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बांग्लादेश: रिश्तों की नई चाल और चुनौतियां

ढाका से संदेश साफ कि भारत से पड़ोसी रिश्ते व्यापार, आवाजाही और इलाके की स्थिरता के लिए जरूरी, लेकिन खास...
बांग्लादेश: रिश्तों की नई चाल और चुनौतियां

ढाका से संदेश साफ कि भारत से पड़ोसी रिश्ते व्यापार, आवाजाही और इलाके की स्थिरता के लिए जरूरी, लेकिन खास अहमियत का दौर खत्म

आखिर 12 फरवरी के पार्लियामेंट्री चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जबरदस्त जीत से क्षेत्रीय राजनीति बदल गई। 299 सदस्यों वाली पार्लियामेंट में 212 सीटों के साथ तारिक रहमान की अगुआई वाली बीएनपी लगभग दो दशक के राजनैतिक वनवास के बाद धमाके के साथ सत्ता में लौट आई। शेख हसीना के नेतृत्व में पंद्रह साल राज करने वाली अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर बंदिश लगा दी गई। जमात-ए -इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन 77 सीटों के साथ विपक्ष में बैठेगा। हसीना के तख्तापलट करने वाले छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटीजन पार्टी 30 सीटों पर लड़कर सिर्फ छह ही जीत पाई। अब ढाका की नई सरकार भारत, चीन, पाकिस्तान और अमेरिका के साथ अपने रिश्ते को कैसे देखती है, इन सवालों के जवाब के लिए बीएनपी सूत्रों से मिल रहे संकेतों और कूटनीतिक इशारों को पढ़ना होगा।

भारत के लिए बीएनपी की भारी जीत रणनीतिक चुनौती जैसी है। पंद्रह साल तक, नई दिल्ली की पूर्वी पड़ोस नीति शेख हसीना के इर्द-गिर्द रही। हसीना ने सुरक्षा सहयोग, पूर्वोत्तर में आवाजाही सहज की और बागी गुटों को पनाह नहीं दी। बदले में भारत, बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाओं के लगातार खात्‍मे पर पूरा राजनैतिक समर्थन देता रहा और चुप्पी साधे रहा। अब ढाका की नई सत्ता का इशारा है कि रिश्ते नई हकीकतों के मद्देनजर नए सिरे से बनाने होंगे। पहला संकेत चुनावी नतीजों के 48 घंटे के अंदर आ गया। बीएनपी ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्‍यर्पण पर बात करने का ऐलान किया। हालांकि बीएनपी ने भारत के साथ दोस्ताना और सम्मानजनक रिश्ते बनाए रखने का वादा दोहराया।

यह सोचा-समझा कूटनीतिक कदम है, जिसका मकसद देश के लोगों को संदेश देना है कि जुलाई 2024 में हुई हत्याओं के लिए इंसाफ उनकी प्राथमिकता है, जिसमें 1,400 से ज्‍यादा प्रदर्शनकारी मारे गए थे। साथ ही, उसे नई दिल्ली के साथ बातचीत की गुंजाइश भी छोड़नी है। बीएनपी जानती है कि प्रत्‍यर्पण कानूनी तौर पर मुश्किल और राजनैतिक रूप से संवेदनशील मामला है। लेकिन औपचारिक मांग उठाकर, उसने जवाब देने की जिम्मेदारी भारत पर डाल दी। बीएनपी के एजेंडे में सबसे ऊपर भारत के सीमा सुरक्षा बल द्वारा ‘‘सीमा पर हत्याएं’’ रोकना और दिसंबर 2026 से पहले होने वाली गंगा जल संधि पर नए सिरे से बात करना है। बीएनपी सूत्रों ने इशारा किया कि ढाका इस संधि को ‘‘जायज’’ तरीके से पूरा करने की कोशिश करेगा, जो पिछली व्‍यवस्‍था से अलग होने का इशारा है, जिसे बांग्लादेश में कई लोग भारत की ओर झुका हुआ मानते हैं।

