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वादों में गुम रोजगार का गणित

विकास दर बरकरार रखने पर उठ रहे हैं सवाल, हर क्षेत्र में कम हो रही है नौकरियों की संख्या
हर सेक्टर में रोजगार का संकट है

वर्ष 2015-16 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था था। वर्ष 2011-12 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की यह सबसे तेज वृद्धि थी। लेकिन खुद वित्त मंत्रालय के आर्थिक सर्वेक्षण का मानना है कि वर्ष 2016-17 विकास दर 0.5 फीसदी कम रहेगी। शायद यह एक फीसदी तक घट सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वर्ष 2017-18 में भारत अपनी विकास दर बरकरार रख पाएगा? आर्थिक विकास का प्रश्न सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि यह अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है बल्कि इसलिए कि इसका ताल्लुक देश में रोजगार के अवसर और नौकरियों से है। साल 2012 के बाद देश में नौकरियां पैदा होने की रफ्तार बहुत कम रही है। श्रम मंत्रालय का लेबर ब्यूरो 2008 की मंदी के बाद से श्रम प्रधान आठ प्रमुख गैर-कृषि क्षेत्रों में सृजित रोजगार के आंकड़े जुटाता है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इन आठ क्षेत्रों में 2015 के दौरान 1.35 लाख नौकरियां आर्ईं जबकि 2014 में 4.9 लाख और 2009 में 12.5 लाख नौकरियां पैदा हुई थीं। जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। वर्ष 1999-2000 से 2004-05 के बीच हर साल देश में गैर-कृषि क्षेत्र में 75 लाख नौकरियां पैदा हुईं। लेकिन इस दौरान हर साल एक करोड़ 20 लाख नए लोग नौकरी चाहने वालों की कतार में जुड़ते गए। हालांकि, वर्ष 2004-05 से 2011-12 के बीच हर साल केवल 20 लाख लोग श्रम शक्ति में शामिल हुए। लगातार निजी और सार्वजनिक निवेश के चलते 2004-05 से 2011-12 के दौरान जीडीपी की विकास दर 8.4 फीसदी रही और इस बीच औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में 75 लाख नई नौकरियां आईं यानी यह साबित हो चुका है कि अगर अर्थव्यस्था में तेजी बनी रहे तो भारत में हर साल 75 लाख नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं, जैसा 1999-00 से 2011-12 के बीच 12 वर्षों में हुआ।

फिलहाल श्रम शक्ति में शामिल होने वाले नए लोगों का सालाना आंकड़ा एक करोड़ 20 लाख से कम है। वर्ष 2004-05 के बाद नौकरी के बाजार में आने वाले नए लोगों की संख्या तेजी से घटी है, क्योंकि छह से 16 साल की उम्र के बच्चों की तादाद स्कूलों में बढ़ रही है। प्राथमिक कक्षाओं में तो छात्रों का दाखिला बढ़ा ही है, माध्यमिक में भी दाखिला वर्ष 2015 में बढ़कर 83 फीसदी पहुंच गया है जो वर्ष 2009 में 58 फीसदी था। इस तरह वर्ष 2011-12 के बाद हर साल शायद 50-70 लाख अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित नौजवान श्रम-शक्ति में जुड़ते जा रहे हैं।

वर्ष 2004-05 से करीब 50 लाख कृषि मजदूर और लघु किसान खेती छोड़कर गैर-कृषि कार्यों की तलाश में आ रहे हैं। हालांकि 2004-05 से 2011-12 तक तो 50 लाख श्रमिक खेती छोड़ रहे थे, लेकिन 2011-12 के बाद केवल 10 लाख छोड़ रहे हैं। वजह यह है कि गैर-कृषि क्षेत्रों में नौकरियां ही नहीं बढ़ रही हैं। 2011-12 के बाद के आंकड़े ये भी बताते हैं कि पहले के मुकाबले गैर-कृषि क्षेत्र में 75 लाख नौकरियों के बजाय केवल 20 लाख रोजगार की बढ़ोतरी ही हुई। जो भी नई नौकरियां उत्पन्न हुईं वे भी अधिकतर कॉन्ट्रैक्ट्स पर हैं। पक्की नौकरियों में बहुत कम बढ़ोतरी हुई है जो थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी हुई भी है वह भी केवल छह राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में हुई।

एक तरफ खेती-बाड़ी छोड़ रहे मजदूर हैं तो दूसरी तरफ शिक्षित बेरोजगार युवा। इन दो अलग-अलग तरह के लोगों के लिए नौकरियां पैदा करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। ये दोनों समूह दो अलग-अलग आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिक्षा और हुनर के अभाव वाले पहले समूह को इन्फ्रास्ट्रञ्चचर से जुड़ा निर्माण क्षेत्र सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया करता है जबकि ज्यादा शिक्षित-प्रशिक्षित दूसरे समूह के लोग सिर्फ आधुनिक सेवाओं और मैन्युफैञ्चचरिंग संबंधी नौकरियां खोजते हैं।

