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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

आवरण कथा/जेल डायरीः ‘‘ कैद में भी उम्मीद जिद की तरह अटकी है ’’

अंतरिम जमानत के बाद जब घर गया था, तो उम्मीद थी कि शायद फैसला हक में हो।
उमर खालिद

इस बार अंतरिम जमानत के बाद मैं तिहाड़ लौटा, तो बहुत कुछ बदल गया था। बैरक में लगभग पचास और कैदियों को डाल दिया गया था, जिसमें पहले से ही काफी भीड़ थी। मतलब शांति और सुकून और घट गया था। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज की तो यह कमी ज्‍यादा खलने लगी। फैसले के बाद मैं मीडिया हंगामे से उबरने की कोशिश कर रहा था। टीवी न्यूज और अखबारों में रिपोर्टिंग की वजह से अब पहले से कहीं ज्‍यादा कैदी मुझे जानते हैं। सभी मुझसे बात करना चाहते हैं, पता नहीं महज जिज्ञासा या हैरानी से। लेकिन, कुछ वक्‍त मैं एकदम अकेले रहना चाहता हूं।

अंतरिम जमानत के बाद जब घर गया था, तो उम्मीद थी कि शायद फैसला हक में हो। मैं अपनी सारी किताबें, नोट्स, चिट्ठियां, तस्वीरें, कार्ड बांधकर घर ले गया था। जमानत खारिज होने और एक साल तक यहां से निकलने की कोई गुंजाइश न होने पर मैंने अपनी सेल में जो कुछ इंतजामात किए थे, वह एकदम खाली-खाली लग रहे हैं। शायद यह नई शुरुआत है।

फैसले के बाद शुरुआती कुछ दिन हमेशा मुश्किल होते हैं। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने मेरी जमानत नामंजूर की, मुझे 2022 के वे दिन याद आ गए, जब निचली अदालत में पहली बार मेरी जमानत खारिज हुई थी। मैं अंदर तक हिल उठा। अब पांच साल से ज्‍यादा समय बिताने के बाद, तीन अलग-अलग अदालतों से जमानत खारिज होने पर मुझे लाचारी से उबरने की आदत सी हो गई है। हालांकि, ठंड के मौसम में उदासी और बढ़ जाती है। मैं शॉल और कई गर्म कपड़ों में लिपटकर सोता हूं, क्योंकि रात में सेल की लोहे की सलाखों से आने वाली तेज हवाओं से सीमेंट की स्लैब पर सोना मुश्किल हो जाता है। सुबह फिर भी कुछ सुकून रहता है, जब हमें बाहर निकलने और धूप में टहलने-बैठने की इजाजत मिलती है।

लेकिन तीसरे पहर 3 बजे के बाद जब वापस लॉकअप में जाने का वक्‍त आता है, तब मायूसी छाने लगती है। मेरा दिमाग अंधेरे में डूबने लगता है। मैं सोचने लगता हूं कि क्या कभी आजाद इंसान के तौर पर बाहर निकल पाऊंगा। यह भी ख्‍याल आता है कि जमानत मिल भी जाती है तो क्‍या? अदालत से जिन्हें जमानत मिली है, उन पर इतनी कड़ी पाबंदियां लगाई गई हैं कि बाहर की जिंदगी शायद उतनी ही सीमित रहेगी, जितनी जेल के अंदर है।

यह वक्‍त भी भारी चुनौती भरा है क्योंकि मेरा पुराना टीवी भी खराब हो गया है। आजकल टीवी पर ज्‍यादातर फिल्में काफी विषैली होती हैं, और खबरें तो और भी ज्‍यादा। लेकिन जिससे मुझे हिम्मत मिली, वह उसमें लगा रेडियो है, जिसमें मैं थोड़े गाने सुन पाता था। जेल में रहने के दौरान संगीत मेरा लगातार साथी रहा है। उम्मीद है, मैं जल्द ही अपने लिए एक और टीवी लेने की कोशिश करूंगा, कोई फैंसी वाला नहीं, बस जिसमें रेडियो हो।

मुझे तिहाड़ के पशु-पक्षियों से भी सुकून मिलता है। मैं दो बिल्लियों, शिल्पा और श्यामलाल को खाना खिलाता था। बाद में, शिल्पा के दो बच्चे हुए, जिनका नाम मैंने ब्लैक पैंथर और स्टुअर्ट लिटिल रखा। उनकी रोजाना की शरारतें देखना मजेदार और दिल को सुकून देने वाला होता है। इससे मुझे यह भी एहसास होता है कि मुझे इंसानों के बजाय उनके साथ समय बिताना ज्‍यादा पसंद है।

