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रूस-यूक्रेन युद्ध: एक साल में कौन जीता-कौन हारा!

  “युद्ध और लंबा चला तो रूस की अर्थव्यवस्था चरमराने लगेगी, जबकि सभी नाटो देशों ने रक्षा बजट बढ़ाया...
रूस-यूक्रेन युद्ध: एक साल में कौन जीता-कौन हारा!

 

“युद्ध और लंबा चला तो रूस की अर्थव्यवस्था चरमराने लगेगी, जबकि सभी नाटो देशों ने रक्षा बजट बढ़ाया और प्रतिबंध कड़े किए”

एक साल से ज्यादा समय से रूस-यूक्रेन जंग जारी है। कहां तो उम्मीद की जा रही थी कि रूस युद्ध को 24-48 घंटे में निपटा देगा और अब इसका अंत ही दिखाई नहीं दे रहा है। भारत की अध्यक्षता में दुनिया भर की 20 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक पिछले दिनों नई दिल्ली में हुई लेकिन रूस और चीन में साझा बयान पर सहमति नहीं बनी, जिसका मूल कारण रूस-यूक्रेन युद्ध ही रहा। अब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटरेस इस युद्ध के दरमियान दूसरी बार यूक्रेन पहुंचे हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की से उनकी मुलाकात में ‘ब्लैक सी’ के जरिये फूड एक्सपोर्ट जारी रखने पर जोर दिया गया। युद्ध के दौरान सिर्फ राहत की बात यह रही है कि सात महीने पहले दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे कि ‘ब्लैक सी’ से गुजरने वाले किसी ऐसे जहाज पर दोनों देश हमला नहीं करेंगे, जिसमें खाद्य पदार्थ हों। लेकिन मामला सिर्फ इससे हल नहीं होने वाला।

दोनों तरफ के सैनिक दिन जंग जान गंवा रहे

खुदी ही खाई और सैनिक अब रोज का मंजर

हाल ही में फ्रांस ने यूक्रेन को और हथियार देने का फैसला किया है लेकिन इस बार उसे अपनी जनता का विरोध झेलना पड़ रहा है। पेरिस में हजारों लोग सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतर आए। लोगों का कहना था कि हथियार देने से जंग बढ़ती जाएगी। अगर सरकार मदद करना चाहती है तो उसे रूस को हमला करने से रोकना चाहिए। प्रदर्शन कर रहे लोगों के हाथों में बैनर थे, जिस पर लिखा था, ‘फॉर पीस (शांति के लिए), नो टु थर्ड वर्ल्ड वॉर।’ इसी तरह का मार्च जर्मनी के बर्लिन में भी निकाला गया। वहां, लोगों ने रूस से बातचीत कर मसले का हल निकालने की मांग की। ब्रिटेन में कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ब्रिटेन युद्ध रोकने में अपनी भूमिका निभाए। इतना तो तय है कि रूस और यूक्रेन दोनों देशों को इस युद्ध से भारी नुकसान हो रहा है लेकिन पीछे हटने को दोनों देशों में से कोई राजी नहीं। हां, बीच-बीच में ऐसे बयान जरूर आते हैं जिनसे लगता है कि शायद युद्ध अब रुक जाए लेकिन फिर कुछ ही समय में हमले शुरू हो जाता है। इस युद्ध में किसकी जीत होगी और किसकी हार, अब तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।

इस लड़ाई की वजह से पिछले एक साल में दुनिया बुरी तरह से बंट गई है। पश्चिमी देश खुलकर रूस की निंदा करते हैं, प्रतिबंध लगाते हैं और यूक्रेन के साथ खड़े दिखते हैं। लेकिन सारे व्यापारिक रिश्ते अभी तक खत्म नहीं कर पाए हैं। एशियाई देशों खासकर भारत और चीन ने बीच का रास्ता निकाला है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैमरे के सामने पुतिन के साथ मुलाकात के वक्त कहा कि आज के दौर में युद्ध कोई समाधान नहीं है लेकिन किसी भी अतंरराष्ट्रीय मंच पर रूस की निंदा करने से बचते रहे। रूस से कच्चे तेल के आयात पर विदेश मंत्री ने भी कहा कि हम पहले अपने देश के हित का ख्याल रखेंगे और अगर हमें रूस से सस्ता तेल मिल रहा है तो खरीदना जारी रखेंगे। नतीजा यह है कि युद्ध से पहले जहां भारत रूस से अपनी कुल जरूरत का महज 2 फीसदी कच्चा तेल आयात करता था वहीं आज रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

यूएन महासचिव ने बढ़ाया यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की ओर दोस्ती का हाथ

यूएन महासचिव ने बढ़ाया यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की ओर दोस्ती का हाथ