21वीं सदी की शुरुआत से उपभोञ्चता मांग में बढ़ोतरी का सबसे महत्वपूर्ण कारक बुनियादी ढांचे के निवेश में वृद्धि है। वर्ष 2001 में स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग नेटवर्क के निर्माण के साथ बुनियादी ढांचे में निवेश शुरू हुआ था। इसके परिणामस्वरूप श्रमिकों की संक्चया 1999-2000 में 170 लाख से बढक़र 2004-05 में 260 लाख हो गई। इसके बाद बुनियादी ढांचे में निवेश तेजी से बढ़ गया और 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कुल निवेश में 475 अरब डॉलर अर्थात 100 अरब डॉलर सालाना की वृद्धि हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि निर्माण में रोजगार 260 लाख से बढक़र 2011-12 में 510 लाख हो गया, जो इस सदी की शुरुआत (1999-2000) के मुकाबले तीन गुना था।

अब कृषि छोडऩे वालों के लिए नौकरी की वृद्धि हेतु बुनियादी ढांचा में निरंतर निवेश होना चाहिए, खासकर जबसे पुराने दौर के उलट अब रियल एस्टेट में निजी निवेश काफी कम रह गया है। बिल्डर-डेवलपर्स की वर्तमान चुनौतियों से भी यह जाहिर है। यही वजह है कि एक फरवरी, 2017 को विîा मंत्री अरुण जेटली द्वारा बुनियादी ढांचे में 3.96 लाख करोड़ रुपये या करीब 57 अरब डॉलर, जो पिछले वर्ष के 3.48 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, का सार्वजनिक निवेश करने की घोषणा का विभिन्न क्षेत्रों में स्वागत किया गया। हालांकि यह 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान हुए लगभग 100 अरब डॉलर मूल्य के बुनियादी ढांचे में निवेश (सार्वजनिक और निजी मिलाकर) के आस-पास भी नहीं है, जिसके चलते निर्माण क्षेत्र में रोजगार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी। देखना यह होगा कि इस 3.96 लाख करोड़ रुपये सार्वजनिक निवेश की वजह से निजी निवेश कितना आता है।

वर्ष 2012 के बाद से नौकरियों में वृद्धि बहुत धीमी रही है। श्रम मंत्रालय के श्रम द्ब्रयूरो ने वर्ष 2008 के वैश्विक विîाीय संकट के बाद से हर तिमाही में आठ प्रमुख श्रम आधारित गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए आंकड़े तैयार किए हैं। इन आठ क्षेत्रों के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि 2015 में 1.35 लाख नौकरियां पैदा हुईं, जो वर्ष 2008 के बाद से न्यूनतम है। वर्ष 2014 में रोजगार के 4.9 लाख और 2009 में 12.5 लाख अवसर पैदा हुए थे।

अच्छी खबर यह है कि 2015 में बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश बढ़ा। सरकार ने फरवरी 2015 से स्थगित 1.15 लाख करोड़ रुपये लागत वाली 42 परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिससे बंद परियोजनाओं में निवेश सक्रिय हुआ और वर्ष 2016-17 में इसके परिणाम आने शुरू हुए। अन्य स्थगित परियोजनाओं के चालू होने से सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होगी और निर्माण क्षेत्र में नौकरियों की संक्चया बढ़ेगी।

यह प्रतिवर्ष विनिर्माण में काम की तलाश में कृषि कार्य छोडऩे वाले 50 लाख लोगों के लिए अच्छी खबर है। यह 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के बेरोजगार व्यञ्चितयों के लिए भी अच्छी खबर है, जो वर्ष में सभी 12 महीने काम करने के उपलद्ब्रध रहते हैं, लेकिन उनमें से केवल 60 फीसदी को ही छह महीने से अधिक काम मिलता है (जैसा कि रोजगार के चौथे वार्षिक सर्वेक्षण 2013-14 में उल्लेख किया गया है)।

प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक़ योजना के लिए बजट प्रावधान में वृद्धि भी ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरियों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वर्ष 2012-13 में पीएमजीएसवाई के लिए मिले 7,000-8,000 करोड़ रुपये की तुलना में वर्ष 2013-14 में 9,000 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ। केंद्र सरकार ने वर्ष 2015-16 में 19,000 करोड़ रुपये आवंटित किए। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह पीएमजीएसवाई के लिए कुल उपलद्ब्रध राशि का केवल 60 प्रतिशत है तथा शेष 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकारों से आनी है। नतीजतन, इस योजना में वार्षिक आवंटन 27,000 करोड़ रुपये होगा। विîा मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को आश्वासन दिया है कि यह राशि अगले तीन वर्षों के दौरान 2018-19 तक समान रूप से उपलद्ब्रध रहेगी।

