साल में एक बार शहर हो जाना
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में करेली के पास नर्मदा नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध और प्राचीन घाट बरमान की कहानी अनोखी है। ‘ब्रह्मांड घाट’ के नाम से भी पहचाने जाने वाले इस कस्बे को भगवान ब्रह्मा की तपोभूमि माना जाता है। यहां मकर संक्रांति से बसंत पंचमी तक प्रसिद्ध मेला लगता है। बरमान साल भर कस्बा रहता है। सीमित आबादी, सिमटा हुआ, रोजमर्रा की गति में चलता हुआ। लेकिन, साल में एक बार माघ महीने में यह कस्बा खुद से बाहर निकल आता है। बाहर निकलना फैलाव का नहीं, रूपांतरण होता है। नियत तिथि से पहले लोग आने लगते हैं, जगहें बदलने लगती हैं। बरमान में न कोई घोषणा होती है कि अब वह शहर बनने जा रहा है, न कोई उद्घाटन। फिर भी सबको पता होता है कि वह समय आ गया है जब कस्बा शहर की तरह बर्ताव करने लगेगा। सड़कें लंबी हो जाती हैं, मैदान चौक बन जाते हैं और नर्मदा किनारे का खालीपन एक योजनाबद्ध भीड़ में बदलने लगता है।
नया भूगोल
यह शहर बनने की प्रक्रिया मेला लगने के साथ नहीं, उससे पहले शुरू हो जाती है। तंबू खड़े होने से पहले रास्ते निर्धारित हो जाते हैं, दुकानों से पहले जगहें बांट ली जाती हैं और घाटों से पहले शहर की सीमाएं। नर्मदा के चौड़े घाट, सतधारा का फैलाव और आसपास का समतल मैदान। सब मिलकर इस अस्थायी शहर के लिए आधार तैयार करते हैं। जहां साल भर खेत या खाली जमीन होती है, वहां कोई इलाका बाजार बनता है, कोई रुकने की जगह, कोई धार्मिक क्रियाओं का स्थल। सब बिना किसी लिखित योजना के होता है, पर किसी को भ्रम नहीं होता कि कहां क्या है। पिछली बार की स्मृतियों से अपनेआप सब बन जाता है।
नदी से शुरू, नदी पर खत्म
जब शहर पूरी तरह खड़ा हो जाता है तब बरमान की दिनचर्या कस्बे जैसी नहीं रहती। सुबह नदी से शुरू होती है और रात नदी पर ही खत्म होती है। अस्थायी बस स्टैंड से लेकर अस्थायी अस्पताल तक हर जरूरी व्यवस्था मौजूद रहती है, पुलिस चौकी, खोया-पाया केंद्र, खाने-पीने की छोटी-बड़ी दुकानें। यहां लोग स्थायी पते के बिना रहते हैं, फिर भी शहर काम करता है। बरमान स्थायित्व के बिना भी काम करता रहता है, उन शहरों की ही तरह, जो दीवारों और इमारतों से पहचाने जाते हैं। यह लोगों की आवाजाही से पहचाना जाता है।
मिट्टी के चुल्हे और समूह भोजन
खुले में बनती सामूहिक रसोई यहां की पहचान है। नर्मदा किनारे के घाटों से थोड़ी दूर, लोग मिट्टी पर चूल्हे सजा लेते हैं। बाटी, दाल और बैंगन का भर्ता किसी मेन्यू का हिस्सा नहीं, रोजमर्रा की जरूरत बन जाता है। बैंगन सीधे आग में रखे जाते हैं और उनकी महक हवा में फैलते ही शहर का यह इलाका सक्रिय हो उठता है। बरमान के इस अस्थायी शहर में बैंगन का भर्ता पहचान बन चुका है। लोग समूह में बैठकर खाते हैं। भोजन यहां पेट भरने भर की क्रिया नहीं, बल्कि उस शहर में शामिल होने का तरीका है, जो साल में एक बार ही पूरे रूप में सामने आता है।
आवाज भी पहचान
इस शहर में बहुत तरह की आवाजें हैं। लाउडस्पीकरों से आती घोषणाएं, दुकानदारों की पुकार, लोकगीतों की धुनें और भजनों की गूंज। सब मिलकर इस अस्थायी नगर का ध्वनि-मानचित्र बनाते हैं। लोकसंगीत यहां कार्यक्रम नहीं, बल्कि परिवेश है। ढोलक और मंजीरे के साथ गाए जाने वाले गीत शहर के चलने की गति तय करते हैं। यह शहर केवल देखने का नहीं, सुनने का भी अनुभव है।
मौत का कुआं, चकरी, सर्कस
बरमान साल में एक बार शहर हो जाता है, और फिर अगली बार के लिए खुद को बचा लेता है। यहां कहीं चकरी घूम रही होती है, कहीं सर्कस लगा रहता है, कहीं ‘मौत के कुएं’ में करतब दिखाते हुए कलाकारों को देखने के लिए भीड़ जमा है, तो कहीं किसी पंडाल में जादूगर खेल दिखा रहा है। शहर वही रहता है, चमकता हुआ, भीड़ भरा।
सहअस्तित्व का शहर
कोई घाट शहर का दिल है तो कोई बाजार उसकी धड़कन। अस्थि-विसर्जन के पास ही कोई चाय की दुकान चल रही होती है और वह किसी को असहज नहीं करती। यह शहर विरोधों से नहीं, सहअस्तित्व से चलता है। शायद इसी संतुलन के कारण लोग साल-दर-साल लौटते हैं। बिना किसी घोषणा के शहर सिमटना शुरू कर देता है। दुकानें उठ जाती हैं, तंबू गायब हो जाते हैं, रास्ते छोटे होने लगते हैं। बरमान फिर से वही कस्बा बन जाता है, जैसा साल भर रहता है। फर्क बस इतना होता है कि जिन्होंने उस अस्थायी शहर में कुछ दिन बिताए हैं, उनकी स्मृति में, आदत में शहर अगले साल की प्रतीक्षा में जीवित रहता है।

(लेखक)