उधर, चीन नया चौधरी बनने के चक्कर में शांति पहल के नाम पर कूटनीतिक झांसा देने में लगा हुआ है। चीन ने कुछ दिन पहले अपने जाने-माने राजनयिक वांग यी को यूरोप दौरे पर भेजा और दौरे का समापन मॉस्को में हुआ, जहां राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वांग यी का गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके बाद चीन ने अपनी तरफ से दो दस्तावेज जारी किए। पहले दस्तावेज में युद्ध खत्म करने के उसके अपने फार्मूले का जिक्र है, वहीं दूसरे में ‘विश्व शांति’ की योजना है। उसमें लिखा है कि किसी भी देश (यूक्रेन) की संप्रभुता का सम्मान करना जरूरी है और हर देश (रूस) की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले की रक्षा भी होनी चाहिए। चीन ने इसमें एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध भी किया है। जाहिर है, इस फॉर्मूले पर पश्चिमी देश तैयार नहीं होंगे और चालाक चीन का यह मकसद भी नहीं दिखता। वह तो बस अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए और अपना वर्चस्व बढ़ाने के प्रयास में जुटा है।

सवाल यह है कि अब आगे क्या? एक तरफ तो अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन अचानक यूक्रेन पहुंच जाते हैं, यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की अचानक लंदन पहुंच जाते हैं लेकिन न तो यूरोपीय संघ, न ब्रिटेन और न ही अमेरिका समेत दूसरे नाटो देश खुलकर यूक्रेन को सैन्य मदद दे पाते हैं। हालांकि रूस समेत पूरी दुनिया को यह मालूम है कि हर तरह की मदद यूक्रेन को नाटो देशों से मिल रही है, सिर्फ सैनिक नहीं भेजे जा रहे हैं। फिर भी रूस को अभी तक पीछे धकेल पाना संभव नहीं हो पाया है।

रूस ने यूक्रेन के 1 लाख वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा लिया है। अभी तक पुख्ते तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता लेकिन अलग-अलग एजेंसियों की रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आंकड़ों पर गौर करें तो लगता है कि दोनों देशों को मिलाकर तकरीबन 2 लाख से ज्यादा लोगों की जानें गई हैं। यूक्रेन से पलायन पर नजर डालें तो साफ नजर आता है कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद पहली बार 1 करोड़ 86 लाख से ज्यादा लोग बेघर होकर देश छोड़ चुके हैं। यूक्रेन को अब तक 50 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। उधर, युद्ध के शुरुआती दिनों में ही यूरोपीय देशों ने रशियन सेंट्रल बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का 324 अरब डॉलर फ्रीज कर दिया था। तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए और अपनी जरूरत को दूसरे देशों से पूरा करने की कोशिश करते रहे। अब साल बीतते-बीतते वे इस नतीजे पर आ गए कि पूरे यूरोपीय संघ ने रूस से समंदर के रास्ते आने वाले तेल की खरीद को पूरी तरह खत्म कर दिया है। ब्रिटेन में भी प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के कुछ समय बाद ही ऋषि सुनक ने ऐलान कर दिया कि वे रूसी कच्चे तेल और उसके उत्पादों पर पांच दिसंबर को प्रतिबंध लगा रहे हैं और उन्होंने वैसा कर दिया। मतलब आने वाले दिनों में सही मायनों में रूस को आर्थिक प्रतिबंधों का असर दिखेगा।

यूक्रेन पर रूसी हमले के साल भर बीत जाने पर भी राहत का कहीं कोई संकेत नहीं

ऐसा माना जाता है कि जब क्रीमिया पर हमले के वक्त रूस पर प्रतिबंध लगाए गए थे, उसी वक्त से पुतिन अपने देश की अर्थव्यवस्था को भविष्य के युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे। 2014 से 2022 के बीच आठ साल में रूस ने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार जमा किया, पेट्रोलियम पदार्थों की खूब बिक्री की और उसका इस्तेमाल और अधिक पाइपलाइन बिछाने में किया। रूस ने यूरोपीय संघ के देशों में टेक्नोलॉजी, गैस स्टोरेज ढांचों और तेल शोधक कारखानों में भी खूब निवेश किया। तब कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं था, इसलिए जब कीमतें बढ़ीं और तेल की बिक्री जारी रही, रूस ने यूरोप को ईंधन बेच कर अरबों डॉलर कमाए। दरअसल उस वक्त क्रेमलिन ने यूरोप को गैस निर्यात में 80 फीसदी कटौती करके इसे भी हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। लेकिन अब यही हथियार पुतिन के लिए मुश्किलें खड़ीं कर रहा है। रूस को यूरोप से इतर अपने लिए बाजार तलाशने में भी मुश्किल हो रही है। लिहाजा, उसने तेल और गैस की कीमतें काफी कम कर दी हैं।

अगर अब युद्ध और लंबा चला तो रूस की अर्थव्यवस्था चरमराने लगेगी। बीच-बीच में पुतिन की सेहत को लेकर तरह-तरह की नकारात्मक खबरें सामने आती रहती हैं जो निश्चित तौर पर रूस की वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बिलकुल भी ठीक नहीं है। इस बीच एक और बात गौर करने की है कि यूक्रेन सीमा से लगे नाटो देश पोलैंड ने युद्ध की आशंकाओं के मद्देनजर अमेरिका से 40 हजार करोड़ रुपये के हथियार खरीदे हैं। एफ-35 प्लेन बेचने के लिए अमेरिका ने जर्मनी से समझौता किया है। अगर आंकड़ें देखें तो युद्ध के बाद सभी नाटो देशों ने अपने रक्षा बजट को बढ़ा दिया है। ऐसे में आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि इस युद्ध में दरअसल जीत कौन रहा है।

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