इज्राएल-अमेरिकी हमले और ईरान के जवाबी आक्रमण से समूचे पश्चिम एशिया में हाहाकार, कच्चे तेल और गैस के संकट से सारी दुनिया चपेट में, ईरान में नए सर्वोच्च नेता के ऐलान पर चीन-रूस के खुलकर समर्थन से नए मोर्चे खुले
दसवें दिन जंग का मैदान पश्चिम एशिया से उठकर समूची दुनिया बनती दिखी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की धमकियों के बावजूद ईरान ने नए सर्वोच्च मजहबी नेता का ऐलान कर अपने इरादे और कड़े करने का संकेत दिया। अब तक कूटनयिक पहल का संकेत दे रहे रूस और चीन ने खुलकर साथ देने का ऐलान किया। कतर, कुवैत, सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर ताजा हमलों के बाद खाड़ी देशों के कच्चे तेल के उत्पादन में भारी कटौती के ऐलान से दुनिया भर के शेयर बाजारों की गर्त की ओर गति तेज हुई। शायद इसी वजह से उसके पहले तेहरान के तेल संयंत्र पर हमले की वजह से ट्रम्प का पारा नेतन्याहू पर चढ़ा। ईरान के हमले की 29वीं लहर से इज्राएल में तबाही के मंजर भारी हुए। अमेरिका में सैनिकों की लाशें पहुंचने का सिलसिला बढ़ने लगा। ऐसे में, पेंटागन से 9 मार्च को अमेरिकी कमांडर की ‘डीटोर’ यानी ठहराव की अपील को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अगार्ची ने सीएनएन से बातचीत में ठुकरा दी। हालांकि 10 मार्च को रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की ट्रम्प की बातचीत हुई और कोई क्रेमलिन प्रपोजल सुर्खियों में है। उसके बाद ट्रम्प ने कहा कि ईरान जंग “काफी जल्दी” खत्म होगी, हालांकि “पर्याप्त जीत” नहीं मिली है। उनके इस बयान से बाजारों की धड़कनें कुछ स्थिर हुईं।
यह नजारा बताता है कि खुद को दांव (पढ़ें डील) लगाने में उस्ताद बताने वाले ट्रम्प के लिए पश्चिम एशिया की जंग सबसे बड़ा भू-राजनैतिक जुआ साबित हो सकती है। अब ये सवाल भी मुखर हो रहे हैं कि क्या अमेरिका की एकछत्र महाशक्ति का रुतबा भी यह जंग तय करने वाली है? क्या असली लड़ाई अमेरिका और चीन-रूस के गठजोड़ के अपने-अपने दबदबे साबित करने और उसके विस्तार की है, जिसका मैदान ईरान और पश्चिम एशिया बन गया है? क्या पश्चिम एशिया का झुकाव द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था से पहली बार अलग होने जा रहा है? क्या खाड़ी देशों में अमेरिका के बजाए चीन और रूस की पैठ बढ़ने वाली है? क्या ‘ग्रेटर इज्राएल’ का सपना संजोए नेतन्याहू के बदले ईरान का दबदबा बढ़ सकता है?

मातमः अली खामेनेई के जनाजे पर मातम मनाते लोग, 5 मार्च
शायद इसकी उलट संभावना यानी इज्राएली-अमेरिकी दबदबे को पुख्ता करने के अघोषित मकसद से ही 28 फरवरी को अमेरिका और इज्राएल ने ईरान में संयुक्त सैन्य हमले की शुरुआत की थी। ईरान के लगभग समूचे शीर्ष नेतृत्व के सफाए के लिए ‘डीकैपिटेशन’ मुहिम को अंजाम देकर सोचा था कि वहां भी ‘वेनेजुएला’ की तरह एक झटके में सब कुछ अपने कब्जे में आ जाएगा। तेहरान में उस हमले में लंबे समय से सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेताओं की मौत हो गई। इन हमलों का घोषित मकसद तो ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को कमजोर करना और शायद सत्ता परिवर्तन करना था। लेकिन लक्ष्य ईरान के साथ-साथ पूरे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन को बदलना था। लेकिन ईरान ने जवाबी कार्रवाई की। उसने इज्राएल, खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ऊर्जा ढांचे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। उद्देश्य संघर्ष के दायरे को समूचे पश्चिम एशियाई देशों तक फैलाना और ऊर्जा संकट के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डालना था, ताकि अमेरिका की दादागीरी पर सवाल गहरे हों।
