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लोकपाल से कौन डरता है

परेशान करने वाला है केंद्र सरकार का रुख, अन्य पक्ष भी अब चुप्पी साध चुके हैं
अन्ना आंदोलन से जगी उम्मीद अब पूरी तरह खत्म द‌िख रही है

केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए ओंबुड्समैन यानी अपने बहुचर्चित लोकपाल के गठन के लिए कुछ महीने और इंतजार करना पड़ सकता है। वह भी तब, जब इसके गठन को लेकर सरकार की मंशा साफ हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ  जन लोकपाल के गठन की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे, योग गुरु (व्यवसायी) रामदेव और उनके सहयोगियों के आंदोलन का पुरजोर समर्थन करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्ववाली राजग सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं होने के कारण लोकपाल की नियुक्ति में विलंब हो रहा है। गौरतलब है कि तमाम अनशन-आंदोलनों, विवादों और संसदीय बहसों के बाद दिसंबर 2013 में पास हुए लोकपाल अधिनियम के तहत लोकपाल की खोज या चयन के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित होने वाली पांच सदस्यीय समिति में लोकसभाध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनके प्रतिनिधि और राष्ट्रपति द्वारा नामित एक कानूनविद् को शामिल किया जाना है। बाकी सब तो ठीक है लेकिन लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष और उसका नेता नहीं होने से चयन समिति का गठन ही नहीं हो पा रहा है। लोकपाल की नियुक्ति तो उसके बाद ही संभव हो सकेगी।

तकनीकी तौर पर लोकसभा के एक दहाई सदस्य होने पर ही किसी दल को विपक्ष और उसके नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा प्राप्त हो सकता है। कांग्रेस ने कुछ अन्य विपक्षी दलों के समर्थन पत्र के सहारे लोकसभा में अपने नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को विपक्ष का नेता घोषित करने का आग्रह किया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसे पहली लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा बनाई गई व्यवस्था का हवाला देते हुए अमान्य कर दिया। हालांकि इसी आधार पर देखें तो दिल्ली की 70 सदस्यों की विधानसभा में केवल तीन विधायक होने के कारण भाजपा को मान्यता प्राप्त विपक्ष का दर्जा नहीं मिल सकता था, लेकिन जब आम आदमी पार्टी की सरकार ने भाजपा विधायक दल के नेता विजेंद्र गुप्ता को नेता विपक्ष बनाने का प्रस्ताव किया तो भाजपा को इसे स्वीकार करने में जरा भी झिझक नहीं हुई। यही नहीं, संख्या बल नहीं होने के बावजूद नेता विपक्ष बने विजेंद्र गुप्ता इसी हैसियत से दिल्ली में लोकायुक्त के चुनाव की प्रक्रिया में शामिल भी हुए, लेकिन लोकसभा में भाजपा इस तरह की सदाशयता नहीं दिखा सकी।

बहरहाल, लोकपाल के गठन को लेकर संसद से सडक़ और न्यायपालिका तक बनाए गए विपक्ष एवं सामाजिक संगठनों के दबाव के बाद केंद्र सरकार लोकपाल-लोकायुक्त अधिनियम 2013 में संशोधन कर लोकपाल के लिए चयन समिति में लोकसभा में नेता विपक्ष की जगह सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को शामिल करने पर राजी हो गई। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस आशय का एक प्रस्ताव पारित कर इसके आधार पर संसद में संशोधन विधेयक भी पेश कर दिया, लेकिन उसे पास करने का शुभ मुहुर्त है कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहा है।

लोकपाल की नियुक्ति से संबंधित जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली सर्वोच्च अदालत में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की पीठ के समक्ष सरकार का पक्ष रखते हुए महान्यायवादी मुकुल रोहतगी ने कहा कि लोकपाल की चयन समिति में नेता विपक्ष की जगह लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को शामिल करने का संशोधन विधेयक संसद में विचाराधीन है, उसके फिलहाल, संसद के मौजूदा बजट सत्र में पास होने की संभावना नहीं है क्योंकि सरकार के पास अन्य बहुत सारे विधायी कार्य पड़े हैं। उन्होंने संबंधित संशोधन विधेयक के अगले मानसून सत्र में अथवा उसके बाद ही पास हो पाने की संभावना जताई। हालांकि याचिका दायर करने वाले गैर सरकारी संगठन 'कॉमन कॉज’ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि संसद ने लोकपाल विधेयक दिसंबर 2013 में पारित कर दिया और वह वर्ष 2014 से प्रभावी भी हो गया, लेकिन सरकार जान- बूझकर लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि लोकपाल कानून यह अनिवार्य करता है कि लोकपाल की नियुक्ति जल्दी से जल्दी हो। दोनों पक्षों की सुनवाई पूरी करने के बाद न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखने की बात कही। हालांकि महान्यायवादी रोहतगी की दलील थी कि सर्वोच्च अदालत को संसद के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए क्योंकि लोकपाल कानून के तहत विपक्ष के नेता की परिभाषा से संबंधित संशोधन संसद में अभी लंबित है। 

