तारीखों के ऐलान के साथ ही विधानसभा चुनावों की गरमी बुलंदी पर पहुंच गई है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को लगे झटके से मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा सरमा के लिए चुनौतियां बड़ी हैं, जबकि विपक्षी कांग्रेस के लिए यह वजूद की लड़ाई है। इस मायने में ये चुनाव असम की भावी राजनीति भी तय करने जा रहे हैं। हालांकि विपक्ष चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहा है कि एक चरण में 9 अप्रैल को वोटिंग और 4 मई को नतीजे की तारीखों का मतलब है कि 26 मार्च को नाम वापसी के बाद उम्मीदवारों को प्रचार के लिए बमुश्किल दस दिन का वक्त है, जबकि नतीजे तीन हफ्ते बाद आएंगे। चुनाव आयोग वोटरों के नाम काटे जाने को लेकर भी सवालों के घेरे में है। इस तरह पिछली बार के उलट इस बार असम के प्रमुख त्योहार बिहू से पहले ही सब कुछ निपट जाएगा।
भाजपा के मुख्यमंत्री सरमा अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए जोर लगा रहे हैं, तो प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनैतिक जमीन वापस पाने के लिए पूरा दम लगा रही है। देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगुआई वाले गठजोड़ में वामपंथी पाटियां, अखिल गोगोई का रायजोर दल, एजेपी और एपीएचएलसी है। राज्य की कुल 126 सीटों में कांग्रेस 100 सीटों पर और बाकी सीटों पर सहयोगी दल चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने अपनी पहली सूची में 88 नामों की सूची जारी की है। असम के मुख्यमंत्री अपनी पारंपरकि सीट जालुकबारी से ही चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ने कांग्रेस छोड़ कर आए प्रद्युत बारदोलाई को दिसपुर से और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रह चुके भूपेन बोरा को बिहपुरिया से टिकट दिया है। ये दोनों ऐन चुनावी वेला में भाजपा में शामिल हुए। इससे भी संकेत मिलता है कि भाजपा के लिए इस बार मैदान कठिन है। बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर चुका है।
गौरतलब है कि चुनावी तारीखों की घोषणा से चंद घंटे पहले असम सरकार ने एक कार्यक्रम का समय शाम 6.30 बजे से बदलकर दोपहर 2 बजे कर दिया और उसमें वरिष्ठ अधिकारियों ने कई घोषणाएं कीं, क्योंकि मुख्यमंत्री केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ किसी दूसरे कार्यक्रम में व्यस्त थे। उन घोषणाओं में 17 जनवरी के गुवाहाटी “बागुरुम्बा द्वहौ” कार्यक्रम में शामिल बोडो संगीतकारों, कलाकारों, प्रशिक्षकों और विशेषज्ञ समिति के सदस्यों को मानदेय देने की घोषणा शामिल थी। राज्य सरकार ने असम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (एएसआरएलएम) और एनडीडीबी डेयरी सर्विसेज के बीच 19 करोड़ रुपये के करार की भी घोषणा की, जिसके तहत कछार, हैलाकांडी और श्रीभूमि जिलों में महिलाओं के स्वामित्व वाले दुग्ध उत्पादक संगठनों की स्थापना भी शामिल है। इस पहल का उद्देश्य 400 गांवों की लगभग 16,000 महिलाओं को सहयोग देना है। इसके अलावा सरकार ने “रुद्र” नाम से एक मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया, जो एआइ और भू-स्थानिक सूचना प्रणाली (जीआइएस) से संचालित होता है। यह ऐप लोगों को सड़कों पर मौजदू गड्ढों की जानकारी देने और उन्हें जियो-टैग करने की सुविधा देगा। मुख्यमंत्री ने जनवरी 2025 में ही इस ऐप को बेहतर बनाने की घोषणा की थी, ताकि सड़क मरम्मत के काम में तेजी लाकर इसके प्रभावी बनाया जा सके।
दांव पर क्या-क्या
2016 में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने विभिन्न जातियों, जनजातियों और समुदायों के बीच अपना समर्थन आधार बढ़ाया है, जिनमें कई पहले पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोट बैंक माने जाते थे। हालांकि, वहां का राजनैतिक माहौल पहचान की राजनीति और सांप्रदायिक विभाजन सहित कई आंतरिक तनावों से भरा है। फिर, विकास के बड़बोले सरकारी दावों के उलट वह जमीन पर नहीं दिखता। लोगों में बड़े पैमाने पर असंतोष है। खासकर युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास बड़ा मुद्दा है।
यही वजह है कि सरमा सरकार ने लगभग 40 लाख परिवारों की महिलाओं को 9,000 रुपये की सहायता राशि दी और 12 मार्च को खानापारा में आयोजित समारोह में 5,690 नए सरकारी कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि युवाओं को 65,000 और नौकरियां दी जाएंगी। उन्होंने यह दावा भी किया कि उनकी सरकार अब तक 1.64 लाख सरकारी नौकरियां दे चुकी है।
