विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे, यह वाक्य बीते कुछ दिनों से कुछ इस सघनता से गूंज रहा है कि हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति हर ओर महसूस की जा रही है। कह सकते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल की कविता कई बार जिस विलोम को साधती थी, उसने जीवन और मृत्यु के बीच स्मृति का ऐसा तार खींच दिया है कि मृत्यु जीवन से बंधी हुई है और हम अपने कवि को अपने बीच बोलता हुआ महसूस कर पा रहे हैं, बल्कि उनकी ही शैली का सहारा लें तो उनके ‘नहीं रहने’ की क्षणिकता को स्थगित कर उन्हें कालातीत की तरह पढ़ने और याद करने में लगे हुए हैं।
बीते कुछ दिनों में विनोद कुमार शुक्ल पर बहुत कुछ लिखा गया। उनमें नया कुछ न जोड़ पाने की अवशता के बावजूद यह टिप्पणी लिखने का मकसद है उस अनुभव को महसूस करने की कोशिश करना, जिसने विनोद कुमार शुक्ल को बनाया, क्योंकि बिल्कुल प्रारंभ से यह दिखता है कि विनोद कुमार शुक्ल अंततः कविता की दुनिया के ही वासी थे। यह बात भले कभी अशोक वाजपेयी कहते रहे हों- हालांकि बाद में इसके इतर भी जाने की उन्हें जरूरत महसूस हुई- कि कविता का अपना लोकतंत्र होता है और साहित्य की अपनी स्वायत्त नागरिकता होती है, लेकिन इस लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में जिन्होंने संभव किया, जो अपनी कविता से यह नागरिकता अर्जित करते रहे, वे असंदिग्ध तौर पर विनोद कुमार शुक्ल थे।
शायद इस बहुत सूक्ष्म सी नागरिकता की वजह से ही उन्हें यह समझ में आता था कि जो अदृश्य है, उसे भी देखना चाहिए और जो दिख रहा है, उसके पार भी जाना चाहिए। वे समय की शिला को देखते थे और यह कभी भी हिल और गिर सकती है- बस इसका हिलना-गिरना स्थगित है। क्षण को क्षणातीत के आईने में देखने का यह हुनर उन्हें विलक्षण बनाता था।
हालांकि इससे यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल भाषा में वायवीय अनुभवों या दार्शनिक निष्कर्षों का मायाजाल रचने वाले कवि थे। वे बहुत सचेत ढंग से सामाजिक, बहुत गहरे ढंग से राजनैतिक और बहुत उदात्त ढंग से मानवीय कवि थे। ‘लगभग जयहिंद’, ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहन कर विचार की तरह’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’, ‘अतिरिक्त नहीं’, ‘कविता से बड़ी कविता’ जैसे उनके कविता संग्रह अगर एक तरफ उनकी बीहड़ प्रयोगधर्मिता के साक्ष्य हैं तो दूसरी तरफ उस मार्मिक संवेदनशीलता के, जिसके साथ वे अपनी कविता के कारखानों में शब्दों को नए अर्थों और नए रूपों में ढाल रहे हैं, उनमें अधिकतम कोमलता भर रहे हैं और संभवतम ऊष्मा भी। उनके इस प्रयत्न के दायरे में निजता का बोध भी है, पारिवारिकता का स्पर्श भी, पास-पड़ोस का खयाल भी, देश और दुनिया की फिक्र भी। हालांकि यह कविता किसी जाने-पहचाने राजनैतिक मुहावरे में व्यक्त नहीं होती, वह उनके छोटे से अंचल की प्राकृतिक और सांस्कृतिक अवस्थिति के बीच आकार लेती है- बहुत मामूली लोगों और प्रसंगों के उल्लेख के साथ, बहुत मद्धिम लेकिन अनसुनी न की जा सकने वाली पुकारों के बीच, उस जीवट को रचते हुए, जिसकी वजह से इस संस्कृति ने बहुत सारे दबावों के बावजूद अपनी सहज जीवनी शक्ति बचाए रखी है। छोटी-छोटी कविताओं में उनका मामूलीपन, अपने घर-आंगन, अपने धरती-आकाश से जुड़ाव अलग सी आभा के साथ व्यक्त होता है- ‘प्रवास से पहले सोचता हूं / कि निवास करता हूं / आकाश को देखता हूं / आंगन को प्रणाम करता हूं / धरती को देखता हूं / और घर के कोने को प्रणाम करता हूं / घर के आगे पिछवाड़े / छानी-छप्पर, आले, बल्ली को / घर के इस पार उस पार को / खुली खिड़की दरवाजे को / दिन और रात को / लोगों को प्रणाम करता हूं / कि निवासियो! प्रणाम करता हूं।’ क्या यह प्रणम्य विनम्रता भी उस दुनिया को बहुत गहराई से देखने का एक जरिया नहीं है, जिसे विनोद कुमार शुक्ल कविता में संभव करते हैं?
