ट्रम्प की टैरिफ धौंस-पट्टी और दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को मुट्ठी में करने की चाहत से दुनिया सामुद्रिक काल-चक्र की तरह फिर पुराने दो-ध्रुवीय दौर में दाखिल होने की कगार पर, लिहाजा चीन के शंघाई में शी जिनपिंग, पुतिन और नरेंद्र मोदी की मुलाकात अहम
बात 1970 के दशक की मध्य की ओर बढ़ते वर्षों की है। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन की पहली (या किसी भी अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष की पहली) यात्रा के पहले माहौल तैयार करने उनके बेहद चर्चित तथा जाने-माने कूटनीतिक, विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर बीजिंग पहुंचे थे। दौरे के आखिर में वे चीन के सर्वोच्च नेता, चेयरमैन माओ त्से तुंग से मुलाकात करने गए। भेंट छोटी-सी थी। कहते हैं, ज्यादातर वक्त किसिंजर ही बोलते रहे। आखिर में माओ ने हाथ कटोरे जैसा बनाकर कोई मुहावरा बोला। दुभाषिए ने बताया, माओ कह रहे हैं कि अभी हम एक कटोरा भात खाना शुरू किए हैं, वह भी न छीन लेना। तब अमेरिकी अभियान सोवियत धुरी को तोड़ने का था। लेकिन अब शी जिनपिंग के दौर में उलटा होने जा रहा है, जो माओ से लगभग विपरीत धारा के हैं। अब शंघाई में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की 31 अगस्त की बैठक में एक ऐसी मोटी लकीर खिंचने जा रही है, जो दुनिया को फिर पुराने दौर जैसी दो ताकतवर धुरियों की ओर ले जा रही है। 27 अगस्त से ट्रम्प ने भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ दाग कर इसे जैसे पुख्ता कर दिया। इस दो धुरियों में एक ओर अमेरिका की अगुआई में पश्चिम या यूरोप तथा उसके व्यापक दायरे के देश और दूसरी ओर पूरब या यूरेशिया के साथ दक्षिण गोलार्द्घ के देश हो सकते हैं, जो ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और उनके साथ अन्य देश) की छतरी तले इकट्ठा हैं। फिलहाल इस दूसरी धुरी के लिए तीन शख्सियतों- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तिकड़ी विशाल चुंबकीय ताकत बन रही है, जिसमें ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा और दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामापोसा जैसे बड़ी शख्सियतें भी जुड़ने वाली है। इसे संभव किया है अमेरिका के नए हुक्मरान डोनाल्ड ट्रम्प ने, जिनकी खुद के इशारों पर दुनिया को नचाने की फितरत छलकती है।
पूरब चलोः मॉस्को में पुतिन के साथ डोभाल
दरअसल दौर बदलने का यह सिलसिला दुनिया में पहले भी चलता रहा है। इसके पहले वह दौर आधी सदी या कुछेक साल पहले का है, जब दुनिया करवट बदल रही थी। सोवियत सेनाएं अफगानिस्तान में घुस चुकी थीं और शायद दुनिया के दो ताकतवर धुरियों में एक ‘क्रेमलिन कल्ट’ के विशाल किले में दीवारें दरकनी शुरू हो चुकी थीं। उसे ढहने में बेशक एक दशक से कुछ ज्यादा जरूर (या ठीक-ठीक कहें तो 1987-89 में) लगे। उससे पीछे भी या याद करें तो इतने ही वक्त में, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, ये दो धुरियां कायम हुई थीं। उसके पीछे पहले विश्वयुद्ध के दौर में पहुंचे तो, दो धुरियां ऐसे ही आकार ले चुकी थीं, मित्र देश और धुरी राष्ट्रों (जर्मनी, इटली, जपान वगैरह) के रूप में। तो, क्या यूक्रेन युद्ध भी वैसा ही कोई मुकाम है, जिससे कथित एक ध्रुवीय दुनिया का स्मृति-लेख लिखने का सिलसिला शुरू होता है। यूक्रेन पर रूसी हमले की शुरुआत एक मायने में नाटो ताकतों के विस्तार की पहल से हुई थी, जिससे रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन खौवा उठे। और अब अमेरिका के मनमौजी किरदार डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ कूटनीति उसकी आखिरी दीवारें ढहा रही है।
