जीवंत विरासत
हिमाचल प्रदेश का सुंदरनगर अपने नाम की ही तरह सौंदर्य, सौम्यता और सांस्कृतिक गरिमा का नगर है। यह केवल शहर नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, लोक संस्कृति की सुगंध और आधुनिक विकास की सधी हुई चाल का अद्भुत संगम है। प्राचीन काल में ‘सुकेत’ नाम से प्रसिद्ध यह नगर सुकेत रियासत की राजधानी रहा है। ‘सुकेत’ शब्द ‘सुक्षेत्र’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘उपजाऊ और उत्तम भूमि।’ 765 ईस्वी में राजा वीर सेन द्वारा स्थापित इस रियासत ने समय के साथ एक सशक्त सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक केंद्र का रूप लिया है। पहले इसकी राजधानी पांगणा थी, जो बाद में लोहारा, करतारपुर के बाद सुंदरनगर (बनेड़) में स्थानांतरित हुई। यह रियासत पंजाब हिल्स स्टेट्स का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
अतीत और आधुनिकता
सुंदरनगर का बाजार नगर का केंद्र है, जो बाहरी और भीतरी हिस्सों में विभक्त है। बाहरी बाजार राष्ट्रीय राजमार्ग-21 के साथ चलता जाता है, जहां आधुनिक जीवन की चहल-पहल दिखती है, जबकि भीतरी बाजार पुरानी गलियों, पारंपरिक दुकानों और स्मृतियों से भरा हुआ है। कभी इसी भीतरी बाजार से यह राजमार्ग गुजरता था। आज भी यहां अतीत की धड़कन महसूस की जा सकती है। जिस तरह कवि केदारनाथ सिंह ने बनारस के बारे में लिखा है, यह शहर भी हर दिन अपने तय क्रम में खुलता और बंद होता है।
उत्सवों का मंच
राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित जवाहर पार्क सुंदरनगर का सबसे बड़ा सार्वजनिक मैदान है, जो वर्ष भर खेल प्रतियोगिताओं, कृषि प्रदर्शनियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों का साक्षी बनता है। इसी मैदान में प्रतिवर्ष सुकेत रियासत का प्रसिद्ध देवता मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें सैकड़ों देवी-देवता रथों और पालकियों सहित पहुंचते हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन से अंतिम नवरात्रि तक चलने वाले इस मेले में देव माहुंनाग की पूजा का विशेष महत्व है। यह मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक संगीत, नृत्य और परंपराओं का जीवंत उत्सव है।
छिंज परंपरा
जवाहर पार्क के एक ओर चंडीगढ़-मनाली सड़क से ठीक नीचे नगौण खड्ड प्रतिवर्ष प्राचीन नलवाड़ मेले की गवाह बनती है। कभी यहां हजारों बैलों की खरीद-फरोख्त होती थी, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। समय के साथ यह परंपरा क्षीण हुई है, लेकिन ‘छिंज’ (पारंपरिक कुश्ती) आज भी इस नलवाड़ की विशेष पहचान है। देशभर से नामी पहलवान यहां अपनी ताकत और दांव-पेंच का प्रदर्शन करने आते हैं। इसकी प्रसिद्धि ऐसी है कि दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं। इसकी रौनक देखते ही बनती है।
पुराना बाजार
पुराना बाजार सुंदरनगर का वह हिस्सा है, जहां आज भी अतीत की हलचल महसूस की जा सकती है। यह शास्त्रीय संगीत का गढ़ रहा है। तंग गलियां, पुराने भवन, संस्कृत महाविद्यालय (जो सौ वर्ष पूरे कर चुका है), कलाकारों और ज्योतिषियों का बसेरा, सब मिलकर इस बाजार को बनारस की ऐतिहासिक गलियों जैसा रूप देते हैं। पुराना बाजार का चौगान वह ऐतिहासिक स्थल है जहां प्रसिद्ध ‘झकड़याधी’ मेला लगता था, जो विशेषकर किसानों व ग्रामीणों की जरूरतों को पूरा करता था।
सुकेत सत्याग्रह
सुकेत का इतिहास केवल राजाओं और मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि जन-संघर्ष की गौरवशाली परंपरा भी इसमें शामिल है। बेगार प्रथा, भ्रष्ट प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और उसके बाद फरवरी 1948 में पंडित पद्म देव के नेतृत्व में ‘सुकेत सत्याग्रह’ इतिहास का वह पन्ना है, जिसने सुकेत रियासत का विलय भारतीय संघ में सफल बनाया। हिमाचल के गठन में पहले-पहल सुकेत रियासत का जुड़ना एक महत्वपूर्ण घटना थी।
आस्था का प्रवाह
शहर और उसके आस-पास स्थित देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिर जिसमें देवी महामाया, सूरजकुंड, नरसिंह, त्रिपुरसुंदरी देवी, गणपति, जंगम बाग का राधाकृष्ण मंदिर, महादेव शिव मंदिर, बालाकामेश्वर, माता अर्धक्वारी, गोपाल मंदिर, लक्ष्मी-नारायण, माता शीतला, मुरारी मंदिर, कुलाड़ा महादेव और बेताल गुफाएं इस इलाके की गहरी आस्था और धार्मिक विरासत को सहेजे हुए हैं।
रोवर स्मारक और ताम्र पर्वत
ललित चौक के समीप स्थित रोवर स्मारक अपनी अनूठी कथा के लिए जाना जाता है। सुकेत के महाराजा भीमसेन के प्रिय कुत्ते रोवर की स्मृति में निर्मित यह स्थल वफादारी, विश्वास और पशु-प्रेम का दुर्लभ उदाहरण है। यही नहीं, यहां स्थित ‘त्रांबड़ी धार’ (ताम्र पर्वत) अपनी तांबा-युक्त खनिज संपदा के लिए प्रसिद्ध है। यहां शुकदेव वाटिका, शुकदेव मुनि की तपस्थली है, जहां मौजूद गुफा से उनके रोज गंगा स्नान जाने की मान्यता तथा पांडवों के प्रवास से जुड़ी कथाएं लोकविश्वास में जीवित हैं।
व्यवस्था का संतुलन
यहां विवाह, त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में लोकगीत, संगीत और पारंपरिक रस्में पूरे गौरव के साथ निभाई जाती हैं। यहां वर्षभर साहित्यिक आयोजनो का सिलसिला भी बना रहता है। साथ ही, शहर के प्रवेश द्वार पर एक ही सीध में स्थित प्रमुख कार्यालय सुंदरनगर की सुव्यवस्थित और व्यावहारिक नगर-व्यवस्था को दर्शाते हैं। यह स्मृतियों, संघर्षों, आस्थाओं और सौंदर्य का ऐसा नगर है, जहां कदम रखते ही लगता है कि प्राचीनता और आधुनिकता एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्कुरा रही हों।

(लेखक)