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जनादेश ’23 नजरिया: जाति के चुनावी कार्ड के खतरे

नेहरू की राजनीतिक विरासत का लाभ लेने के साथ नेहरू की वैचारिक विरासत को भी स्वीकार करना चाहिए
इंडिया गठबंधन को जल्द अपनी रणनीति बनानी होगी

अब यह गिनवाने का कोई मतलब नहीं है कि हाल में विश्वकर्मा जयंती पर शुरू हुई विश्वकर्मा योजना की क्या प्रगति है या पांच राज्यों के चुनाव के ठीक पहले बड़े धूमधाम से शुरू हुई इस योजना की चर्चा चुनाव के दौरान क्यों नहीं हुई। अर्थव्यवस्था में अपने हुनर से योगदान देने वाली और आज की राजनीति में पिछड़ा या ओबीसी में गिनी जाने वाली जातियों के लोगों को उनके काम के लिए सुविधाजनक शर्तों पर पूंजी/ऋण उपलब्ध कराने वाली इस योजना को मोदी सरकार द्वारा विपक्ष के जातिवार जनगणना अभियान की काट के तौर पर पेश किया गया था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा अदालती लड़ाई जीतकर अपने यहां जातिवार जनगणना कराने (और फिर उसके अनुसार आरक्षण का कोटा बढ़ाने) जैसे फैसले के बाद भाजपा बैकफुट पर लग रही थी। बिहार में तो उसने जातिवार जनगणना का समर्थन किया था, लेकिन विरोध भी उसकी तरफ से ही हुआ। जातिवार जनगणना कराने और उसके आंकड़े प्रकाशित होने के बाद जैसी प्रतिक्रिया बिहार, उत्तर भारत और देश में मिलती लग रही थी उससे नीतीश कुमार ही नहीं, कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी बहुत उत्साहित लग रहे थे।

इस उत्साह में वे जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे समाजवादी नारे भी लगाने लगे थे। जब विपक्ष का ‘इंडिया’ गठबंधन बना तो इसके सूत्रधार नीतीश कुमार जातिवार जनगणना की मांग को इंडिया गठबंधन का मुख्य एजेंडा बनाकर भाजपा को बैकफुट पर लाना चाहते थे जबकि ‘इंडिया’ नाम देने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध से यह प्रस्ताव रुक गया गया। ऐसी खबर आई कि चुनाव प्रचार के दौरान हवा का रुख भांपकर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार कमलनाथ ने इस मुद्दे पर ज्यादा जोर न देने की सलाह दी। उन्होंने ऐसा किया हो या न किया हो पर यह मसला चुनाव प्रचार आगे बढ़ाने के साथ मद्धिम पड़ता गया। उधर चुनाव में महादेव ऐप और कन्हैयालाल मर्डर जैसे मसले उठाकर मोदी जी भी रोज नया बम धमाका करते गए, पर उन्होंने हवा भांपकर जाति के सवाल पर खुलकर बोलना शुरू किया और विपक्ष को जातिवादी बताने से भी नहीं चूके। जब रंग थोड़ा और जमता लगा तब गरीब, नौजवान, महिला और आदिवासी जैसी चार जातियों की बात उठाने लगे। बताना न होगा कि इस बीच इंडिया गठबंधन भी सो गया था और उसके सूत्रधार नीतीश कुमार भी अपने की बयानों और व्यवहारों को लेकर बैकफुट पर आ गए थे।

और फिर भाजपा ने जैसी सफलता पाई, उससे साफ है कि मोदी कार्ड चला, नीतीश या जाति-कार्ड नहीं चला। मध्य प्रदेश में तो इससे खास नुकसान हुआ लगता है क्योंकि वहां भाजपा के लंबे शासन से ऊब सबको लग रही थी। मंडल तक विरोध में रही भाजपा ने अगर अपनी सोच न बदलकर स्थितियों के अनुसार रणनीति बदली है और सफल हो रही है, तो मंडल वालों को भी कुछ और बातों पर गौर करना होगा, कुछ बदलाव करने होंगे। अगर मोदी, ममता या नवीन पटनायक (इधर नवीन भी कुछ बदले हैं) या योगी आदित्यनाथ इसका विरोध करके भी अच्छी राजनैतिक सफलताएं पा रहे हैं तो उन कारणों पर भी गौर करना होगा। पहला कारण तो प्रशासन की चौकसी और गरीबों को उसका लाभ देना है। दूसरी वजह जाति का जोर धीरे-धीरे कम होना भी है। फिर यह भी है कि जाति की राजनीति भी त्याग तपस्या मांगती है, वह कोई ऐसा मंत्र नहीं है कि मुंह से निकाला और असर हो गया। अगर बिहार और उत्तर प्रदेश ही नहीं, दक्षिण भारत में असरदार बनना है तो वहां एक लंबा इतिहास रहा है पिछड़ा ध्रुवीकरण का, सुधार आंदोलनों का, राजनीति का और एक से एक त्यागी-तपस्वी नेताओं का।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इस कार्ड का प्रयोग करने से पहले कांग्रेस को यह बुनियादी बात याद नहीं रही कि मंडल के एक बड़े नेता शरद यादव मध्य प्रदेश के होकर भी कभी वहां से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाए। 1974 में पहला चुनाव जीतने के बाद वे लगातार उत्तर प्रदेश और बिहार में ही जगह तलाशते रहे। मोहन प्रकाश राजस्थानी से ज्यादा बनारसी पहचान के लिए जाने जाते हैं। नारायण स्वामी, फुले, पेरियार और करुणानिधि का जीवन-संघर्ष और काम ही नहीं, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी, अनूप मंडल, जगदेव महतो, राजनारायण, बीपी मौर्या, कांशीराम और अर्जुन सिंह भदौरिया जैसों का काम मुलायम सिंह, लालू यादव और नीतीश कुमार के उछल-कूद करने का आधार बना, बिहार में निरंतर चल रहे पैंतीस साल के पिछड़ा राज का आधार बना। बाद के नेताओं ने पिछड़ा गोलबंदी बढ़ाई और स्वाभिमान बढ़ाया, लेकिन न तो प्रशासन के स्तर पर बढ़िया काम किया न अपना जीवन सामान्य रखा। सब नए राजा-महाराजा बन गए, सबने परिवार से उत्तराधिकारी बनाया, सबने दौलत इकट्ठा की। इस चुनाव में अपने साथ जाति के सवाल को भी पिटवाकर राहुल गांधी (नीतीश तो सामने आए नहीं) और उनके भक्तों ने साबित किया कि उनको अब भी बहुत कुछ सीखना है। इंदिरा गांधी ने भी ‘जात पर न पांत पर इंदिरा जी की बात पर’ का नारा लगाकर अपनी पार्टी के लिए जीत का आधार बनाया था, यह भी वे भूल गए। इस बार की हार की वजह जाति को जरूरत से ज्‍यादा महत्व देना भी है। उनको यह समझ नहीं आया कि बिहार-उत्तर प्रदेश में क्यों जाति का कार्ड ज्यादा प्रभावी है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, बंगाल, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में जातिगत ध्रुवीकरण वैसा नहीं है जैसा बिहार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में है। इसका मतलब जाति के साथ उसका ध्रुवीकरण होना भी महत्वपूर्ण है और यह एक राजनैतिक काम है, मंत्र जपने का नहीं। और अगर यह कहीं प्रभावी बना है तो उसे बनाने में त्याग तपस्या और कुर्बानी देनी पड़ी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)