जरा फिर पुराने दौर में लौटिए। सत्तर के उस दशक में किसिंजर और निक्सन भारत भी आए थे और तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दो-टूके जवाब से कुछ चिढ़ बैठे थे। यहां भी उलटा हुआ, लेकिन अलग तरह से। अमेरिका की ओर झुकाव अस्सी के दशक के मध्य से बढ़ने लगा। उसकी शुरुआत नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण और ग्लोबीकरण से हुई, और बढ़ते-बढ़ते नरेंद्र मोदी के राज में अमेरिका की ओर झुकाव पूरी तरह हो गया। लेकिन ठहरिए, दूसरे दौर में राष्ट्रपति ट्रम्प ने मांगें इंतहा बढ़ाईं तो फिर बाजी पलट गई।
दो धुरियों की मुद्रा
अब रूस-चीन-भारत की तिकड़ी फिर शक्ल ले रही है और सामुद्रिक काल-चक्र की तरह फिर दुनिया उसी पुरानी दो धुरियों की ओर लौट रही है, जो आधी सदी पहले अपने चरम पर थी। उसका आगाज 31 अगस्त से 1 सितंबर को शंघाई शिखर बैठक में हो सकता है। अगर शंघाई बैठक में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए ब्रिक्स में लूला की पहल जैसी डॉलर के मुकाबले नई मुद्रा या देशों की मुद्राओं के बीच आदान-प्रदान की व्यवस्था बन जाती है, तो यह नई विश्व व्यवस्था आकार लेने लग सकती है। इसी बुनियादी वजह से ट्रम्प ब्रिक्स को मरा हुआ बताते रहे हैं। इसके पहले भी नब्बे के दशक में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू. बुश के इराक के सद्दाम हुसैन से खफा होने की एक बड़ी वजह यह थी कि सद्दाम रूस के साथ व्यापार डॉलर के बदले आपसी मुद्राओं में करने का करार कर रहे थे और बाकी देशों को भी डॉलर के खिलाफ लाइन लेने को कह रहे थे। आखिरकार सद्दाम नेस्तनाबूद कर दिए गए और पश्चिम एशिया, खासकर अरब देशों में अमेरिका का दबदबा बढ़ गया। हालांकि ईरान उसकी दबिश में नहीं आया और कई उथल-पुथल चलते रहे, जो आज भी जारी हैं। आज भी ईरान पर दबिश की बड़ी वजह नई धुरी को बनने देने से रोकन ही है।
इसी तरह भारत पर भी रूस से तेल खरीदने के मामले में दंड स्वरूप 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ थोपने और सेकेंडरी प्रतिबंधों की धमकी की बड़ी वजह उसे ब्रिक्स और शंघाई शिखर बैठकों से हाथ खींचने पर मजबूर करके नई धुरी की ओर जाने से रोकने के लिए ही लगती है। ट्रम्प प्रशासन ने 27 अगस्त से अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। यानी अब से अमेरिका में भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगेगा। लेकिन शंघाई में अगर फैसला उससे प्रभावित नहीं होता है तो फिर ट्रम्प ही नहीं, यूरोपीय संघ का भी रुख कड़ा होने वाला है। हालांकि चीन और रूस भी वैकल्पिक बाजार तलाश रहे हैं और उनके झुकने की उम्मीद कम है। लूला भी खुलकर अमेरिका विरोध में खड़े दिखते हैं। दरअसल डॉलर में दुनिया का व्यापार कम होने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था ही नहीं, यूरोपीय देशों पर भी भारी असर पड़ेगा। दुनिया में उनका दबदबा घट जाएगा।
ट्रम्प-पुतिन वार्ता