टकराव के इन मसलों के बावजूद ढाका से सीधी दुश्मनी मोल लेने का संकेत नहीं मिलता है। बीएनपी ने आतंकवाद विरोध, तीस्ता जल विवाद के हल और ‘‘बराबरी’’ तथा ‘‘परस्‍पर सम्मान’’ के सिद्धांतों पर आधारित हिंदू अल्‍पसंख्‍यकों की सुरक्षा पर लगातार सहयोग का वादा किया है। ढाका से संदेश साफ है कि भारत ऐसा पड़ोसी है जिससे बचा नहीं जा सकता, जो व्यापार, आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है। लेकिन परस्‍पर सम्मान का दौर खत्म हो गया है। नया रिश्ता लेन-देन तथा बराबरी के व्‍यावहारिक शर्तों पर होगा, न कि पिछली सरकार की तरह एकतरफा। प्रत्‍यर्पण की मांग, सौदेबाजी की बातचीत के शुरुआती संकेत के मायने समझे जा सकते हैं।

फिर, भारत मुश्किल पड़ोसी है, तो चीन रणनीतिक सुरक्षा देता है। बीजिंग के साथ बीएनपी का रिश्ता बहुत पुराना है, जो पार्टी की स्थापना से भी पहले का है। जियाउर रहमान ने बांग्लादेश की आजादी के फौरन बाद 1975 में चीन के साथ कूटनीतिक रिश्ते बनाए, और 1975 से 1980 के बीच, चीन ने बांग्लादेश को 78 प्रतिशत हथियार मुहैया कराए।

इस चुनाव से पहले उस ऐतिहासिक रिश्ते का ख्‍याल रखा गया है। 2025 में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बुलावे पर बीएनपी का बड़ा प्रतिनिधिमंडल बीजिंग गया, सीपीसी पोलित ब्यूरो के सदस्यों से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा हुई। जनवरी 2026 में चुनाव से कुछ हफ्ते पहले, चीनी राजदूत याओ वेन ने तारिक रहमान से ‘‘चीन-बांग्लादेश संबंधों और पार्टी से पार्टी के बीच सहयोग’’ पर चर्चा करने के लिए मुलाकात की। 2016 और 2022 के बीच, चीन ने बांग्लादेश में लगभग 26 अरब डॉलर का निवेश किया, जिसमें ज्‍यादातर बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के तहत था जिसमें मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना शामिल है। बीएनपी सरकार शायद चीनी निवेश बढ़ाने की ओर बढ़ेगी।

बीएनपी नेताओं ने चीन को भारत पर ज्‍यादा निर्भरता के खिलाफ बचाव के तौर पर देखा। तारिक रहमान का “बांग्लादेश फर्स्ट” की विदेश नीति किसी एक ताकत के साथ जुड़ने के बजाय विविध साझेदारी की ओर इशारा करती है। तारिक के शपथ समारोह में भारत को भी न्यौता मिला था और उस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ढाका गए थे। हालांकि बीएनपी सरकार चीन के साथ करीबी रक्षा संबंध बनाए रख सकती है और पाकिस्तान के साथ मेल-मिलाप भी। पाकिस्तान के हुक्‍मरानों ने बीएनपी को जीत पर फौरन बधाई दी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘‘बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की इच्छा जताईऔर दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास के साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सके।’’

यह कूटनीतिक गर्मजोशी रिश्‍ते सामान्‍य करने की तरफ ठोस कदम उठाने के बाद आई है। 2024 के विद्रोह के बाद से दोनों देशों ने समुद्री व्यापार फिर से शुरू कर दिया है और व्‍यापार बढ़ाया है। क्रिकेट को लेकर भारत के साथ बांग्लादेश के हालिया टकराव के दौरान जब बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने अपने टी20 वर्ल्ड कप मैच भारत में न कराने का अनुरोध किया और आइसीसी ने बांग्लादेश को टूर्नामेंट से हटा दिया, तो पाकिस्तान ने फौरन एकजुटता दिखाई। शुरू में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपने मैच का बॉयकॉट किया, फिर बांग्लादेश के कहने पर बॉयकॉट वापस ले लिया। ढाका के लिए पाकिस्तान की यह पहल कई संकेत देती है। यह बांग्‍लादेश की भारत के बरक्‍स रणनीतिक स्‍वायत्तता का इजहार करती है, नए आर्थिक मौके खोलती है और उन घरेलू वोटरों के साथ जुड़ती है, जो इस्लामी दुनिया से बेहतर संबंधों को अच्छा मानते हैं। लेकिन उसमें जोखिम भी हैं।