दिलचस्प यह है कि विनोद कुमार शुक्ल जब भी याद आते हैं, प्राथमिक तौर पर एक कवि के रूप में याद आते हैं, जबकि हम पा रहे हैं कि एक उपन्यासकार के तौर पर उनकी कीर्ति उत्तरोत्तर विस्तार पा रही है। 1979 में जब ‘नौकर की कमीज’ छप कर आया, तो उस उपन्यास का हिंदी में अलग तरह से स्वागत हुआ। अमूमन कथाओं का आश्चर्य लोक इस बात से बनता है कि आगे क्या होगा, लेकिन विनोद कुमार शुक्ल का आश्चर्य लोक उससे बनता रहा जो हो चुका। घर इस उपन्यास में केंद्रीय रूपक की तरह खुलता है। संतू बाबू घर से निकलते हैं क्योंकि एक घर निकलने के लिए है और फिर वापस लौटने के लिए। घर का होना दरअसल अपने होने की तसल्ली है। हिंदी में गरीब और संघर्षशील नायकों और उन पर केंद्रित उपन्यासों की एक पूरी परंपरा रही है, लेकिन वे किरदार जितने व्यक्तिवाचक हैं, उतने ही या उससे ज्यादा जातिवाचक- वे जैसे किसी न किसी तबके के प्रतिनिधि हैं- किसान हों, मजदूर हों, कारीगर हों या फिर क्लर्क हों। ‘नौकर की कमीज’ के साथ विनोद कुमार शुक्ल उस नायक को उसकी व्यक्तिवाचकता लौटाते हैं, बिना कुछ कहे उसके वर्गीय चरित्र का लोप कर उसके मानवीय चेहरे को सामने ले आते हैं। यह चेहरा दाढ़ी बनाता है, सब्जी लाता है, मां से बात करता है, दोस्त को आवाज देता है, कम पैसे की खींचतान के बीच सिनेमा देखने का खर्च और अवकाश निकाल लेता है- और यह सब जिस व्यक्त मामूलीपन के साथ करता है, वह कलेजा चीर देने वाला है। उसका शोषण होता है लेकिन इतना घीरे-धीरे कि उसमें विरोध करने की इच्छा नहीं रह जाती। संतू बाबू कहते हैं, ‘‘संघर्ष का दायरा बहुत छोटा था। प्रहार दूर-दूर से और धीरे-धीरे होते। चोट बहुत जोर की नहीं लगती थी। शोषण इतने मामूली ढंग से असर डालता कि विद्रोह करने की किसी की इच्छा नहीं होती, या कि विद्रोह भी बहुत मामूली होता था। मेरा वेतन एक कठघरा था जिसे तोड़ना मेरे वश में नहीं था। वह कठघरा कमीज की तरह फिट था और मैं पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक वेतन पा रहा था। इस कठघरे में सूराख कर मैं सिनेमा देखता था या स्वप्न।’’
विनोद कुमार शुक्ल का अगला उपन्यास ‘खिलेगा तो देखेंगे’ के नाम से आया, लेकिन हिंदी में इसे वह सराहना या स्वीकृति नहीं मिली जो ‘नौकर की कमीज’ को हासिल हुई थी। लेकिन जब साल 2000 में ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ छप कर आया, तो हिंदी की दुनिया नए सिरे से चौंक उठी। यह कैसा उपन्यासकार है जो उपन्यास में कविता भर लाया है? विनोद कुमार शुक्ल की एक लोकप्रिय- हालांकि कम स्वीकृत- आलोचना यह भी है कि वे अपने लेखन में एक तरह का रूपवाद पैदा करते हैं- ऐसा कोमल यथार्थ जिसमें सब अच्छा-अच्छा लगता है, उसकी दुर्धर्षता भी गायब हो जाती है और उसके लिए संघर्ष करने की इच्छा भी। उनकी इस बात के लिए भी आलोचना हुई कि वे तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक हालात पर टिप्पणी नहीं करते, उससे बेखबर या बेपरवाह रहते हैं और उन नेताओं से भी उन्हें गुरेज नहीं, जो छत्तीसगढ़ या बाकी देश में सांप्रदायिकता या दलितों-आदिवासियों के उत्पीड़न का खुला और डरावना खेल खेलते रहे हैं।