ट्रम्प या ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देश इस खतरे को भांप रहे हैं। इसी वजह से ट्रम्प अलास्का में 15 अगस्त को पुतिन से मिले। वह बातचीत अभी नाकाम तो नहीं हुई, लेकिन फलीभूत होने की संभावना कम दिख रही है। वार्ता युद्ध विराम की घोषणा के बिना ही समाप्त हो गई। नजारा वाशिंगटन में स्थानांतरित हो गया, जहां ट्रम्प ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर जेलेंस्की और प्रमुख यूरोपीय नेताओं के साथ बातचीत की, ताकि शांति समझौते तक पहुंचने के लिए भविष्य की प्रगति की योजनाएं तैयार की जा सकें, जिसका भविष्य जेलेंस्की और यूरोपीय देशों के कड़े रुख को देखते हुए अनिश्चित है। बड़ी वजह यह भी यूरोपीय देशों का रुख रूस के खिलाफ या यूक्रेन के पक्ष में दिखता है। हाल में कनाडा ने यूक्रेन की करोड़ों डॉलर की मदद की। पुतिन बेमतलब नाक घुसेड़ने के लिए यूरोपीय नेताओं को धमका भी चुके हैं। हाल में उन्होंने कहा, "अमेरिका और यूरोप के देश यूक्रेन युद्घ को खींचे रखकर रूस की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना चाहते हैं।" जाहिर है, पुतिन चीन पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। चीन ही रूसी तेल और ऊर्जा का फिलहाल सबसे बड़ा खरीददार भी है, लेकिन ट्रम्प उस पर दंडात्मक टैरिफ लगाने की अभी तक हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं।
भारत का पूर्वी रुख
भारत ट्रम्प की धमकियों के मद्देनजर रूस और चीन की ओर ज्यादा झुका। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मॉस्को में पुतिन से मिले। पुतिन के इस साल के अंत में भारत आने की संभावना बढ़ गई है। इसके उलट क्वाड की बैठक के लिए ट्रम्प के दिल्ली आने की उम्मीद न के बराबर है। क्वाड हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का दबदबा घटाने के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत का संगठन है और अब लग रहा है कि भारत उस दायरे से निकल रहा है। इसका यही मतलब है कि भारत चीन और रूस के पाले में जाता जा रहा है। इसी महीने विदेश मंत्री एस. जयशंकर बीजिंग भी गए और चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आए तो दोनों देशों के 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवन घाटी में हुई झड़प के बाद तल्ख रिश्तों में नरमी दिखी। वांग यी ने कहा, “गलवन में वह झड़प नहीं होनी चाहिए थी। हमें जल्दी ही सीमा विवाद पर स्थाई हल की ओर बढ़ना चाहिए, लेकिन व्यापारिक रिश्ते या विश्व व्यवस्था में साझी भूमिका में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।"
ट्रम्प की खीझ
अमेरिका को, जाहिर है, ये बातें नहीं सुहाती हैं। हाल में ट्रम्प प्रशासन ने अपने बेहद करीबी दबंग सहयोगी सर्गेई गोर को भारत का राजदूत बनाया है और उन्हें ज्यादा ताकत देने के लिए दक्षिण एशिया का समन्वयकर्ता भी बनाया है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा, “गोर की नियुक्ति का मतलब है कि ट्रम्प भारत को और कसना चाहते हैं।"
ट्रम्प के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने धमकी दी है कि ट्रम्प और पुतिन के बीच अलास्का वार्ता नाकाम हो जाती है, तो भारत पर और भी ज्यादा टैरिफ जुर्माना लगाया जाएगा। वे यह भी चाहते हैं कि यूरोपीय संघ भारत पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय संघ पहले ही भारत की कंपनी न्यारा एनर्जी पर प्रतिबंध लगा चुका है, जिसमें रूस की रोसनेफ्ट की बड़ी हिस्सेदारी है। यही नहीं, सस्ते तेल की खरीद के लिए अंबानी की रिलायंस पर भी प्रतिबंध लग सकता है। यह समझ से परे लगता है कि यूक्रेन मुद्दे को सुलझाने में अमेरिका की नाकामी के लिए भारत को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है। मतलब वही है कि भारत को दूसरी धुरी की ओर बढ़ने देने से रोकना है।
भारत की दुविधा