हालात तब और बिगड़ गए जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया या सिर्फ चीन की जहाजों की आवाजाही ही होने दी। कुछ कार्गो जहाजों को निशाना भी बनाया गया। ट्रम्प ने धमकी दी और कहा कि अमेरिकी नौसैनिक पोत सभी तेल वाहक पोतों को सुरक्षा प्रदान करेंगे। लेकिन जंग के दसवें दिन तक ऐसा नहीं हो सका। दरअसल इसी जलमार्ग से दुनिया में कुल तेल-गैस आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इससे वैश्विक व्यापार मार्ग, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बुरी तरह फंस गई, जिसके नतीजे फौरन दुनिया भर में दिखने लगे।
भारत के लिए भी यह खास चिंता का विषय है। देश अपनी तकरीबन दो-तिहाई ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है। इसका फौरी असर यह हुआ कि घरेलू एलपीजी की कीमतें 60 रुपये और व्यावसायिक एलपीजी की कीमतें 130 रुपये बढ़ा दी गईं। कच्चे तेल की कीमतों में भी लगभग दोगुने की वृद्धि दिख रही है, 28 फरवरी को कीमतें 60-65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो 10 मार्च को 100-119 डॉलर तक पहुंच गईं। फिलहाल सरकार की ओर से पेट्रोल-डीजल के दाम में इजाफे का कोई संकेत नहीं है, जो पहले ही कच्चे तेल की कीमतें आधी होने पर भी नहीं घटाई गई थीं। इसके अलावा खाड़ी में काम कर रहे एक करोड़ से ज्यादा भारतीयों से आने वाली रकम भारत को मिलने वाले कुल 135 अरब डॉलर (12.5 लाख करोड़ रु.) में करीब 38 फीसदी है। यानी हमारी अर्थव्यवस्था पर भारी मार पड़ सकती है। महंगाई बेतहाशा बढ़ सकती है और लोगों के लौटने से केरल जैसे कई राज्यों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह गड़बड़ा सकती है। उनमें कुछ लोग वापस आए हैं और 9 मार्च को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच संसद के दोनों सदनों में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान के मुताबिक, हमारे दूतावास उन्हें हर संभव मदद प्रदान कर रहे हैं।
जंग में जानमाल की कीमत भी लगातार बढ़ रही है। अब तक ईरान 1,300 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। सबसे दर्दनाक मीनाब में प्राथमिक स्कूल की 165 बच्चियों और स्कूली स्टाफ की मौत है। तेहरान में गांधी अस्पताल पर हमले की दुनिया भर में निंदा शुरू हुई तो अमेरिका-इज्राएल ने कहा कि ईरान ने खुद बम गिराए हैं, लेकिन अब वहां अमेरिकी पैट्रियाट मिसाइल के निशान मिले हैं। इज्राएल ने 11 लोगों की मौत और अमेरिका ने सात फौजियों की मौत कबूली है। इज्राएल ने खबरों और वीडियो वगैरह पर सख्त पाबंदी लगा दी है, जिससे पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पा रही है।

तबाहीः सऊदी अरब के रासतनुरा रिफाइनरी पर ड्रोन हमले की सैटेलाइट तस्वीर, 2 मार्च
भारत भी जंग की चपेट में आया। होर्मुज जलडमरूमध्य में मिसाइल जहाजों पर आ गिरी तो दो निजी टैंकरों पर सवार तीन भारतीय क्रू सदस्य मारे गए। 4 मार्च को एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आइआरएस दीना को टॉरपीडो से निशाना बनाया, जबकि वह जंग के क्षेत्र से काफी दूर था और हमला अंतरराष्ट्रीय नियमों का सरासर उल्लंघन था। जहाज के 87 क्रू सदस्य मारे गए। श्रीलंका नौसेना 34 को बचाने में कामयाब रही और बाकी लाशें भी निकालीं। यह जंगी जहाज हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारतीय नौसेना के निमंत्रण पर बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेकर लौट रहा था। भारत में विपक्ष ने सवाल उठाए तो सरकार ने तीन ईरानी जहाजों को शरण देने की बात बताई।
आधुनिक इतिहास में पश्चिम एशिया में शायद ही कोई जंग इतनी अनिश्चितताओं के साथ हुई। अमेरिका और इज्राएल उसके मकसद भी बदलते रह रहे हैं। अमेरिका में भी सवाल उठ रहे हैं और डेमोक्रेट ही नहीं, रिपब्लिकन सिनेटर भी पूछ रहे हैं कि जंग का मकसद क्या है। ऐसे में सबसे बड़े सवाल यही है कि यह जंग कितनी विनाशकारी होगी, अमेरिका और इज्राएल ने हमला क्यों किया और यह कितने दिन तक चलेगा?
