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हर जन संघर्ष का साथी

किसानों, कामगारों, मजदूर और वंचितों के लिए संघर्ष करना है उनका मकसद
समर्थक के साथ राहुल गांधी

राहुल का अर्थ होता है ‘सक्षम-कुशल’ और जब राहुल के साथ गांधी जुड़ जाता है तो वह सक्षमता होती है-‘नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई की’। राहुल गांधी को यह संस्कार महात्मा गांधी की वैचारिक विरासत के रूप में मिले हैं।

राहुल में स्वाभाविक सादगी है। वह कभी दिखावा नहीं करते। वह न झूठ बोलते हैं, न झूठ पसंद करते हैं। उनका मानना है कि सार्वजनिक जीवन में प्रत्येक नेता को पारदर्शी और अपने वादे के प्रति कटिबद्ध होना चाहिए। राहुल जी को नेतृत्व की एक वैभवशाली विरासत मिली, जिसमें महात्मा गांधी से ग्राम स्वराज्य, पंडित नेहरू से आधुनिक भारत, डॉ. अंबेडकर से दलितों का उत्थान, सरदार पटेल से अखंड भारत, शास्त्री जी से जय जवान जय किसान, इंदिरा जी से त्याग और बलिदान, राजीव जी से 21वीं सदी का भारत, डॉ. मनमोहन सिंह से आर्थिक प्रगति और सोनिया जी से समावेशी विकास। इसी विरासत को सहेज कर राहुल जी ने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार में आधारशिला रखी-‘अधिकार संपन्न भारत’ की।

हम यह बात पूरी प्रामाणिकता से कह सकते हैं कि राहुल जी का सर्वाधिक ध्यान इस बात पर कांग्रेस सरकार के पूरे कार्यकाल में रहा कि कैसे भारतीय प्रजातंत्र में व्यक्ति के अधिकारों को शासन व सरकारी तंत्र से बढ़कर प्राथमिकता मिले। उनकी मान्यता है कि प्रजातंत्र का मूल उद्देश्य है किसानों, कामगारों, मजदूरों, वंचितों, व्यापारियों, युवाओं, छात्रों एवं महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाना। वह इस क्रम में देश के नागरिकों को अधिकार संपन्न बनाने के कई कानूनों के प्रणेता बने। उदाहरणतः देश के 10 करोड़ से अधिक आदिवासी वनवासियों को ‘वनाधिकार अधिनियम’ के तहत न सिर्फ वन में आशियाने का अधिकार मिला अपितु वनोपज से उनकी आजीविका के अधिकार को भी कानूनी दर्जा मिला।

देश के 86 करोड़ नागरिकों को ‘खाद्य सुरक्षा कानून’ के तहत न सिर्फ भोजन का अधिकार दिया अपितु गर्भवती माताओं को ‘पोषण और भत्ते का अधिकार’ प्राप्‍त हुआ। एक तरफ देश के 125 करोड़ नागरिकों को प्रजातंत्र को हर व्यक्ति के प्रति जवाबदेह बनाने वाला ‘सूचना का अधिकार’ दिया तो साथ ही देश के अन्नदाता किसानों के लिए ‘भूमि का उचित मुआवजा अधिकार’ भी कानून बना दिया गया।

वहीं भारत के भविष्य करोड़ों बच्चों को ‘शिक्षा का अधिकार’ मिला, तो अधिकारों के इस क्रम में करोड़ों गरीबों को काम का अधिकार देने वाले मनरेगा कानून की व्याख्या तो अपने आप में अनूठी है। इस तरह राहुल जी ने अपनी सोच से एक नए अधिकार संपन्न भारत की बुनियाद रखी और ये सब इतना आसान नहीं था। प्रतिपक्ष ने हर पल अधिकार संपन्न भारत के स्वप्न को साकार न होने देने के लिए कानूनी व राजनीतिक बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की मगर जनता के समर्थन के चलते वे सफल नहीं हो पाए।

ऐसा नहीं कि सिर्फ सत्ता के बल पर ही राहुल जी की नेतृत्व क्षमता का आकलन करना चाहिए। विपक्ष में रहते हुए उनका नेतृत्व कौशल और निखरा है। याद कीजिए कि देश में प्रचंड बहुमत की सरकार जब-जब जनता पर मनमानियां करती है तो प्रतिपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी उस पर अंकुश लगाते हैं। सब से बड़ा उदाहरण किसानों के लिए बनाए गए भूमि के उचित मुआवजा अधिकार कानून को निरस्त करने की साजिश रोकने का है। मोदी जी की लाख कोशिशों के बावजूद, अध्यादेश पर अध्यादेश लाने के बावजूद, राहुल जी ने किसानों के साथ अन्याय नहीं होने दिया और बीजेपी सरकार को मनमानी करने से रोका। चंद उद्योगपति मित्रों के हित साध रहे प्रधानमंत्री जी की नीतियों का विरोध करने के लिए राहुल जी के एक नारे-‘सूट-बूट की सरकार’-ने भाजपा को अपना रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया।

नोटबंदी और जीएसटी की वर्तमान तमाम गलतियों, जिससे छोटे व्यापारी और लघु उद्योग-धंधे चौपट हो गए, के खिलाफ न सिर्फ प्रभावशाली तरीके से आवाज उठाई बल्कि सरकार को मजबूर कर दिया कि चाहे कुछ हद तक ही सही, उन विकृतियों को दूर करे। वह प्रतिबद्ध हैं कि सरकार से तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक कि जीएसटी को देश के लघु व कुटीर उद्योग तथा छोटे व्यापारियों की आकांक्षाओं के अनुकूल न बना दिया जाए।

वह राहुल गांधी ही थे जिन्होंने यूपीए सरकार में देश के किसानों को कर्ज से उबारने के लिए व्यापक ‘कर्ज माफी योजना’ के प्रणेता की भूमिका निभाई और किसानों को 71 हजार करोड़ रुपये की ऐतिहासिक कर्जमाफी मिली। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने फिर उत्तर प्रदेश से ‘खाट यात्रा’ प्रारंभ की और यू.पी. सरकार को बाध्य किया कि वह किसानों की कर्जमाफी योजना की घोषणा करे।

विपक्ष के नेता के रूप में राहुल प्रभावी तरीके से पूरी परिपक्वता के साथ छात्रों के साथ हो रहे अन्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे प्रहारों, दलितों पर हो रहे अत्याचारों व ‘वन रैंक वन पेंशन’ में पूर्व सैनिकों के साथ किए जा रहे कुठाराघात के खिलाफ अहंकारी सत्ता से न सिर्फ लोहा लेते दिखाई देते हैं, अपितु न्याय के लिए उनका संघर्ष परिणाममूलक भी होता है। यही उनकी व कांग्रेस की ताकत भी है ध्येय भी और राष्‍ट्र के नवनिर्माण का रास्ता भी।

(लेखक कांग्रेस कम्‍युनिकेशन विभाग के प्रमुख हैं)

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