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संविधान का अनुच्छेद 370 एक फैसले से कम नहीं किया जा सकता

नजरिया
अशोक भान

यह सर्वविदित है कि संविधान के अनुच्छेद 139 ए के तहत सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह किसी भी राज्य के हाई कोर्ट में लंबित पड़े केस को किसी दूसरे राज्य के हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार संविधान के 42वें संशोधन के बाद दिया गया। मगर यह जम्‍मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होता।

संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है कि सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जम्‍मू-कश्मीर के किसी भी कोर्ट में लंबित सिविल या आपराधिक मुकदमे को दूसरे राज्य में ट्रांसफरकर सके। इसी तरह दूसरे राज्यों के मुकदमे भी यहां ट्रांसफर किए जा सकते हैं। यह एक सामान्य केस था क्‍योंकि कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर कोड के सेक्‍शन 25 और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्‍शन 406 सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी राज्य के मुकदमे को किसी दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर सकेंं। लेकिन यह अधिकार जम्‍मू-कश्मीर में लागू नहीं होता है। इसका आधार जम्‍मू-कश्मीर कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1977 और जम्‍मू-कश्मीर कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर,1989 हैं। इनके तहत सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी राज्य के मुकदमे को यहां ट्रांसफर कर सके और न ही यहां के मुकदमे को दूसरे राज्य में।

सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक व्याख्‍या के मामले में यद्यपि कुछ विवादित फैसले दिए हैं पर अधिकार और विशेषाधिकार देने के अधिकांश मामलों में उसके फैसले राज्यों और व्यक्तिगत स्तर पर हितकर रहे हैं। लेकिन हाल में अजय कुमार पांडेय बनाम जम्‍मू-कश्मीर राज्य और अन्य के मामले में संविधान पीठ के फैसले ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राज्य को मिली स्वायत्तता में अनावश्यक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। संविधान पीठ ने इस केस को राज्य से बाहर स्थानांतरित करने की अनुमति दी है। इस पीठ के प्रमुख तत्कालीन मुख्‍य न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर थे।

इस प्रकार जब किसी वादी को लंबित पड़े किसी सिविल या आपराधिक मामले को जम्‍मू-कश्मीर से बाहर स्थानांतरण करने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी कोर्ट इससे अलग जा रहा है। ऐसे में कहीं सिविल और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत राज्य को मिले अधिकारों की अवहेलना तो नहीं हो रही है। अब यह सवाल उठता है कि क्‍या सुप्रीम कोर्ट किसी लंबित मुकदमे को राज्य से बाहर ले जाने या बाहर के मुकदमे को यहां लाने की अनुमति दे सकता है।

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को न्याय के लिए उपयोग (एक्‍सेस टू जस्टिस)  के सिद्धांत के तहत ऐसा करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट को ऐसा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार प्राप्त है। कोर्ट इस सिद्धांत पर भरोसा करता है कि हर नागरिक को कोर्ट तक बिना किसी डर के पहुंचने का अधिकार है। रेमंड बनाम हनी 1983 एसी1 (1982 (1) ऑल ईआर 756) केस में लॉर्ड विल्बरफोर्स ने इसे बुनियादी अधिकार बताया है। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने लॉर्ड विल्बरफोर्स के इस मत के बारे में दिए गए अपवाद को नहीं लाया गया। यह अपवाद है कि किसी भी नागरिक के लिए कोर्ट तक पहुंचने के अधिकार से उसे अभिव्यक्‍त  कानून के द्वारा रोका जा सकता है...और ऐसे में हम स्वीकार करते हैं कि इस तरह के अधिकार कानूनी सिद्धांत की बात के रूप में आवश्यक निहितार्थ से वापस लिए जा सकते हैं।

यहां, इस केस में उपरोक्‍त वर्णित प्रावधान साफ तौर पर याचिकाकर्ता के केस जम्‍मू-कश्मीर से बाहर ट्रांसफर करवाने के अधिकार को नकारते हैं मगर फिर भी अदालत ने इसे दूसरे रूप में लिया।