2021 के विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने हर साल एक लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया था, बाद में कहा कि यह संख्या उनके पूरे पांच साल के कार्यकाल की है।
इस चुनाव में भाजपा काफी हद तक मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के जोड़तोड़ की ताकत के आसरे दिख रही है। पार्टी अपनी चुनावी रणनीति में सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व को मुद्दा जरूर बना रही है लेकिन आलोचकों का कहना है कि पार्टी अभी भी ध्रुवीकरण के भरोसे है। जहां प्रवासी, जमीन का मालिकाना हक, धार्मिक पहचान और स्वदेशी अधिकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख है।
मुस्लिम समुदायों को प्रभावित करने वाले बेदखली अभियान और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े विवादों ने भी माहौल ज्यादा तनावपूर्ण बना दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि ऐसे मुद्दों को जानबूझकर उभारा जा रहा है ताकि जमीन और पहचान को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़े और हिंदू मतदाताओं का समर्थन मजबूत किया जा सके।
सरमा बनाम गोगोई
इस बार बहस के केंद्र में मुख्यमंत्री सरमा का असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई के खिलाफ अभियान है, जिसमें पिछले दो साल से सरमा लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि गोगोई 2013 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसएस के निमंत्रण पर वहां गए थे। इस पर कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री को चुनौती दी है कि वे इस आरोप के समर्थन में सबूत पेश करें या कानूनी कार्रवाई करें। कांग्रेस इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज करती रही है।
ऐसे आरोप-प्रत्यारोप अब नियमित हो चुके हैं। गोगोई अक्सर शासन और आर्थिक प्रदर्शन से जुड़े सवाल उठाते हैं, जबकि सरमा जवाब में पाकिस्तान से जुड़े आरोप को फिर सामने ले आते हैं। दूसरी ओर गोगोई ने मुख्यमंत्री पर असम के विभिन्न हिस्सों में बड़ी मात्रा में जमीन खरीदने करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो इन जमीनों की जांच कराई जाएगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें भूमिहीन में बांटा जाएगा।

जोरहाट में गौरव और अखिल गोगोई
सरमा और गोगोई के बीच बढ़ती टकराहट ने इस चुनाव को राजनैतिक के बजाय व्यक्तिगत मुकाबले का रूप दे दिया है। यह टकराव केवल चुनावी बयानबाजी का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें एक दशक से भी पुरानी राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में हैं, जो कांग्रेस के भीतर से ही शुरू हुई थी। भाजपा में शामिल होने से पहले सरमा, गौरव गोगोई के पिता दिवंगत तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में वरिष्ठ मंत्री थे। उनके बाद पार्टी में नेतृत्व को लेकर टकराहट में सरमा ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। इस टूट ने असम की राजनीति को नया आकार दिया और राज्य की सबसे तीखी राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं में से एक की नींव रखी।
कांग्रेस की चुनौती
कांग्रेस, जो कभी असम की सबसे प्रभावशाली राजनैतिक शक्ति हुआ करती थी, 2016 में सत्ता गंवाने के लगभग एक दशक बाद भी खुद को फिर से स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही है। जमीनी स्तर पर उसकी उपस्थिति अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है, हालांकि पार्टी नए उम्मीदवारों के जरिए खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है।
यह रणनीति पार्टी के पुनर्निर्माण का संकेत देती है, लेकिन इससे उसका पारंपरिक संगठनात्मक ढांचा भी अस्थिर हो सकता है, जो लंबे समय तक उसकी ताकत रहा है। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में नए राजनैतिक चेहरों को व्यापक सामाजिक पहुंच बनाने का प्रयास माना जा रहा है या फिर ऐसा दांव, जिसे स्थानीय स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनावी नहीं बल्कि अस्तित्व से भी जुड़ी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं, जिनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा भी शामिल हैं। पार्टी छोड़ने वाले कई नेताओं ने मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई की आलोचना की है, हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि दल बदलने वाले नेताओं के ऐसे आरोप राजनैतिक बयानबाजी का हिस्सा होते हैं।
