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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

आवरण कथा/जेल डायरीः ‘‘जेल के बाद जिंदगी मुश्किल, निगरानी और उत्पीड़न जारी’’

जेल के बाद जिंदगी मुश्किल होती है। हम उन खुशकिस्मत लोगों में हैं, जिनके पास सामाजिक पूंजी है, दोस्त, परिवार, दूसरे एक्टिविस्ट, हमारे संगठन, हमारे संपर्क, हमारी शिक्षा, सिविल सोसाइटी जो हमें टिके रहने में मदद करती है
सुधा भारद्वाज

कुछ हफ्ते पहले, जैसा दावा किया जा रहा है, सादे कपड़ों में कुछ पुलिस वाले उस सोसाइटी में आए, जहां मैं एक दोस्त के किराए के घर में रहती हूं। पुलिस के पास मेरा मोबाइल नंबर है, जिसे वे यकीनन लगातार मॉनिटर करते हैं। इसके अलावा, मैं हर 14 दिन में स्‍थानीय पुलिस थाने में रिपोर्ट करती हूं और मैं नियमित अदालतों की तारीखों पर जाती हूं, ज्‍यादा नहीं तो कम से कम हर 15 दिन में एक बार। इसके बावजूद, पुलिस ने मुझे फोन करने की जहमत नहीं उठाई। जब वे मेरे घर आए तो मैं फोर्ट (मुंबई के केंद्रीय इलाके) में अपने सीनियर के ऑफिस में थी, जहां से मैं हाइकोर्ट में वकालत करती हूं। उनके पास पूछने के लिए कोई सवाल नहीं थे। जहां मैं रिपोर्ट करती हूं, उस कस्तूरबा नगर थाने के पुलिस वाले और अदालती तारीखों पर आने वाले राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) के अधिकारी दोनों ने यही बताने की कोशिश कि उन्‍हें सोसाइटी में पहुंचे पुलिसवालों की कोई जानकारी नहीं है। तो, साफ है कि मकसद सिर्फ मेरे पड़ोसियों, मेरी सोसाइटी और मेरे कमजोर दिल वाले मकान मालिक को डराना था। जबसे मैं यहां रह रही हूं, ऐसा पिछले तीन साल में तीसरी बार हुआ है और दिसंबर 2021 में मेरी रिहाई के बाद से पांच या छह बार हो चुका है। संदेश दो-टूक है, तुम जेल से छूटने के बाद अपनी टूटी हुई जिंदगी को धीरे-धीरे फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही हो, लेकिन हम समय-समय पर आकर माहौल बिगाड़ेंगे, तुम्हें बदनाम करेंगे, तुम्हारे मकान मालिक, तुम्हारे पड़ोसियों को डराएंगे। मत भूलना, हमारी नजर तुम पर है।

जेल के बाद जिंदगी मुश्किल होती है। हम उन खुशकिस्मत लोगों में हैं, जिनके पास सामाजिक पूंजी है, दोस्त, परिवार, दूसरे एक्टिविस्ट, हमारे संगठन, हमारे संपर्क, हमारी शिक्षा, सिविल सोसाइटी जो हमें टिके रहने में मदद करती है। जेल में ज्‍यादातर महिलाएं हैं, खासकर वे जो किसी जुनून में आकर अपराध कर बैठती हैं, जैसे पति, सास या प्रेमी की हत्या वगैरह और उन्हें वर्षों तक जेल में डाल दिया जाता है। जेल के अधिकारी उनके पुनर्वास को गंभीरता से नहीं लेते हैं। हुनर के कार्यक्रम, मसलन, ब्यूटी पार्लर या हाउसकीपिंग (यानी झाड़ू-पोंछा) की ट्रेनिंग एक मजाक है। कैदियों को उन कोर्स को पढ़ने में शायद ही कोई मदद की कोशिश की जाती हैं, जिनमें वे दाखिला लेते हैं; वे पूरी तरह अकेले होते हैं।

जेल में सामाजिक कार्यकर्ता हमेशा कागजी काम में व्यस्त रहते हैं। ऐसी स्थिति में, महिला कैदियों को उनके अलग हुए परिवारों और बच्चों से संपर्क का मामला पीछे छूट जाता है। महिलाओं को जेल मुलाकातों के दौरान पतियों को लिखने या सह-आरोपियों के पतियों से मिलने की इजाजत मिल सकती है। लेकिन प्रेमी या दोस्त से मुलाकात... हे भगवान, यह तो सोचा भी नहीं जा सकता!