कानून के एक गंभीर सवाल से सुप्रीम कोर्ट का सामना हुआ कि क्‍या संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को उस स्थिति में केस ट्रांसफर का अधिकार देता है जबकि न तो सेंट्रल सिविल प्रोसीजर कोड या सेंट्रल क्रिमिनल प्रोसीजर कोड जम्‍मू-कश्मीर से या वहां केस ट्रांसफर का अधिकार न दे रहा हो। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अनुच्छेद 142 का अधिकार व्यापक है और उससे सुप्रीम कोर्ट को उपयुक्‍त स्थिति में केस ट्रांसफर की शक्ति मिलती है फिर भले ही सेंट्रल सिविल और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड राज्य पर लागू होता हो या नहीं या खुद जम्‍मू-कश्मीर का सिविल या क्रिमिनल प्रोसीजर कोड इस अदालत को केस ट्रांसफर करने का अधिकार देता हो या नहीं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अदालत का ध्यान ए.आर. अंतुले वर्सेस आर.एस. नायक के 1998 के मामले में 7 जजों की बेंच के फैसले की ओर नहीं दिलाया गया जिसमें कहा गया है, 'तीसरी बात, अनुच्छेद की भाषा कितनी भी विस्तृत और व्यापक हो, कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश असंगत, अरुचिकर और किसी कानून के खास प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले नहीं होने चाहिए। यदि 1952 का कानून, अनुच्छेद 139-ए और सीआरपीसी की धारा 406-407 किसी केस को विशेष जज के पास से हाईकोर्ट में ट्रांसफर की इजाजत नहीं देते तो इसे परोक्ष रूप से हासिल नहीं किया जा सकता।’

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य की ओर से पेश हुए वकील ने कोर्ट का ध्यान सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच द्वारा दिए गए उस फैसले की ओर भी नहीं दिलाया जिसमें कहा गया है, 'अनुच्छेद 142 को, इसके विस्तृत आयामों के बावजूद, एक ऐसी इमारत खड़ी करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जो पहले से ही मौजूद न हो। किसी विषय से संबंधित कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करके परोक्ष रूप से वो हासिल करने का प्रयास नहीं किया जा सकता जिसे प्रत्यक्ष रूप से हासिल नहीं किया जा सके।... यह याद रखा जाना चाहिए कि अनुच्छेद 142 के तहत अधिकारों के आयाम जितने व्यापक हैं उतना ही इस अदालत को यह देखने की जरूरत भी बड़ी है कि इस अधिकार का इस्तेमाल संयम के साथ हो, बिना संविधान की सीमाओं को पीछे धकेले, ताकि यह अदालत अपने न्यायाधिकार में काम करे।’

ऊपर जताई गई चिंता को देखते हुए यह ज्यादा गंभीर बात है कि यह फैसला परोक्ष रूप से संविधान के अनुच्छेद 370 के अनिवार्य प्रावधानों को रद्द करता है। जम्‍मू और कश्मीर की विधायिका ने खास तौर से यह रेखांकित किया है कि अदालत के पास मुकदमों को जम्‍मू-कश्मीर की अदालतों से बाहर ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं है। जम्‍मू और कश्मीर के कानून के उलट अनुच्छेद 142 के तहत आदेश पारित करना अनुच्छेद 370 का गंभीर उल्लंघन है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। आशा की जाती है कि महाधिवक्‍ता कुछ पुराने विशेषज्ञों, वरिष्ठ वकीलों से सलाह के बाद राज्य सरकार को इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने की सलाह देंगे ताकि गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक परिणामों को टाला जा सके और जम्‍मू और कश्मीर के लोगों को यह आश्वासन मिल सके कि उनकी स्वायत्तता कमजोर नहीं हुई है।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं।)    

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