क्या ट्रम्प की टैरिफ धमकियों के मद्देनजर भारत को उनकी हर जायज और नाजायज मांग मान लेनी चाहिए? क्या अमेरिका से व्यापारिक रिश्तों को बचाने के खातिर भारत रूस से अपनी दशकों पुरानी मित्रता की तिलांजलि दे दे? मोदी सरकार के लिए यह वाकई बड़ी कूटनीतिक चुनौती है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वेनेजुएला की राजधानी से वहां के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवा कर अपने देश ले आए। अब उनकी नजर डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर है। वे ईरान को भी चेतावनी दे रहे हैं। रूस और चीन से उनके संबध लंबे समय से बिगड़े हुए ही हैं। रूस और यूक्रेन के युद्ध की समाप्ति के आसार भी फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। क्या ऐसी घटनाओं से विश्व में लंबे समय बाद अस्थिरता के दौर की वापसी होने की आशंका है? इन परिस्थितियों में भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं, खासकर जब उसके रिश्ते अमेरिका से दिनोदिन बिगड़ रहे हैं?
सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका के सुपर पॉवर की हैसियत को चुनौती देने वाला कोई देश विश्व के मानचित्र पर नहीं बचा था। शीत युद्ध का लंबा दौर खत्म हो गया था और उसकी जगह बाजारवाद के युग की शुरुआत हो चुकी थी। भारत जैसा बड़ा बाजार उदारीकरण के दौर में विश्व व्यापार का प्रमुख केंद्र बना और धीरे-धीरे आम धारणा बन गई कि दुनिया का नया सुपर पॉवर वही बनेगा, जिसका अंतरराष्ट्रीय बाजार पर आधिपत्य हो। अधिकतर राष्ट्रों को यह भी समझ आ गया कि सरहदों पर युद्ध, दूसरे मुल्कों की संप्रभुता का अतिक्रमण और अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करके वर्चस्व बढाने के बजाय अपनी आर्थिक ताकत को बढ़ाकर ही सुपर पॉवर का तमगा हासिल करना बेहतर रणनीति है। इसलिए अधिकतर देश एक दूसरे के खिलाफ पूर्वाग्रहों को त्याग कर आपसी संबंधों को फिर से सामान्य करने में जुड़े। किसी समय पूंजीवाद का पर्याय समझे जाने वाला वैश्विक बाजार हर उस देश के लिए आर्थिक समृद्धि का खुला द्वार बन गया, जो उसकी शर्तों पर व्यापार करने को इच्छुक था।
उस दौर में भारत और अमेरिकी रिश्तों में अभूतपूर्व मजबूती आई। 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद की कड़वाहट को आपसी जरूरतों के कारण भुला दिया गया। आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में ऐसा उछाल आया, जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहा। यह संबंध इंटरनेट के प्रादुर्भाव के बाद परवान चढ़ा। बड़े पैमाने पर भारत के दक्ष युवा अमेरिका के डिजिटल क्रांति का हिस्सा बने और भारत और अमेरिका को एक-दूसरे का स्वाभाविक सहयोगी समझा जाना लगा। भारत-अमेरिका संबंध प्रगाढ़ होते गए और पिछले वर्ष की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रम्प के पुनः राष्ट्रपति बनाने के बाद यह माना गया कि दोनों देशों के रिश्ते नई ऊंचाइयों को छूएंगे। लेकिन साल का अंत होते-होते रिश्ते में ऐसी खटास आई, जिसका किसी को आभास न था। विडंबना यह कि संबंधों में दरार की जड़ में अन्य कारणों से अधिक बाजारवाद ही है।
भारत ने हाल के वर्षों में अपने पुराने सहयोगी रूस से सस्ते दर पर बड़े पैमाने पर तेल खरीदा। अमेरिका नहीं चाहता है कि भारत या कोई भी दूसरा देश रूस से तेल की तिजारत करे। उसका आरोप है कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से रूस को यूक्रेन के खिलाफ लंबे समय से चल रही लड़ाई में मदद मिल रही है। ट्रम्प ने सत्ता में वापसी करने के बाद लंबे-चौड़े वादे किए थे कि वह रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ बन कर युद्ध रुकवा देंगे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। जाहिर है, ट्रम्प उसके लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को जिम्मेदार मानते हैं और रूस से तेल का व्यापार करने के कारण भारत से खफा हैं। भारत की तरफ से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने के कारण अब ट्रम्प 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कर रहे हैं। ट्रम्प पहले ही भारत पर भारी टैरिफ लगा चुके हैं, जिसके कारण दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में काफी गिरावट दर्ज आई है। इससे भारत-अमेरिकी व्यापार को नुकसान हो ही सकता है।
लेकिन, क्या ट्रम्प की टैरिफ लगाने की धमकियों के मद्देनजर भारत को उनकी हर जायज और नाजायज मांग मान लेनी चाहिए? क्या अमेरिका से व्यापारिक रिश्तों को बचाने के खातिर भारत रूस से सभी व्यापारिक संबध खत्म करके अपनी दशकों पुरानी मित्रता की तिलांजलि दे दे? वह भी तब जब अमेरिका और कई अन्य पाश्चात्य देश रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं? अमेरिका से भारत की ट्रेड डील भी अधर में लटकी हुई है। मोदी सरकार के लिए यह निश्चित रूप से एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। अभी तक भारत अमेरिका के दवाब से झुका नहीं है और उसके रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि झुकेगा भी नहीं। ट्रम्प प्रशासन को लग रहा है कि बंदिशें लगाकर भारत का नुकसान कर सकता है, तो यह मौजूदा यथार्थ को नकारने वाली बात होगी। भारत की गिनती आज मजबूत अर्थव्यवस्था में होती है। उसके पास ऐसी चुनौतियों से जूझने के लिए ताकत और संसाधन हैं। भारत द्विपक्षीय संबंधों में टकराव का पक्षधर नहीं रहा है, लेकिन इसे उसकी कमजोरी नहीं समझी जानी चाहिए। दोनों देशों के लिए यही बेहतर है कि संबंधों को फिर से सामान्य किया जाए, वरना नुकसान एक ही पक्ष का नहीं होगा।