विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में नहीं थे जो ‘आते’ हैं। वे कभी साहित्यिक परिदृश्य में प्रवेश करते हुए दिखाई नहीं दिए। वे वहीं थे, शुरू से, लेकिन उस तरह नहीं जैसे ध्यान आकर्षित किया जाता है।
उनका लेखन किसी भी तरह के नाटकीय तंत्र या शैलीगत छल-कपट से दूर रहा। यह लेखन समय की रेखाओं में धीरे-धीरे चलता था। उनके कथ्य में पात्रों का नाम होना या न होना, घटनाओं का बड़ा मोड़ होना या न होना, सब इसलिए था ताकि पाठक उस अंतराल में बैठकर खुद को सुन सके।
विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसका संकोच है। यह संकोच कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक चेतना से उपजा हुआ है। वे शब्दों पर अधिकार नहीं जताते, वे उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं।
उनकी रचनाओं में दोहराव, ठहराव और हिचकिचाहट दिखाई देती है। आलोचना की भाषा में कहें तो यह शैलीगत जोखिम है। लेकिन यही जोखिम उनके लेखन को मानवीय बनाता है। वे जानते थे कि जीवन रेखीय नहीं है और भाषा ऐसी हो भी नहीं हो सकती।
उनकी रचनाओं में अनेक पात्र नामहीन हैं। यह कोई सौंदर्य-युक्ति नहीं, बल्कि एक वैचारिक स्थिति है। नाम देना किसी को स्थिर करना है, और शुक्ल जीवन को स्थिर नहीं करना चाहते थे।
उनकी कविता ‘जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे’ इसी अधूरेपन की स्वीकृति है। जीवन के वे लोग, जो हमारे सबसे निकट होते हैं, अक्सर हमारे सबसे निजी स्थानों से अनुपस्थित रहते हैं। शुक्ल इस अनुपस्थिति को दुख की तरह नहीं, सच्चाई की तरह स्वीकार करते हैं।
‘प्रेम की जगह अनिश्चित है’ यह पंक्ति किसी काव्यात्मक चमत्कार की तरह नहीं आती। वह लगभग सपाट है, और शायद इसी सपाटपन में उसकी सच्चाई है।
शुक्ल के यहां प्रेम कोई स्थिर भावना नहीं, बल्कि एक अस्थायी स्थिति है, जो आती है, रहती है, और कभी-कभी बिना किसी निष्कर्ष के चली जाती है। यह प्रेम आधुनिक मनुष्य की उस असुरक्षा को स्वीकार करता है, जिसे साहित्य अक्सर ढकने की कोशिश करता है।
विनोद कुमार शुक्ल को गैर-राजनीतिक कहना एक सरलीकरण होगा। उनका लेखन राजनीति को घोषणाओं में नहीं, ध्यान में खोजता है।
नौकर की कमीज में एक साधारण-सी वस्तु, ‘एक कमीज’ पूरे सामाजिक तंत्र को खोल देती है। आकांक्षा, वर्ग और असमानता वहां किसी नारे की तरह नहीं आते, बल्कि रोजमर्रा की विवशताओं में घुलकर दिखाई देते हैं।
2024 में मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार किसी उपलब्धि का चरम नहीं था। वह उस समय का विलंबित स्वीकार था, जो बहुत देर से उनकी भाषा की गति के साथ चल पाया।
शुक्ल पुरस्कारों से नहीं बदले। शायद इसलिए कि उन्होंने कभी उनके लिए लिखा ही नहीं। उनका लेखन स्वयं में पर्याप्त था।
विनोद कुमार शुक्ल के जाने के बाद हिंदी भाषा में एक तरह की नैतिक मौनता कम हो गई है। वह मौन, जो शब्दों को जरूरत से ज्यादा बोलने से रोकती थी।
उनकी रचनाएं अब भी हमारे साथ हैं। लेकिन उनके साथ वह दृष्टि भी चली गई, जो हमें बताती थी कि साहित्य का काम दुनिया को बदलना नहीं, उसे थोड़ा अधिक ध्यान से देखना भी हो सकता है।
दीवार में एक खिड़की रहती थी, आज भी रहती है। वह बाहर की ओर नहीं, भीतर की ओर खुलती है और शायद विनोद कुमार शुक्ल की सबसे बड़ी देन यही थी, कि उन्होंने हिंदी गद्य को फिर से अंदर की ओर देखना सिखाया।
(लेखक साहित्य और कला पर लिखते हैं)