। मैं अपना पैसा कहां छिपाता हूं, शराब में। यह मेरे लिए भी कौतुहल भरा था क्‍योंकि मैं उस दुनिया से नहीं आता न ही हममें से अधिकांश लोग। आमतौर पर मैं शहरी भूमिकाएं निभाता हूं जबकि यह कुछ मायनों में ग्रामीण है।

बिना विस्तार में जाए, क्‍या आपको लगता है कि 'ऐ दिल है मुश्किल’ या 'माई नेम इज खान’  आदि से जुड़े विवादों ने लोगों को ज्यादा सतर्क बनाकर समाज में बड़े बदलाव का प्रयास किया है?

मुझे नहीं लगता कि ये समाज को बदल पाएगा। एक एंटरटेनर के रूप में मैं अपनी जिम्‍मेदारियों को समझता हूं। एक गंभीर सोच वाला शख्‍स यह सोच सकता है कि एक व्यक्ति जो छम्‍मक छल्लो जैसा गाना करता है, उसे कभी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन 25 वर्षों से यह काम करते हुए मैं खुद पर लोगों का अहसान मानता हूं। पहला एक अच्छी फिल्म बनाना। दूसरा हिस्सा आपसे जुड़ा है। यह इंटरव्यू सिर्फ खुद का अपनी फिल्म का प्रचार करने भर के लिए नहीं है बल्कि आपके जरिये मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि यह ऐसा उत्पाद है जिसमें पैसा तबतक वापस नहीं लौटेगा जबतक आप इसे पसंद नहीं करेंगे...दुनिया में एकमात्र उत्पाद या सेवा जिसमें पैसा वापसी की कोई गारंटी नहीं है। मैं लोगों को यह बताना चाहता हूं ताकि खुद का गिल्ट से मुक्त मानूं। तीसरा, मैं अपने दर्शकों का इसके लिए अहसानमंद होता हूं कि वे एक फिल्म देखकर उसे पसंद करेंं। जैसे मैं आसानी, आराम से कोई फिल्म देखता हूं ठीक उसी प्रकार। आपको मनोरंजन के लिए तनाव से भरकर जाने की जरूरत नहीं है।

मैं इन छोटी-छोटी बातों के लिए परेशान होता हूं। हममें से शायद ही कोई हिंसा फैलाने या भावनाएं भडक़ाने के लिए फिल्म बनाता है। सेंसर कहता है, 'इस लाइन को काट दो’। मुझे नहीं लगता कि इससे किसी को चोट पहुंच सकती है मगर ठीक है, मैं उसे बदल देता हूं। ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। ये व्यावसायिक फिल्म है आप इसे कितनी गंभीरता से ले सकते हैं? लोगों को सतर्क बनाने की जगह केयरफुल सही शब्‍द होना चाहिए। मनोरंजन के नाम पर मैं जो बेच रहा हूं संभव है कुछ लोगों के लिए उतना मनोरंजक न हो।

करन जौहर की आत्मकथा आ चुकी है। नसीर भी लिख चुके हैं। हम आपकी आत्मकथा कब देखेंगे?

मेरी लिखी जा चुकी है-ट्वेंटी इयर्स ऑफ ए डिकेड। भट्ट साहब ने इसके लिए मुझे राजी कर लिया था। मैंने इसे पूरा कर लिया है, लेकिन अभी भी कई खूबसूरत घटनाएं हो रही हैं इस लिए मुझे लिखना जारी रखना होगा। यह एक मजेदार आत्मकथा होगी...इसका मतलब है कि मुझे और सोचना होगा। मैं तब लिखता हूं जब मैं उदास होता हूं और यह काफी मजेदार होता है। यह डॉक्‍टरी जांच का विषय हो सकता है कि मैं सालों से कभी उदास नहीं हुआ हूं (ठहाका...) यह एक अच्छी बात है। देखिए आगे क्‍या होता है। मेरा अपने प्रकाशक से समझौता है इस लिए आप यह नहीं पूछेंगी कि यह प्रकाशित कब होगा। मैं लिखना जारी रखूंगा और इसमें कई चैप्टर जुड़ेंगे। इसका संपादन भी मैं खुद करुंगा। मैं इसे पूरा करना चाहता हूं। यह आर्यन के जन्म के समय पूरा हो गया था। इसके बाद सुहाना आ गई फिर अबराम...इसलिए मुझे कछ और चैप्टर जोडऩे हैं।

आप महिला अधिकारों के लिए काफी मुखर रहे हैं। ऐसे में एक अभिभावक के रूप में अपने पुत्र और पुत्री के पालन के दौरान इस बात का कैसे ध्यान रखेंगे कि आप पूर्वधारणा से ग्रसित न हों?