इन क्षेत्रीय बदलावों के बीच वॉशिंगटन ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बीएनपी और तारिक रहमान को उनकी जीत पर बधाई दी और कहा कि अमेरिका क्षेत्रीय खुशहाली और सुरक्षा को आगे बढ़ाने के लिए बांग्लादेश की नई निर्वाचित सरकार के साथ जुड़ने का इंतजार कर रहा है। यह सार्वजनिक गर्मजोशी महीनों के ठहराव के बाद आई है। चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिका ने बीएनपी ही नहीं, जमात-ए-इस्लामी पर भी दांव लगाया था। जाहिर है, अमेरिका नहीं चाहता कि बांग्लादेश चीन के पाले में जाए। बीजिंग के अरबों डॉलर के निवेश और बीएनपी के चीन के साथ पुराने रिश्तों के मद्देनजर वॉशिंगटन बंगाल की खाड़ी इलाके में अपने रणनीतिक हितों को बचाने के लिए मजबूत कूटनीतिक मौजूदगी को जरूरी मानता है। ढाका के लिए अमेरिका से रिश्ता रणनीतिक गहराई देता है, जिससे भारत और चीन दोनों के असर को संतुलित करने में मदद मिलती है। अब बांग्लादेश के साथ अमेरिका का करार भी हो गया, जिसमें वहां से कपास आयात करने पर टेक्सटाइल निर्यात पर शून्य टैरिफ लगेगा। अब तक बांग्लादेश कपास ज्यादातर भारत से ही लेता था।

हालांकि नई सरकार के लिए बड़ी चुनौतियां घरेलू हैं। 2024 में हसीना का तख्‍तापलट कराने वाले जेन जी प्रदर्शनकारी रोजगार संकट को लेकर सड़कों पर उतरे थे। लाखों युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे थे। बीएनपी के चुनावी घोषणा-पत्र में 2040 तक पचास लाख नई नौकरियां और दस खरब डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनाने का वादा है। लेकिन ढांचागत समस्याएं डरावनी हैं: धीमी विकास दर, विदेशी मुद्रा का दबाव, महंगाई, बेरोजगारी और निर्यात पर संकट है। निवेशकों का भरोसा वापस लाना, आइएमएफ शर्तों के लिए जरूरी सुधार और मुद्रा स्थिर करना नई सरकार की प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा लेगा।

बीएनपी के इस्लामी गुटों के साथ पुराने रिश्तों को सहेज कर धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों की सुरक्षा पक्की करना भी मुश्किल होगा। हिंदू अल्‍पसंख्‍यकों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में हल्‍की नाकामी का असर सीमा पार दिखेगा, जिससे भारत के साथ रिश्ते खराब होंगे। बकौल तारिक रहमान, विदेश नीति ‘‘बांग्लादेश फर्स्ट’’ की होगी। यानी कथित तौर पर न भारत विरोधी, न चीन समर्थक, न वॉशिंगटन या इस्लामाबाद के साथ जुड़ी हुई होगी। यह रणनीतिक स्‍वायत्तता, अलग-अलग साझेदारी, आपसी सम्मान और बराबरी की शर्तों पर चलने वाले रिश्तों का सिद्धांत है। अब देखना है, आने वाले महीनें क्या लाते हैं।

(लेखक ढाका स्थित पत्रकार हैं। विचार निजी हैं)

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