अक्सर महिलाओं को आर्थिक मदद नहीं मिलती। उन्हें जमानत पाने के लिए भी ऐसे कानूनी मदद की व्‍यवस्‍था पर निर्भर रहना पड़ता है, जो बेहद लुंजपुंज है। फिर, खासकर दूसरे राज्यों के कैदियों के लिए जमानतदार मिलना बेहद मुश्किल होता है। इसलिए जमानत के आदेश के बाद भी कई महिलाएं जेल में सड़ती रहती हैं। कई बीमारियों से पीडि़त एक बूढ़ी महिला मथुराबाई की बाइकुला जेल में कोविड से मौत हो गई, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह 15,000 रुपये की जमानत राशि नहीं दे पाई थी। जमानत उसे एक साल से भी पहले मिल गई थी।

सो, हैरानी नहीं है कि जेल से बाहर महिला कैदियों को सबसे ज्‍यादा मदद उन दोस्तों से मिलती है, जो वे जेल में बनाती हैं। अलग-अलग तरह के और अजनबी लोगों के साथ दोस्ती जेल में जिंदा रहने के लिए बहुत जरूरी होती है। ये वही दोस्त होते हैं जो अपने वकीलों से किसी ऐसे कैदी का केस लड़ने के लिए कह सकते हैं जिसका कोई वकील नहीं है, जमानत की रकम के लिए पैसे उधार दे सकते हैं या नई-नई रिहा हुई कैदी को तब तक रहने की जगह दे सकते हैं जब तक वह अपनी कोई व्‍यवस्‍था नहीं बना लेती। यह जानकर कि मैं वकील हूं, कई कैदियों ने अपने केस के बारे में सलाह लेने के लिए या ‘‘अपने वकीलों से बात करने’’ के लिए मुझसे संपर्क किया। इसमें भी कोई हैरानी नहीं है कि बिना किसी सहारे के ये महिलाएं अपराध की उसी या अलग दुनिया में लौट सकती हैं, जैसे सेक्स वर्क, ड्रग कुरियर, छोटी-मोटी चोरी वगैरह। ऐसे पेशे उन्‍हें कुछ समय के लिए सुरक्षित पनाह देते हैं। इन्‍हीं मिसालों के जरिए उनकी अपराध-वृत्ति का प्रमाण मान लिया जाता है, लेकिन सवाल है कि जेलों में उन्हें कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प देने के लिए क्या कोशिशें हुई हैं?

जहां तक मेरी बात है, मैं अपने उन सामाजिक रूप से जागरूक परिचितों का जितना भी शुक्रिया अदा करूं कम है। ये लोग मेरे लिए जमानत देने के आगे आए। कई दोस्तों ने मुझे अपने घर में या अपने मालिकाना हक वाले घर में पनाह दी। सीनियर वकील साहब ने मुझे जगह और मौका दिया। मैं वह काम कर सकी, जिसमें मैं एक बार फिर खुद को तन्‍मयता से जोड़कर अपनी पहचान और गरिमा वापस पा सकी। कई ट्रेड यूनियनों और मजदूरों ने अपने केस मुझे सौंपे और मेरे गुजारे का इंतजाम किया। उन सबका शुक्रिया।

मैं मुंबई से पूरी तरह जुड़ गई हूं। मिलें भले ही बंद हो गई हों, लेकिन यह शहर दिल से मजदूरों का ही है। बोरीवली से चर्चगेट तक रोजाना लंबे सफर में मुस्कुराने के लिए जाने-पहचाने मेहनती चेहरे मिल जाते हैं। वरना, सोचिए कि अनजान शहर में बिना घर, बिना परिवार, बिना नौकरी और बिना बैंक बैलेंस के बंद रहना कैसा होता। कुछ दोस्त और बहुत सारे शुभचिंतक, जो अब दोस्त बन गए हैं। उन्होंने मुझे बचाया।

लेकिन, इससे छत्तीसगढ़ में तीन दशकों से ज्‍यादा समय तक ट्रेड यूनियन और मानवाधिकार वकील के तौर पर मेरी जिंदगी में आए अचानक और मुश्किल बदलाव की भरपाई नहीं हो सकती। वहीं मेरा संगठन, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्ता समिति) है, जहां मेरे वकील साथी हैं। जमूल और डल्ली राजहरा की मजदूर बस्तियों में मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों से मेरे बहादुर मुवक्किल हैं। कई नेक लोग हैं जिनसे मैं इन दशकों के काम के दौरान मिली। मैं छत्तीसगढ़ को जानती हूं और प्यार करती हूं, जंगल, फैक्टरियों, भाषा-बोली, गीत-गाना, खाना-पीना, त्योहार और बस्तियों को जानती हूं। यहां तक कि धुआं और धूल और खदानें भी जानी-पहचानी हैं। सबसे बढ़कर, वे मजदूर हैं, जिन्होंने मुझे इतना प्यार दिया है और मुझे जिंदगी के बारे में वह सब कुछ सिखाया है, जो मेरी थाती है। उनमें कई मजाक में कहते हैं, ‘‘दीदी, आप छोटी जेल से निकलकर मुंबई की बड़ी जेल में आ गई हैं।’’ खैर, मुझे मुंबई से भी जमानत चाहिए।