सबसे पहले तो मैं इस तथ्य को मन से निकालने की कोशिश करता हूं कि मैं एक फिल्म स्टार हूं। मैं और मेरी पत्नी साधारण पृष्ठभूमि वाले परिवार से आते हैं। जब मैं घर पर होता हूं तब मैं पूरी तरह अलग होता हूं। अपने साथ इस दुनिया के किसी हिस्से को साथ लेकर नहीं आता। मेरे बच्चे मुझे होर्डिंग्स पर देखते हैं या यह पढ़ते हैं कि मुझे चब फेलोशिप दिया गया है लेकिन जब वे मेरे साथ घर पर बैठते हैं, तब मैं सामान्य और भावनाओं से भरा इंसान होता हूं। मैं चिल्लाता नहीं हूं, मैं दुव्र्यवहार नहीं करता। मैं ऐसा कोई काम नहीं करता हूं जो लगे कि मैं स्टीरियो टाइप हूं। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि ऐसा मेरे पिता ने किया है इस लिए ऐसा करना सही है। मेरे घर में कोई धारणा नहीं बनी हुई है। केवल इस बात के कि मैं बहुत मेहनत करता हूं। मैंने कभी अपनी पत्नी से इस तरह से बात नहीं कि है जिस पर सवाल उठाया जा सके...मैं उसे 33 साल से जानता हूं। इतना ही नहीं मैं घर में काम करने वाले लोगों, अभिनेत्रियों और अन्य लोग जो मेरे साथ काम करते हैं के साथ भी बात करने के दौरान सतर्कता बरतता हूं। इतना ही नहीं अबराम...जो अभी काफी छोटा है, जब वह कुछ बोलता है तब भी मैं कम शब्‍दों में उसे सिखाता हूं। मैं उससे सिर्फ यही कहता हूं लड़कियों के प्रति विनम्र रहो।

हाल में मेरिल स्ट्रीप और लियोनार्डो डी कैप्रियो ने पावरफुल भाषण दिए। उन भाषण या उस प्लेटफॉर्म के बारे में क्‍या सोचते हैं?

मुझे लगता है कि ये जोरदार प्लेटफॉर्म था मगर इस मामले में ये प्लेटफॉर्म विदेशी प्रेस द्वारा तैयार था। आपको मेरे विचार उसी तरह से पेश करना होता है जैसे मैंने बोला न कि अपने लेख के एजेंडा के तहत। आप मुझसे पूछ सकते हैं, 'शाहरूख मैं ये मानती हूं, क्‍या मानते हैं’? मैं कहूंगा नहीं। अपना मेरे विचार से अलग अपना विचार रखने के लिए स्वतंत्र हैं। यदि मेरे पास वैसा प्लेटफॉर्म (गोल्डन ग्लोब अवार्ड) होता... वहां जो हुआ या जो नहीं हुआ उसके प्रति पूरा आदर रखते हुए... मैं कहना चाहता हूं कि वहां मीडिया बहुत आगे है जो हमारे यहां नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे वहां का सिनेमा हमसे बहुत आगे है। हमें उनसे बेहतर चीजें सीखने की जरूरत है। ऐसा स्टेज और ऐसा स्टारडम होने के कारण वहां मेरिल स्ट्रीप जो चाहे कह सकती हैं। वो तथा दूसरों को पता है कि वे जो चाहे बोल सकते हैं। यहां तक कि ट्रंप भी ये जानते हैं। यदि आपके पास वैसा प्लेटफॉर्म नहीं है तो आप नहीं पूछ सकते कि ऐसा भाषण हमारे यहां क्‍यों नहीं हो सकता।

 

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