आवंटन में इस बढ़ोतरी का अर्थ है कि ग्रामीण सडक़ों का निर्माण यूपीए सरकार के अंतिम तीन साल अर्थात 2011-14 के मुकाबले ज्यादा तेज गति से होगा। पीएमजीएसवाई के तहत ग्रामीण सडक़ों के निर्माण का औसत 2011-14 की अवधि में 73 किलोमीटर प्रतिदिन था, जो 2014-16 के दौरान बढक़र लगभग 100 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंच चुका है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, आवंटन में वृद्धि के बाद मौजूदा विîाीय वर्ष में सडक़ों के निर्माण का औसत 130 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंचने की उक्वमीद है। वर्ष 2017-18 और 2018-19 में इसे और बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य असंभव नहीं है, ञ्चयोंकि इससे पहले, वर्ष 2009-10 में पीएमजीएसवाई के तहत ग्रामीण सडक़ों का निर्माण औसत 145 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया था।

'सभी के लिए आवासÓ पर ध्यान केंद्रित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, विशेषकर निक्वन-आय वर्ग के लिए। ग्रामीण आवास योजना अर्थात प्रधानमंत्री आवास योजना (जिसे पहले इंदिरा आवास योजना कहा जाता था) के अंतर्गत 2015-16 में कुल 18.27 लाख घरों का निर्माण किया गया। वर्ष 2019 तक पीएमएवाई के तहत बनने वाले एक करोड़ घरों के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार को हर वर्ष लगभग 33 लाख घरों का निर्माण करना होगा। इस योजना के तहत करीब एक करोड़ लाभार्थियों की पहचान करने के लिए सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना का इस्तेमाल किया गया है।

इस संदर्भ में बीपीएल परिवारों के लिए प्रति आवास 35,000 रुपये की राशि को बढ़ाकर एक लाख रुपये करने से ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीएल परिवारों द्वारा आवास निर्माण को गति मिलेगी। इसी प्रकार, स्वच्छता के लिए खर्च बढऩे से स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण से भी काम के अधिक अवसर पैदा हो रहे हैं। हालांकि पढ़ाई छोडक़र श्रम शञ्चित में शामिल होने वाले विद्यालय स्तर के 50-70 लाख युवाओं के लिए उत्पादन क्षेत्र में रोजगार सीमित हैं। इनके लिए बेरोजगारी की दर 30 वर्ष या इससे अधिक उम्र के श्रमिकों की तुलना में 10 गुना ज्यादा है। वर्ष 2013 में 15 से 17 वर्ष की उम्र के बच्चों की बेरोजगारी दर 10.2 प्रतिशत तथा 18 से 29 वर्ष उम्र के लिए 9.4 प्रतिशत थी, वहीं 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए यह 0.8 प्रतिशत थी।

विîा वर्ष 2016-17 की पहली छमाही में कुल निवेश जीडीपी का 27 प्रतिशत था, जबकि पिछले वर्ष यह 31 प्रतिशत था। पिछले वर्ष भी यह आंकड़ा वर्ष 2007-08 में जीडीपी के 38 प्रतिशत तुलना में बहुत कम था। नोटबंदी ने आर्थिक गतिविधियों को साफ तौर पर नुकसान पहुंचाया है और वर्तमान में उद्योगों में उत्पादन क्षमता का 70 प्रतिशत ही उपयोग हो रहा है। विद्युत संयंत्र भी 60 प्रतिशत लोड फैञ्चटर पर चल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कर्ज में वृद्धि घटी है, जो एक लंबे दौर में सबसे कम है। बैंकों में अति-लाभकारी कंपनियों में 'दोहरी बैलेंस-शीट की समस्याÓ और बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपîिायों (या डूबत खाते के कर्ज) के चलते, अगली 3-4 तिमाहियों के दौरान निजी निवेश में वृद्धि की कोई संभावना नहीं है। इन परिस्थितियों में, ञ्चया बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश मात्र ही जीडीपी को बनाए रखने और नौकरियों में वृद्धि की मांग से अर्थव्यवस्था पर आने वाले भार को सहन करने में सक्षम होगा?

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च के राष्ट्रीय संस्थान के पूर्व महानिदेशक हैं। जस्टजॉबनेटवर्क के वरिष्ठ सलाहकार भी हैं।)

 

 

 

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