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फांसी की शर्मनाक छाया

मौत की सजा के जरिये अपराध की रोकथाम का लक्ष्य विफल हो चुका है। शोध यह साबित करने में लगातार विफल रहे हैं कि मौत की सजा से अपराध पर रोक लगती है।
फांसी की शर्मनाक छाया

मौत की सजा ने ऐतिहासिक रूप से निरंकुश शासन को बल प्रदान किया है। ईसा से 1800 साल पहले बेबीलोन के राजा हम्मूरावी ने हत्या को छोड़कर 25 अलग-अलग अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया था। ईसा पूर्व 7वीं सदी तक एथेंस के क्रूर शासन में हर अपराध के लिए मौत की सजा का प्रावधान था जबकि ईस्वी सन 29 में ईसा मसीह को सलीब पर लटकाने में रोमनों की कानून संहिता ट्वेल्व टेबलेट्स का हाथ था। ब्रिटेन ने, जिसने अपने उपनिवेशों पर बड़ा प्रभाव छोड़ा, फांसी की सजा को बढ़ावा दिया जबकि ऊंचे तबके के लिए सिर काटकर मौत की सजा का प्रावधान था। हेनरी आठवें के काल में 72 हजार लोगों को मौत की सजा दी गई, किसी को खौलते पानी में डालकर तो किसी को सर्पदंश के द्वारा। अठारहवीं सदी तक 222 अपराधों, जिसमें पेड़ काटना तक शामिल था, के लिए मौत की सजा का प्रावधान था। वर्ष 1857 में जब ब्रिटेन की फौज ने कानपुर पर फिर से कब्जा कर लिया, कैदी सिपाहियों को बीबीपुर में लाकर तोप के गोले से उड़ा दिया गया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च, 1931 को फांसी पर चढ़ाकर मौत की सजा दी गई। पूरे इतिहास में निरंकुश शासकों, हत्यारों और सामंतों ने मौत के जरिये ही अपराजेयता हासिल करनी चाही है।

भारतीय अदालतों ने वर्ष 2014 में 64 मौत की सजा सुनाई, जिसने इस वर्ष मौत की सजा सुनाने वाले 55 देशों की सूची में भारत को शीर्ष 10 में शामिल कर दिया है। वर्ष 1983 में जब सर्वोच्च अदालत ने दुर्लभ में भी दुर्लभतम मामलों में ही मौत की सजा देने का फैसला लिया है तब से भारत में मौत की सजा पर करीब-करीब प्रतिबंध ही लगा हुआ है। भारत में मौत की सजा का इंतजार कर रहा कोई व्यक्ति बच कर आ सकता है। मौत की सजा से संबंधित हमारी संस्‍थागत मशीनरी देरी और मनमानेपन की समस्या से ग्रस्त है। भारत में फांसी की सजा पाए 300 लोगों में से अधिकतर सालों से इंतजार कर रहे हैं। मौत की सजा की सार्थकता कुछ हद तक कालभ्रम से ग्रस्त साबित हो रही है।

दुर्लभ में भी दुर्लभतम कैसे

जल्लाद किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। अपने आचरण के पार, एक मौलिक अस्थिरता मौत की सजा को एक सामाजिक बुराई बनाती है। ‘दुर्लभ में भी दुर्लभतम’ का मामला लें। भारत की आपराधिक न्यायिक व्यवस्‍था में ‘दुर्लभ में भी दुर्लभतम’ मामलों की कोई तय परिभाषा नहीं है। इसे पूरी तरह जजों की अंतरात्मा और उनकी सामाजिक-राजनीतिक सोच पर छोड़ दिया है। इसके कारण यह जुए के घातक खेल की तरह बन गया है। वर्ष 1982 के हरबंश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले को देखें। इसमें तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी और सुप्रीम कोर्ट की तीन पीठों में इस फैसले के खिलाफ की गई अपील में नाटकीय रूप से तीन अलग-अलग फैसले सुनाए गए।

हम फैसलों में सटीकता की गारंटी नहीं सुनिश्चित कर सकते। कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 1973 से 1995 तक के 5760 मामलों के अध्ययन से खुलासा हुआ कि मौत की सजा के मामलों में गलती की दर 70 फीसदी थी। भारत में न्यायिक हिरासत का दुरुपयोग व्यापक है और गलत सजा सुनाया जाना असंभव नहीं है। मौत की सजा दे दिए जाने के बाद उसे पलटना संभव नहीं है और ऐसे में गलत सुनाने में हुई गलती को ठीक कर पाना संभव नहीं है।

तराजू का झुकाव

मौत की सजा का एक सामाजिक-आर्थिक पक्ष भी है। अमेरिका में मौत की सजा पाने वालों में 56 फीसदी या तो अश्वेत होते हैं या लातिन अमेरिकी। यूं तो राष्ट्रीय स्तर पर हत्या के पीड़ितों में नस्लीय अल्पसंख्यक करीब 50 फीसदी हैं मगर जिन्हें मौत की सजा दी जाती है उनके 77 फीसदी पीड़ित श्वेत समुदाय से होते हैं। इसी प्रकार भारत में मौत की सजा पाने वाले 75 फीसदी लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदाय से होते हैं और इनमें भी 94 फीसदी दलित और अल्पसंख्यक होते हैं। गरीबों पर न्याय का चाबुक लगातार पड़ता है। मौत की सजा खराब कानूनी प्रतिनिधित्व और पक्षपात का परिणाम होता है। फांसी का फंदा आज भी गरीबों का ही जाल है।