सुधा भारद्वाज

लेकिन मैं इतनी भी एहसान फरामोश नहीं होना चाहती। मुझे बड़ी राहत है कि इकलौती बेटी मायशा से मेरा विछोह खत्म हो गया है। हालांकि हम हमेशा एक ही छत के नीचे नहीं रहते। उसने पहले भिलाई से ग्रेजुएशन किया और अब कोलकाता में क्लिनिकल साइकोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रही है। कम से कम हम हर दिन या जब चाहें एक-दूसरे से बात कर सकते हैं, वीडियो कॉल पर एक-दूसरे को देख सकते हैं और जितनी देर चाहें बात कर सकते हैं। अब कोई महिला सिपाही नहीं चीखती कि ‘‘दस मिनट हो गए।’’

मेरी कैद की वजह से मेरी बेटी को बहुत परेशानी हुई, खासकर कोविड के दौरान। पुणे या मुंबई की यात्राएं अक्सर नहीं हो पाती थीं। मुलाकातों में हर तरह की लालफीताशाही होती थी।

उसके लिखे हुए खत, जो दुख, गुस्से और कड़वाहट से भरे होते थे मुझे बहुत परेशान करते थे। उसके खत खोलने से पहले मुझे खुद को मानसिक रूप से तैयार करना पड़ता था। देरी बहुत ज्‍यादा होती थी। उसके खत जेल में एक हफ्ते तक पड़े रहते थे, फिर उन्हें सेंसर करके मुझे दिया जाता था। इसी तरह, मेरे जवाब भी देरी से पहुंचते थे। हमें 15 दिन में एक खत लिखने की इजाजत थी। वो भी पोस्ट होने से पहले एक हफ्ते यूं ही पड़े रहते थे। असल में, मेरे दिलासे के शब्द परेशान बच्ची तक एक महीने बाद पहुंचते थे।

मेरी जमानत के बाद वह खुश है और ज्यादा सुरक्षित महसूस करती है। कभी-कभी मेरा फोन साइलेंट मोड में होता है या दूसरे कमरे में चार्ज हो रहा होता है, तब उसके कॉल का जवाब नहीं दे पाती, तो वह बुरी तरह घबरा जाती है। लेकिन हां, इन सबके बावजूद वह बहुत बहादुर है और पूरे पक्के इरादे से साइकोलॉजी पढ़ने का अपना लक्ष्य पूरा कर रही है। यह कोई कोई छोटी बात नहीं है। इस समय उसकी पढ़ाई मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

एक बड़ी समस्या है कि आर्थिक रूप से गुजारा कैसे किया जाए। हालांकि मुझे पढ़ाना बहुत अच्‍छा लगता है और जमानत पर रिहा होने के बाद से मैंने कानून और सोशल वर्क के छात्रों को पांच-छह ऑनलाइन गेस्ट लेक्चर दिए हैं, लेकिन मुझे पढ़ाने की कोई औपचारिक नौकरी नहीं मिलेगी। बेहतरीन कानूनी मदद वाले एनजीओ भी मुझे अपने यहां नहीं रख पाए। उन्हें डर है कि उनका एफसीआरए फौरन रद्द हो जाएगा।

मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं वकील हूं और वकालत पर कोई बंदिश नहीं है। हालांकि, हर सामाजिक रूप से जागरूक वकील के सामने आने वाली दुविधाएं बनी हुई हैं। जिन्हें हमारी सबसे ज्‍यादा जरूरत है, वे शायद सबसे कम पैसे दे पाएंगे। लेकिन यह जनहित याचिकाओं के दिनों से जानी-पहचानी मुश्किल राह है।

जेल के बाद जिंदगी चलती रहती है, आना-जाना, केस, कॉल, क्लाइंट, पुलिस और ख्‍वाहिशें सब कुछ। सुखद दिन भी आते हैं, जब कोई केस सही दिशा में चलता है, या जब मेरी बेटी घर आती है या जब किसी सह-आरोपी को जमानत मिलती है। लेकिन बुरे दिनों में डिप्रेशन आपको दबा देता है और बिस्तर से उठना मुश्किल हो जाता है। ऐसे दिनों में मुझे वह गाना याद आता है, ‘‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके, जरा बचके, ये है बम्बई मेरी जान!’’

 

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