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12 जून 2023 · JUN 12 , 2023

जम्मू-कश्मीर: राज्यपालों की सियासत

जगमोहन से लेकर मनोज सिन्हा तक जम्मू-कश्मीर की राजनीति को आकार देने में राज्यपालों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
सबसे विवादास्पद अध्यायः जब जगमोहन (बाएं) राज्यपाल थे और फारूक अब्दुल्ला (दाएं) की सरकार चली गई थी

भारत के अन्य राज्यों के विपरीत जम्मू और कश्मीर के राज्यपालों की राज्य के राजनीतिक मामलों में अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार और राज्यपाल के बीच लगातार टकराव देखा गया है। 1984 में राज्य सरकार को बर्खास्त करने वाले राज्यपाल जगमोहन के खिलाफ तो फारूक अब्दुल्ला का गुस्सा जगजाहिर है। मुफ्ती मोहम्मद सईद और लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एस.के. सिन्हा की भी कभी नहीं बनी। जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकारों के समय तक सरकारें अति सक्रिय राज्यपालों के बावजूद अपना जोर उस पर कायम रखती थीं, लेकिन 2018 से निर्वाचित सरकार की अनुपस्थिति में जम्मू-कश्मीर में आए दो राज्यपाल, सत्यपाल मलिक और वर्तमान राज्यपाल मनोज सिन्हा अपने राजनीतिक बयानों और आग्रहों के लिए कुख्यात रहे हैं। इनसे उलट, 31 अक्टूबर, 2019 से 5 अगस्त, 2020 तक जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल रहे गिरीश चंद्र मुर्मू बिना किसी विवाद के यहां रहे थे।

इस साल मार्च में जब नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में संपत्ति कर लागू किए जाने का विरोध किया था, तो उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 5 अगस्त, 2019 के बाद ‘अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिए झूठ के सहारे जनता को गुमराह करने की कोशिश’ का आरोप नेताओं पर लगाया था। उन्होंने उनकी बातों को दुष्प्रचार बताया और कहा कि कुछ लोग सोच रहे हैं कि जम्मू कश्मीर उनकी ‘जागीर’ है। उन्होंने कहा, “उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत संविधान से चलता है और जम्मू-कश्मीर इसका हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर को अब किसी की मर्जी से नहीं चलाया जा सकता।”

पिछले साल दिसंबर में घाटी में एक कश्मीरी पंडित की हत्या के बाद सिन्हा का बयान आया था कि धर्म के आधार पर कश्मीर में हत्याओं को देखना बंद कर देना चाहिए। इस पर कई दक्षिणपंथी उनसे नाराज हो गए थे और उनके ऊपर कश्मीरियों के तुष्टिकरण का आरोप लगाया था। कश्मीरी पंडितों के कुछ संगठनों ने उन्हें हटाने की मांग की थी। इस पर सिन्हा ने कहा, “मैं कहना चाहता हूं कि कश्मीर घाटी के लोग भी मारे जाते हैं। ऐसे मजदूर भी हैं जो सेब के मौसम में बिहार, ओडिशा, झारखंड से आते हैं। दो-तीन घटनाएं हुईं हैं, लेकिन एक (झूठी) कहानी फैलाई जा रही है।”

बयानवीरः पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक (बाएं) और मनोज सिन्हा

बयानवीरः पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक (बाएं) और मनोज सिन्हा 

अपने ताजा संबोधन में सिन्हा ने दावा किया कि करीब 1000 लोग ऐसे हैं जिन्हें राज्य को बर्बाद करने के लिए सरकार से ठेका मिला था लेकिन उनका समय अब खत्म हो चुका है क्योंकि वर्तमान प्रशासन जम्मू-कश्मीर के हर नागरिक की सेवा करने और उनकी बात सुनने के लिए प्रतिबद्ध है। किसी पार्टी का नाम लिए बिना सिन्हा कहते हैं कि कुछ लोग जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास को पचा नहीं पा रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला मनोज सिन्हा के बयानों पर तंज कसते हुए कहते हैं कि वह जो कह रहे हैं कहने दीजिए, एक दिन उन्हें भी सत्यपाल मलिक की तरह जम्मू-कश्मीर छोड़कर जाना होगा।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति को आकार देने में राज्यपालों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए यहां राज्यपाल की नियुक्ति को बड़ी उत्सुकता से देखा जाता है। इस मामले में राज्यपाल जगमोहन सबसे विवादास्पद थे, जो 1986 में गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार को बर्खास्त करने के बाद खुद सर्वेसर्वा बन बैठे थे। जगमोहन ने 1984 में शाह को खुद शपथ दिलाई थी। उन्होंने डॉ. फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली तत्कालीन सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस को दो हिस्सों में तोड़ दिया था। 1989 में उनकी नियुक्ति के चलते मुख्यमंत्री अब्दुल्ला को इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया। उनका छोटा सा कार्यकाल उग्रवाद के खिलाफ कड़े सुरक्षा उपायों के लिए याद किया जाता है जिसके कारण सिलसिलेवार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले सामने आए।