हालांकि ट्रम्प की बात नहीं मानने से भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कॉरपोरेट घराने पहले ही सरकार को गंभीर परिणामों की चेतावनी दे रहे हैं। दरअसल इस दौरान कॉरपोरेट घरानों का रिश्ता अमेरिका और यूरोपीय देशों से कुछ ज्यादा हो गया है। यह बड़ी दुविधा है और सरकार के भीतर व्यावहारिक लोगों का मानना है कि भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करना होगा। यही नहीं, ट्रम्प को खुश करने के लिए भारत को अमेरिका से और तेल और रक्षा उपकरण खरीदने होंगे। लेकिन 50 प्रतिशत टैरिफ के बाद स्थितियां उलट गई हैं।
दिल्ली में चीन के वांग यी के साथ जयशंकर
यह सही है कि मोदी सरकार की विदेश नीति में अमेरिका झुकाव एक कमजोरी रही है। अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकियों की एक लंबी पृष्ठभूमि रही है। 1998 में भारत के पोकरण परमाणु परीक्षणों के कारण अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगा दिए थे। लेकिन 2001 में 9/11 के हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत वाशिंगटन का नया सहयोगी बन गया। भारत तब भी वाशिंगटन का मित्र बना रहा जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार 2004 के चुनावों में हार गई और उसके बाद मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार आई। उसने 2008 में अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु समझौता किया।
ट्रम्प के पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने अमेरिका और भारत के बीच तालमेल को और पुख्ता किया। उसके बाद बाइडन सरकार ने इस सौहार्द पर थोड़ा ब्रेक लगाया। वजह यह थी कि सितंबर 2019 में टेक्सास के ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में उन्होंने “अबकी बार, ट्रम्प सरकार” का नारा लगवाया था। लेकिन इस साल दूसरी बार ट्रम्प लौटे तो उनके आगे 'मेक अमेरिका ग्रेट एगेन' (मागा) का एजेंडा था और उनके मागा समर्थकों के लिए भारत का, खासकर कृषि और डेयरी उत्पादों का बाजार अहम था, लेकिन मोदी के लिए उसे खोलने पर घरेलू राजनीति में मुश्किलें थीं। सो, मामला गड़बड़ा गया।
शंघाई का एजेंडा
खैर, शंघाई में जुटी तिकड़ी को पारंपरिक आर्थिक मुद्दों के अलावा समग्र रणनीति में बदलाव की तलाश करनी होगी। उन्हें व्यापक डिजिटल आर्थिक व्यवस्था भी बनानी होगी, ताकि इस मामले में पश्चिमी देशों पर निर्भरता घटे। ऐसी विदेश नीति भी बनानी होगी, जो निवेश वाले अन्य देशों के साथ अपने संबंधों में आर्थिक पहलू पर जोर दे। कुछ रणनीतिक फेरबदल भी करना होगा। जैसे, वांग यी भारत के बाद फौरन पाकिस्तान गए और चीन ने पाकिस्तान को अत्याधुनिक पनडुब्बियों की सौगात भी दी। रूस भी पाकिस्तान को मदद मुहैया करा रहा है। इन तमाम मामलों में एक संतुलित रवैया भारत को भी अपनाना पड़ सकता है और पुराने रवैयों में तरमीम करना पड़ सकता जो आसान नहीं होगा।
बेरंग वार्ताः अलास्का में रूस के पुतिन और अमेरिका के ट्रम्प के साथ प्रतिनिधिमंडल
इसके अलावा, भारत के मौजूदा विश्व नजरिए में भी बदलाव की दरकार हो सकती है। मसलन, यह पूरब और दक्षिणी गोलार्द्घ की ओर रुख अमेरिका के साथ निकटता के पहले वाले रुख के विपरीत है। मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति ब्रिक्स देशों ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के फिलस्तीन के प्रति दिखाई गई एकजुटता के संदर्भ में अलग रही है। इसमें भारत का इज्राएल की पैरोकारी भी बदलनी पड़ सकती है। गाजा में चल रहे नरसंहार पर रुख भी बदलना पड़ सकता है। बहरहाल, इन तमाम दिक्कतों और बाधाओं के बावजूद अगर दुनिया में नई धुरी तैयार होती है तो नई विश्व व्यवस्था और नए टकरावों के दरवाजे भी खुल सकते हैं। तो, सबकी नजर अब शंघाई पर होगी।