रोकथाम का लक्ष्य

फांसी पर चढ़ाए जाने वालों की संख्या इतनी कम है कि मौत की सजा के जरिये अपराध की रोकथाम का लक्ष्य विफल हो चुका है। शोध यह साबित करने में लगातार विफल रहे हैं कि मौत की सजा से अपराध पर रोक लगती है। वर्ष 2012 की नेशनल रिसर्च काउंसिल की स्टडी से पता चलता है कि 88 फीसदी अपराध विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मौत की सजा अपराध निवारक नहीं है। उदाहरण के लिए, भारत में बलात्कार के सिर्फ 27 फीसदी मामलों में आरोपी को सजा मिलती है। इसमें भी किसी को मौत की सजा मिले भी तो उसकी लंबी और थकाऊ प्रक्रिया किसी बलात्कारी को किसी प्रकार अपराध करने से रोक सकती है? जनवरी, 2014 में एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फांसी देने में अनावश्यक, असामान्य और असंगत देरी यातना के बराबर है।

अलबर्ट कैमस ने इसे इस रूप से में लिखा है, ‘सदियों से मौत की सजा, कई बार असभ्य सुधार के साथ, अपराध पर नियंत्रण का प्रयास करती रही है। फिर भी अपराध होते रहे। क्यों? क्योंकि इंसान को ज्ञानी बनाने वाली सोच हमेशा संतुलन की स्थिति में नहीं रहती है।’ ऐतिहासिक रूप से भी (उदाहरण के लिए ब्रिटेन और रोमन औपनिवेशिक काल में) मौत की सजा का भय दृढ़प्रतिज्ञ लोगों को हिंसा को अंजाम देने से नहीं रोक पाता था।

साम‌ाजिक नैतिकता

धम्म ने मौत की सजा के आस-पास कोई संशय नहीं रहने दिया। बौद्ध धर्म ने सबसे पहले यह सिद्धांत दिया कि एक व्यक्ति को प्राणी मात्र के प्रति अहिंसक होना चाहिए। हिंदु और जैन धर्मों ने कर्म में विश्वास के कारण इंसान, जानवर और यहां तक कि कीड़ों के प्रति भी अहिंसा को बढ़ावा दिया। करीब ढाई सौ साल पहले इटली के न्यायविद् सीजर बेकारिया ने यह सिद्धांत दिया कि देश द्वारा मौत की सजा के जरिये किसी की जिंदगी छीन लेना कहीं से भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। यह एक ऐसे नागरिक के खिलाफ पूरे राष्ट्र का युद्ध है जिसकी जिंदगी समाप्त कर देना राष्ट्र लोकहित में जरूरी मानता है।

हमारे सामाजिक ताने-बाने या सरकार में किसी को बार-बार सजा ‌देना दरअसल कमजोरी या ढिलाई की निशानी है। कोई भी व्यक्ति इतना बुरा नहीं होता कि वह किसी चीज के लिए अच्छे में न बदल जाए। यदि कोई व्यक्ति समाज को नुकसान पहुंचाए बिना जीवित करने दिया जा सकता है तो महज मिसाल कायम करने के लिए उसे मौत नहीं दी जानी चाहिए। आतंकवादी की निंदा कर उसे मौत देना एक आसान रास्ता है मगर इससे शहीद तैयार होते हैं। इसकी बजाय उन्हें लंबे समय तक जेल में बंद रखना आतंकवाद के प्रति आकर्षण को कम करेगा और उनमें आपसी संघर्ष को बढ़ाएगा।

इसे समाप्त करें

दुनिया में मौत की सजा को खत्म करने वाले देशों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब तक 140 देश इसे समाप्त कर चुके हैं। दिसंबर, 2014 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 117 देशों ने इसे समाप्त करने के पक्ष में मत दिया, 37 ने इसके खिलाफ जबकि 34 ने मतदान में भाग नहीं लिया। यहां तक कि अमेरिका भी इन 34 देशों में था। इसे समाप्त करना एक अपरिहार्य वैश्विक ट्रेंड है जो कि सभ्य देशों के दिमागी खुलेपन का परिचायक है।  की संख्या बढ़ती जा रही है। अब तक 140 यह एक वैश्विक उत्तरदायित्व भी है।

बेहतर विकल्प

फांसी की सजा के कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं। लंबी कारावास अवधि, जिसमें पेरोल से पहले गारंटीड न्यूनतम सजा का प्रावधान हो, पर विचार किया जा सकता है। यह लंबे समय से अमेरिका में इस्तेमाल में लाई जा रही है। दूसरा विकल्प सजा की अदला-बदली है। भारत में सत्र अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उच्च न्यायालय से उसे मंजूरी मिलनी जरूरी है। एक बार सजा कन्फर्म हो जाए तो दोषी उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और वहां से विफल होने पर राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के पास दया की अर्जी लगा सकता है। पिछले एक दशक में 1,367 मौत की सजाएं बरकरार रखी गईं जबकि 3751 की सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। अपराध की रोकथाम के लिए सजा की निश्चितता जरूरी है उसकी कठोरता नहीं। पूरी जिंदगी जेल में गुजराना और जमानत का मौका नहीं होना, निश्चित रूप से बेहतर सामाजिक राजनीतिक विकल्प है। इसे संविधान संशोधन या फिर समवर्ती सूची के इस्तेमाल के द्वारा हासिल किया जा सकता है। भारत ने मौत की सजा को समाप्त करने के लिए इंटरनेशनल कन्वेंशन ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (आईसीसीपीआर) पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत इसे कई चरणों में समाप्त करने के लिए वचनबद्ध है इसे ध्यान रखा जाना च‌ाहिए।

 

(लेखक भाजपा के पूर्व महासचिव और उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर क्षेत्र से लोकसभा सदस्य हैं। उनका यह आलेख अंग्रेजी आउटलुक के 10 अगस्त के अंक में प्रकाशित है और यहां उसका संक्षिप्त अनुवाद दिया गया है )