यह अजीब और दिलचस्प बात है कि जिन पर बाहर कई तरह के जुर्मों के आरोप हैं, वे जेल के अंदर बिल्लियों से लेकर पक्षियों और यहां तक कि छिपकलियों और चींटियों तक को खाना खिलाते हुए अपना समय बिताते हैं! यहां अंधविश्वास-सा है कि पशु-पक्षियों को खिलाने से सवाब (पुण्‍य) मिलता है, जिससे आखिरकार आजादी मिल सकती है। इसलिए बैरक के फर्श पर रोटी या चीनी के कण बिखरे हुए मिलना आम बात है, ताकि चींटियों को भरपेट खाना मिलता रहे। हमारे बैरक का सफाईकर्मी इसकी अक्सर शिकायत करता है, लेकिन कैदी सुधरते नहीं हैं। एक कैदी कुछ हफ्तों से हमारे बैरक में एक पेड़ को पानी दे रहा था, उसे जमानत मिल गई। अगले दिन, जब वह चला गया, तो तीन और लोगों ने पेड़ को पानी देने का काम संभाल लिया, इस उम्मीद में कि उन्हें भी रिहा कर दिया जाएगा। देखिए, उम्मीद जिद जैसी होती है, यहां तक कि कैद में भी।

मैं अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की सोच रहा हूं। हालांकि जमानत खारिज होने से मैं थोड़ा निराश हो गया था। मेरे दिमाग में पहले से ही कुछ किताबों की लिस्ट है, जिन्हें मुझे पढ़ना शुरू करना है। अब आजादी का इंतजार पहले से कहीं ज्‍यादा लंबा लग रहा है। इसलिए, मुझे खुद को आगे बढ़ाने के लिए जो कुछ भी हो सके, वह करना चाहिए, खासकर ऐसे माहौल में, जहां मेरे ऊपर लगाए गए आरोपों के बारे में लोगों के शक को यकीन में बदल दिया गया है। मुख्‍यधारा मीडिया में तो मुझे अब ‘राष्ट्र-विरोधी’ नहीं, ‘आतंकवादी’ कहा जाने लगा है।

जो लोग सरकार की बात पर विश्वास करते हैं, वे मुझे कैसे देखते हैं, यह मैं नहीं बदल सकता। लेकिन मैं चाहता हूं कि जो लोग मेरे साथ खड़े हैं, वे यह समझें कि मैं पीड़ित होने को खारिज करता हूं जिससे लोग अक्सर मुझे जोड़ते हैं। इस कभी न खत्म होने वाले इंतजार में दर्द तो वाकई है, लेकिन इस दर्द में भी एक खूबसूरती है। मैं जहां हूं, खुश हूं, भले ही मेरे साथ कुछ भी हो रहा हो, क्योंकि यह जानकर अच्छा लगता है कि यह सिर्फ मेरा निजी नहीं है। मुझे जेल में डालना सिर्फ मुझे एक व्यक्ति के तौर पर निशाना बनाना नहीं है; यह मेरे साथी कॉमरेडों को सबक सिखाना भी है कि जो कोई भी सत्ता में बैठे लोगों से मुश्किल सवाल पूछने की हिम्मत करेगा, उसे बिना किसी राहत के जबरन चुप करा दिया जाएगा। इसलिए, यह जो लड़ाई मैं लड़ रहा हूं, वह भी एक व्यक्ति के तौर पर मुझसे बड़ी है। जो लोग मेरी बातों पर विश्वास करते हैं, उन्हें मेरे और इस मामले में दूसरों के बारे में बात करने का तरीका बदलना होगा। हमारी लड़ाई एक सोच के लिए है, हमारे समाज के ऐसे दौर के लिए जब कुछ लोगों के हक दूसरों से ज्‍यादा नहीं होंगे। यही विश्वास इस दर्द को सहने लायक बनाता है।

मैं हर दिन भगत सिंह की उन पंक्तियों के साथ उठता हूं जो मैंने अपनी जेल की दीवार पर लिखी हैं:

राख का हर कण मेरी गर्मी से तप्‍है

मैं ऐसा पागल हूं कि जेल में भी आजाद हूं।

(जैसा अपेक्षा प्रियदर्शिनी को बताया।)

 

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