कांग्रेस पार्टी के भीतर अब यह माना जाने लगा है कि साख बहाली उसकी सबसे बड़ी समस्या है। वर्षों तक संगठनात्मक सुस्ती के बाद मतदाता अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि पार्टी राजनैतिक विमर्श के केंद्र में क्यों दिखाई नहीं देती। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनका चुनाव अभियान व्यापक “भाजपा विराेधी” गठबंधन बनाने पर केंद्रित है, साथ ही पार्टी खुद को ज्यादा उदार और समावेशी विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार के आरोप और जनजातीय तनावों को दूर करने जैसे मुद्दे उसके चुनावी संदेश के मुख्य बिंदु हैं। हालांकि पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी इन प्रयासों को कमजोर करती रहती है। कई जिला इकाइयां अब भी बंटी हुई हैं और पुराने वफादार नेताओं और नए शामिल हुए सदस्यों के बीच तनाव बना हुआ है।
सहयोगी और क्षेत्रीय दल
इसी बीच कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर भी भरोसा करती दिखाई दे रही है। इनमें असम जातीय परिषद (एजेपी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (एपीएचएलसी) और रायजोर दल शामिल हैं।
असम की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की स्थिति भी अनिश्चित बनी हुई है। असम गण परिषद, जो कभी असमिया क्षेत्रीयता की प्रमुख आवाज हुआ करती थी, अब मुख्यतः भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ है और उसकी स्वतंत्र वैचारिक पहचान काफी हद तक बड़े सहयोगी दल में मिल चुकी है। इसके विपरीत, नए दल जैसे रायजोर दल और असम जातीय परिषद असमिया उप-राष्ट्रीयता के नए रूप को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। रायजोर दल के नेता अखिल गोगोई प्रभावशाली राजनैतिक शख्सियत माने जाते हैं। उनकी सक्रियतावादी राजनीति के कारण उन्हें सराहना भी मिलती है। अब यही रायजोर दल और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ने को तैयार है।
एआइयूडीएफ की रणनीति
इस बीच ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी अपनी राजनैतिक रणनीति का पुनर्मूल्यांकन कर रही है, क्योंकि पिछली बार की तुलना में यह पार्टी राज्य में काफी कमजोर हो चुकी है। कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन टूट चुका है, लेकिन अब भाजपा के साथ “पिछले दरवाजे से समझौते” के आरोप लगाए जा रहे हैं। गौरव गोगोई ने आरोप लगाया है कि भाजपा राज्यसभा की एक सीट सुरक्षित करने के लिए एआइयूडीएफ का समर्थन ले चुकी है। उन्होंने कहा कि तीसरी राज्यसभा सीट के लिए एआइयूटीएफ के समर्थन पर भाजपा की निर्भरता उसके उस पुराने रुख के विपरीत है जिसमें वह बदरुद्दीन अजमल की पार्टी को राज्य के लिए खतरा बताती रही है। एआइयूडीएफ इस विधानसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरने की योजना बना रही है और पार्टी के अनुसार वह 28 से 32 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।
पिछली बार के आंकड़े
2021 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने कुल 75 सीटें जीती थीं। इस गठबंधन के भीतर भाजपा को 60 सीटें मिलीं, असम गण परिषद को नौ सीटें, यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल को सात सीटें और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट को तीन सीटें मिलीं। विपक्षी गठबंधन, जिसमें कांग्रेस, रायजोर दल और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) शामिल थे, को कुल 25 सीटें मिलीं। इनमें 22 सीटें कांग्रेस ने जीतीं, दो रायजोर दल को मिलीं और एक सीट सीपीआइ (एम) के खाते में गई। एआइयूडीएफ ने 15 सीटें जीती थीं। चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के चार विधायक भाजपा में शामिल हो गए, जबकि एक नेता कांग्रेस से निलंबित होने के बाद रायजोर दल में चले गए।
जैसे-जैसे असम चुनाव की ओर बढ़ रहा है, यह मुकाबला केवल विचारधारा का नहीं, बल्कि सत्ता को बनाए रखने और उसे चुनौती देने के संघर्ष का भी बनता जा रहा है। सांप्रदायिक विभाजन, क्षेत्रीय आकांक्षाएं और शासन को लेकर बहस ये सब मिलकर ऐसी राजनैतिक लड़ाई का रूप ले चुके हैं, जो आने वाले वर्षों के लिए राज्य की राजनैतिक दिशा तय कर सकती है।