यह मान लेने में हर्ज नहीं कि हां, ऐसी तात्कालिक प्रतिक्रियाएं विनोद कुमार शुक्ल के यहां नहीं मिलतीं। लेकिन इसकी वजह उनके किसी वैचारिक या रणनीतिक पलायन में नहीं, उस स्वभाव में है जो बहुत धीरे-धीरे बन रहे यथार्थ को, बहुत मद्धिम आवाजों को, बहुत ओझल दृश्यों को देखने का आदी है- वे चीख कर नहीं, चुप रह कर भी अपना प्रतिरोध जताते हैं- शायद सचेत ढंग से नहीं, लेकिन राज्य-सत्ता की परिधि के बाहर अपनी एक अलग साहित्यिक नागरिकता का निर्माण करते हुए।
दरअसल यही नागरिकता है, जो सुदूर रायपुर में बैठे हुए विनोद कुमार शुक्ल को लगभग विश्वजनीन बना डालती है। हम पाते हैं कि उनके हिस्से देश और दुनिया के बड़े पुरस्कार आ रहे हैं- ज्ञानपीठ और पेन नाबाकोव जैसे- तीस लाख रुपये की रॉयल्टी आ रही है, जो उनसे पहले एकमुश्त शायद ही किसी हिंदी लेखक को नसीब हुई हो। यह सच है कि यह सब उनके जीवन में बहुत देर से आया, लेकिन जिस विलंबित लय में उन्हें जीने का अभ्यास था, प्रसिद्धि से एक तरह की विमुखता थी, उसे देखते हुए जब भी आया उचित ही आया। इसी से यह आश्वस्ति भी मिली कि हिंदी की लगातार सख्त होती दीवार में एक खिड़की रहती है, जिससे ताजा हवाओं के आने-जाने की संभावना भी बनी रहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं)
आउटलुक के आज की चुनौतियां शीर्षक अंक, 3 दिसंबर 2018 में छपी दो कविताएं
यह सच है
कि मेरे बाबा उत्तर प्रदेश से
यहां आये|
मेरा जन्म यहीं हुआ
मेरे पिता का जन्म
मेरी बेटी का भी
जो अब पचास बरस की भइ
अथवा इक्यावन बरस के होही
वह महराष्ट्र में ब्याही गई
न मैं वहाँ जा पाता दस पाँच बरस
न वह यहाँ आ पाती दस पाँच बरस
इतना वह भी वहाँ बस गई|
इस बसने बसाने में
पर इतना थक गया अपनों में
कि बरसों के पड़ोसी के घर गया
तो उसके लिए
उत्तर प्रदेश से आया हुआ गया|
गली मुहल्ले में मैं पुराना बाहरी
बल्कि अटल बाहरी
कि देसी होने के लिए
देश में कोई देस नहीं|
.......
मैंने खुद को अपने घर में
नज़रबंद कर लिया है -
अब कोई छुपा हुआ नहीं रह सकता
यह मैं जानता हूं फिर भी|
कानून की नज़र मुझ पर नहीं पड़ी
पर पड़ोसी तक नज़र पहुंच चुकी थी
पड़ोसी ने ऐसा कभी भी कुछ नहीं किया,
वह इतना खुला हुआ था
कि उसके व्यक्तित्व में
कोई बंद खिड़की नहीं थी
उसकी बातें खुली खिड़की से सुनाई देतीं
यहां तक कि उसकी सोच भी
खुली खिड़की से दिखाई दे जाती|
उसके एक कमरे के घर में तो
दरवाज़ा भी नहीं था
उसी के घर कुछ पक रहा था
शायद षड्यंत्र, नहीं
खाना पक रहा था
और वह रंगे हाथ पकड़ा गया !!