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सलमान की मानवता और आभिजात्‍य सोच

सलमान के समर्थकों को नशे की हालत में लोगों को कुचलने वाले स्‍टार की 'मानवता' तो दिखाई पड़ती है लेकिन गरीब फालतू नजर आते हैं। ताज्‍जुब की बात तो यह है कि हम इसी सोच के साथ 'स्‍मार्ट सिटी' का स्‍वप्‍न देख रहे हैंं।
सलमान की मानवता और आभिजात्‍य सोच

13 साल लंबे इंतजार के बाद निचली अदालत ने सलमान खान को हिट एंड रन मामले में दोषी करार दिया। इस हादसे में फुटपाथ पर सोए नूर मोहम्‍मद की मौत हो गई थी जबकि चार अन्‍य लोग घायल हो गए थे। अदालत के इस फैसले पर बॉलीवुड का बड़ा हिस्‍सा जिस बेशर्मी के साथ सलमान खान के समर्थन में उतर गया है और फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाड़ी चढ़ाने के अपराध को मामूली साबित करने के लिए जिस तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं, वह शहरी गरीबों के प्रति आभिजात्‍य वर्ग की समझ के खोखलेपन को जाहिर करता है। गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने तो मानवता की हदें पार करते हुए सलमान की लापरवाही के शिकार लोगों की तुलना सड़क के कुत्‍तों से कर डाली। गांव-कस्‍बों से रोजी-रोटी के लिए शहर आने वाले लोगों को ही कसूरवार ठहरा जा रहा है। 

 

अपने खून-पसीने से शहरों को बनाने वाली गरीब जनता का क्‍या इन शहरों पर कोई हक नहीं? क्‍या शहर सिर्फ दौलत के नशे में हवा से बातें करने के लिए ही सजे हैं? आखिर क्‍यों भारत के महानगरों में लाखों लोग फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं? दरअसल समस्‍या शहरी गरीबी को अवांछित समझने की इसी सोच से जुड़ी है, जिसका प्रदर्शन आज अभिजीत से लेकर सलमान खान के तमाम प्रशंसक कर रहे हैं। उन्‍हें नशे की हालत में लोगों को कुचलने वाले स्‍टार की मानवता तो दिखाई पड़ती है लेकिन फुटपाथ पर सोते मानव फालतू नजर आते हैं। यही सोच सरकार से लेकर शहरी प्रशासन तक फैली हुई है। 

 

मुंबई जैसे महानगर में बेघरों के लिए कोई इंतजाम नहीं हैं। अगर दिल्‍ली का ही उदाहरण लें तो यहां करीब एक लाख 80 हजार से ज्‍यादा बेघर लोगों में से 87.4 फीसदी के पास सिर छिपाने का कोई ठिकाना नहीं है। पूरी दिल्‍ली में करीब 190 आश्रय बने हैं जो 10 फीसदी बेघर जनता के लिए भी काफी नहीं हैं। ऐसा तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट में शहरी बेघर लोेगों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो मुकदमे चल रहे हैं। इसमें से एक जनहित याचिका मैंने ही लगाई थी। 

 

सलमान पर आए फैसले के बाद उनके समर्थकों की आेर से शहरी गरीबों पर जिस तरह की टिप्‍पणियों आ रही हैं, उससे शहरों में गरीबों के स्‍थान को लेकर बड़ी बहस छिड़नी चाहिए। आज स्‍मार्ट सिटी की बात हो रही है। लेकिन तरक्‍की के इस स्‍वप्‍न में जमीन सच्‍चाई को नहीं भूलना चाहिए। यहां सवाल अमीर या गरीब का नहीं बल्कि तरक्‍की के पैमानों और उसमें सभी वर्गों की हिस्‍सेदारी का भी है। 

 

(लेखक सामाजिक कार्यकतो हैं और लंबे समय से शहरी गरीबी व आवास से जुड़े मुद्दे पर सक्रिय हैं )

 

 

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