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युवा पार्टियों के लिए ऑक्सीजन हैं

भारत में आजादी के आंदोलन में छात्रों और नौजवानों की अहम भूमिका रही थी। शहीद भगत सिंह, जयप्रकाश नारायण (जेपी) और लोहिया तक उस युवा शक्ति के क्रांतिकारी पक्ष के प्रतीक हैं।
युवा पार्टियों के लिए ऑक्सीजन हैं

आजादी के बाद भारत के विश्वविद्यालयों में हुए छात्र आंदोलनों में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव चारों ओर दिखाई देता है। वर्ष 1960 के दशक के शुरुआत के साथ समाजवादी विचारधारा छात्र आंदोलन, खासकर उत्तर भारत में प्रभावी हो जाता है। समाजवादी योजन सभा का प्रभाव विभिन्न विश्वविद्यालों में प्रभावी नेतृत्व करता है। हमारे देश का आखिरी राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन जो जेपी के नेतृत्व में हुआ जिसे जेपी आंदोलन के रूप में जाना जाता है, वह भी बुनियादी तौर पर छात्रों और युवाओं का आंदोलन था। आजादी के बाद से आज तक देश की राजनीति में विभिन्न दलों और विभिन्न स्तरों पर केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तरों पर भी जो नेता हैं उनमें से 70 फीसदी छात्र और युवा आंदोलनों में ढलकर आए हैं। 

इसलिए भविष्य के प्रति भी वर्तमान आश्वस्त करता है। मेरा मानना है कि आगत ही अनागत की परिभाषा है। मुझे पूरा भरोसा है कि आज के छात्र और युवा आंदोलनों के नेता निश्चित तौर पर भविष्य के नेता हैं। नई तकनीक, नई शैली, सोशल मीडिया वाले वैज्ञानिक क्षमता से लैस ये युवा राजनीतिक पार्टियों के लिए ताजा ऑक्सीजन हैं। मेरा मानना है कि आज की राजनीति में सोशल मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए आने वाले दिनों में इन युवाओं की राजनीति में अहम भूमिका होने वाली है। सरकार को चाहिए कि वह सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों की समस्याएं सुने। उन समस्याओं का हल निकाले। अगर छात्रों की समस्याओं का हल नहीं किया गया तो इस मसले को बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।  सरकार और छात्रों में टकराव और बढ़ सकता है। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमूला की जहां तक बात है तो मैंने संसद में हुई बहस के दौरान भी कहा था कि मेरी नजर में रोहित की मौत संस्थागत हत्या है। एक केंद्रीय मंत्री लिखते हैं कि वह विश्वविद्यालय देश विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन चुका है। राष्ट्रीय एकता और भारत की संप्रभुता के लिए पूरी तरह सहमत होते हुए कहना चाहता हूं कि भय, नफरत और कहल के माहौल के कारण ही ऐसी समस्याएं शुरू होती हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की रैली मे क्या हुआ? दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष, जो एबीवीपी सदस्य हैं, ने कहा कि हम उस कैंपस में घुसकर धोखेबाजों को गोली मारेंगे। क्या यह नफरत फैलाने वाला बयान नहीं है? आज हम ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां अपराधी देशभक्ति सिखा रहे हैं और उनका सम्मान भी हो रहा है। जेएनयू के मसले पर मेरा कहना है कि मैंने अनेक वर्ष जेएनयू में गुजारे हैं। वहां छात्रसंघ का अध्यक्ष भी रहा। जेएनयू ने हमेशा से सांप्रदायिक और फासीवादी विचारधारा का विरोध किया है। सत्ता पक्ष के लोग नौ फरवरी की घटना को संस्थान की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

(लेखक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। आउटलुक की विशेष संवाददाता मनीषा भल्ला से बातचीत पर आधारित)

 

 

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