फारूक अब्दुल्ला, जगमोहन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करते हैं, जिसने कश्मीरी पंडितों को बसों में बैठाया और कहा कि उन्हें दो महीने में वापस लाया जाएगा। वे कहते हैं कि जब दिल्ली ने उनके बजाय जगमोहन पर भरोसा करना शुरू कर दिया, तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया, “उनके शासन के पहले ही दिन 50 लोगों की जान चली गई। सब उन्हीं के हाथ में था। वह चा‍हते तो क्या इस स्थिति को नहीं रोक पाते?”

जगमोहन के बाद गिरीश चंद्र सक्सेना और केवी कृष्ण राव आए। उनके बीच सबसे लंबा राज्यपाल शासन रहा- छह साल और 264 दिन - जो अक्टूबर 1996 में समाप्त हुआ जब नेशनल कॉन्फ्रेंस ने साढ़े नौ साल के अंतराल के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत के साथ और स्वायत्तता के वादे के साथ सत्ता में वापसी की।  केवी कृष्ण राव के बाद एक अन्य सैन्यकर्मी एसके सिन्हा का नंबर आया। मुफ्ती मुहम्मद सईद द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली पारी शुरू करने के सात महीने बाद 2003 की गर्मियों में सिन्हा ने राज्यपाल का पद संभाला था। उनका कार्यकाल भी बेहद विवादास्पद साबित हुआ था। 2002 से 2005 तक राज्यपाल सिन्हा और मुख्यमंत्री सईद की आपस में नहीं पटी। पीडीपी सिन्हा के ऊपर एजेंडे पर चलने का आरोप लगाती थी।

सिन्हा ने एकीकृत मुख्यालय में राज्यपाल की भूमिका की मांग की। यह उग्रवाद विरोधी एक ऐसा ग्रिड है जिसमें सभी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां शामिल होती हैं। मुख्यमंत्री आमतौर पर इसके प्रमुख होते हैं। उनके कार्यकाल में राजभवन ने राज्य सरकार को साथ लिए बिना भी कार्यक्रमों का आयोजन शुरू कर दिया था। उन्हें हटाए जाने के बाद भी विवाद जारी रहा। सिन्हा की जगह एनएन वोहरा को नियुक्त किया गया। वोहरा प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, रक्षा सचिव और गृह सचिव रह चुके थे। उन्हें फरवरी 2003 में जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार के वार्ताकार के रूप में नियुक्त किया गया था और 25 जून, 2008 को राज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति तक वह बने रहे। वोहरा किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़े। वोहरा के समय में जम्मू-कश्मीर को चार बार राज्यपाल शासन के अधीन रखा गया था। राज्य में अपने दस वर्ष और चार बार राज्यपाल शासन के दौरान वोहरा ने कभी भी लोगों को अपने किसी किए पर किसी शिकायत का मौका दिया। उनके आखिरी दिनों में तो स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ था। एक पूर्व नौकरशाह कहते हैं, “वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को जानते थे और उनका कोई एजेंडा नहीं था। मुझे याद है कि एक बार मैंने संपादकों से उन्हें कहते सुना था कि उन्हें जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति उदार होना चाहिए।”

बहस से बाहरः एनएन वोरा गैर-विवादित राज्यपाल रहे

बहस से बाहरः एनएन वोरा गैर-विवादित राज्यपाल रहे

वोहरा के बाद सत्यपाल मलिक आए। यह कई दशकों के बाद था कि किसी नेता को राज्य का राज्यपाल बनाया गया था। वह पहले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लोकदल के साथ रह चुके हैं और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के साथ काम कर चुके हैं। अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत मलिक केवल छोटी सी अवधि के लिए ही राज्यपाल बने रहे– एक साल और दो महीने, लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान और उसके बाद भी उन्होंने विवाद खड़ा किया। अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने से पहले मलिक ने इस बारे में आशंकाओं को अफवाह बताया था। जब इसे वाकई रद्द कर दिया गया तो उन्होंने इसका श्रेय ले लिया। जब पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने 2018 में सरकार बनाने का दावा पेश करने वाला अपना पत्र उन्हें फैक्स किया, तो उनका कुख्यात बयान आया कि “उनकी फैक्स मशीन काम नहीं कर रही थी।”

अक्टूबर 2019 में मलिक को जम्मू-कश्मीर से हटाकर गोवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया। कश्मीर से बाहर रहकर भी वे विवादास्पद बयानबाजी करते रहे। आज कश्मीर में राजनीतिक स्थिति बदल चुकी है। जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश है। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल अगले साल होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा के लिए अहम है। सत्यपाल मलिक इसका उदाहरण हैं।