जब तक संसद में यह संशोधन पारित नहीं हो जाता, लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो सकती। लोकपाल पर केंद्र का रुख परेशान करने वाला है। सरकार से पूछा जा सकता है कि जब सरकार और विपक्ष भी राजी है तो यह संशोधन पारित क्यों नहीं हो रहा। मोदी सरकार वित्त विधेयक में विभिन्न प्रकार के 40 संशोधन पास करा सकती है, राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता की वकालत करनेवाले वित्त विधेयक के जरिए राजनीतिक चंदा संबंधी आपत्तिजनक संशोधन पास करवा सकती है। इस संशोधन के बाद कॉरपोरेट घरानों के राजनीतिक दलों को चंदा देने की कोई सीमा नहीं होगी। न ही उन्हें यह जाहिर करने की अनिवार्यता होगी कि उन्होंने किस दल को कितना धन दिया। इसे किसी रूप में भ्रष्टाचार विरोधी कदम भी नहीं कहा जा सकता। अगर यह सब संशोधन बजट सत्र में पास हो सकते हैं तो लोकपाल की चयन प्रक्रिया से संबंधित संशोधन विधेयक पास कराने में ऐसी कौन सी रुकावट है। वैसे भी सरकार ने चाहा तो सीबीआई निदेशक से लेकर सीवीसी की नियुक्ति तक का रास्ता वर्तमान परिस्थितियों में ही ढूंढ़ निकाला गया। ऐसे में यह अर्थ निकालना क्या गलत होगा कि विपक्ष में रहते जन लोकपाल के लिए सडक़ से लेकर संसद तक जोर-शोर से सक्रिय रही भाजपा और उसके सहयोगी दलों की केंद्र सरकार चाहती ही नहीं कि लोकपाल का गठन हो? बहुत मुमकिन है कि सत्ताधारी दल में यह सोच बढ़ रही होगी कि जब चुनावी बहुमत जुटाने की तरकीब उसके पास है, तो सर्वोच्च पदों पर निगरानी करने वाली संस्था का गठन वह क्यों करे।

कहीं ऐसा भी तो नहीं कि लोकपाल की परिधि में प्रधानमंत्री, उनके मंत्री, निगमित घरानों को भी शामिल किए जाने की बात कुछ लोगों को लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और तेज करने से रोक रही है। हालांकि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के जमाने में लोकपाल की परिधि में प्रधानमंत्री को भी शामिल कर मजबूत लोकपाल के गठन के लिए लोकसभा और राज्यसभा में भी तत्कालीन विपक्ष यानी भाजपा के नेताओं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने काफी दबाव बनाया था। समाजसेवी अन्ना हजारे ने दिसंबर 2013 में अपना आमरण अनशन तभी तोड़ा जब मनमोहन सरकार प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार में शामिल करने जैसे लोकपाल को और मजबूत बनाने वाले संशोधनों को पारित करने के लिए राजी हो गई। उसके बाद ही लोकपाल अधिनियम अस्तित्व में आया, लेकिन तब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे। वैसे भी जबानी तौर पर वह भ्रष्टाचार, कालेधन के विरुद्ध लोकपाल और लोकायुक्त के गठन के पक्ष में जितना भी जोर-शोर से बोलते रहे हों, सत्ता में आने के बाद इसके बारे में उनकी उदासीनता ही सामने आती है। भूलना नहीं चाहिए कि गुजरात में उनके मुख्यमंत्री रहते तकरीबन एक दशक (2003 से दिसंबर 2013) तक लोकायुक्त की नियुक्त‌ि नहीं हो सकी थी, लोकपाल के मामले में तो अभी सवा तीन साल ही बीते हैं! तथाकथित जन लोकपाल अथवा लोकपाल के लिए सडक़ से लेकर संसद तक तूफान खड़ा करने और देश की तमाम समस्याओं, भ्रष्टाचार जैसी तमाम राजनीतिक बुराइयों का समाधान लोकपाल से ढूंढ़ लेने का दावा करनेवाले अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के लोग कहां खो गए हैं। क्या लोकपाल के नाम पर राजनीतिक तूफान खड़ा करने का मकसद महज सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित था!

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