नेतन्याहू की बाजी
लगता नहीं है कि इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके डिजाइन पर (जैसा कि अमेरिका में इसे ‘इज्राएल जंग’ कहा जा रहा है) ट्रम्प का ईरान पर हमला करने का फैसला किसी एक वजह से हुआ है। वजहें दोनों ही नेताओं के घरेलू राजनैतिक संकट, खासकर मोसाद और सीआइए के खुफिया संकेत और बदलती रणनीतिक गणनाएं हो सकती हैं। नेतन्याहू अपने खिलाफ देश में भ्रष्टाचार के मुकदमों में बुरी तरह फंसे हुए हैं और दुनिया खासकर पश्चिमी देशों में गजा के कत्लेआम के लिए युद्ध अपराधी घेषित होने से उनका प्रवेश वर्जित हैं। इज्राएल को बाहर से मिलने वाले फंड में भी कटौती होने लगी है। यहां तक कि अमेरिका में भी सवाल उठने लगे हैं। उधर, ट्रम्प भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से अपनी टैरिफ कूटनीति पर झटके से बुरी तरह बिफरे हुए हैं। फिर यूरोपीय और पश्चिम देशों का विरोध भी बढ़ता जा रहा है। इससे नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस और सीनेट में रिपब्लिकन सांसदों की संख्या घटने का अंदेशा हो गया है। ऐसे मौके पर खुफिया जानकारियां यह थीं कि ईरान के खामेनेई इश्फहान में अपनी जगह पर मौजूद हैं। कथित तौर पर उन्होंने सुरक्षित ठिकाने में जाने से मना कर दिया था।
हालांकि पृष्ठभूमि आठ महीने पहले ही बन चुकी थी। जून 2025 में इज्राएल ने ईरान पर बड़ा हमला किया था। उसका दावा था कि तेहरान परमाणु हथियार बनाने से सिर्फ कुछ महीने दूर है। उसके बाद दोनों देशों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला चला। उसी बीच अमेरिका ने ऑपरेशन ‘मिडनाइट हैमर’ के तहत ईरान के तीन अहम परमाणु संयंत्रों पर बंकर-बर्स्ट बम गिराए। ट्रम्प ने दावा किया कि इन हमलों से ईरान की एटमी क्षमता ‘पूरी तरह खत्म’ हो गई है। जवाब में ईरान ने कतर में अमेरिका के अल उदीद हवाई अड्डे पर मिसाइलें दागीं। फिर ट्रम्प ने कहा कि मकसद हासिल हो गया और दोनों पक्षों पर दबाव डालकर 12 दिन बाद युद्धविराम का ऐलान कर दिया।
ईरान ने इस विराम का इस्तेमाल अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने में किया। उसने अपनी मिसाइल प्रणालियों और बैटरियों को फिर से तैयार किया और रिपोर्टों के मुताबिक चीन की मदद से अपने राडार नेटवर्क को भी अपग्रेड किया। खबर है कि चीन से कई बड़े कार्गो विमान सैन्य साजो-सामान लेकर उतरे और ईरानी जीपीएस की जगह चीन के वोदु 3 सिस्टम पर शिफ्ट हो गए। रूस से भी उसे मदद मिली।

बर्बादीः इज्राएल के बेट शेमेश में ईरानी हमले में मारे गए एक व्यक्ति का शव ले जाते राहतकर्मी
हालांकि इसकी कीमत भी उसे चुकानी पड़ी। पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में चल रही ईरानी अर्थव्यवस्था इस छोटे युद्ध के बाद लगभग चरमरा गई। अक्टूबर तक यूरोपीय वोट से संयुक्त राष्ट्र की बंदिशें भी आफत की तरह टूटीं। महंगाई औसतन 40 फीसदी तक पहुंच गई। ईरानी मुद्रा रियाल एक डॉलर के मुकाबले 5 लाख रियाल से तीन गुना गिरकर करीब 16 लाख रियाल तक पहुंच गई। ईंधन, ब्रेड तथा बिजली महंगी हो गई। उसके बाद ईरान में अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए। दबाने के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने भारी दमन शुरू किया। करीब 7,000 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। ईरान अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर कमजोर दिखाई देने लगा। इज्राएल ने इसे दोबारा हमला करने का सही वक्त समझा। इज्राएल को लगता रहा कि ईरान का बढ़ता मिसाइल भंडार ऐसे स्तर पर पहुंच रहा है, जहां उसे रोकना मुश्किल और महंगा हो जाएगा। जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद इज्राएल को लगा कि यही सही समय है जिसे वहां ‘सांप का सिर काटने या डिकैपिटेशन’ की मुहिम कहा गया। इसी रणनीति के तहत नेतन्याहू ने शायद ट्रम्प को साझा हमले के लिए तैयार किया। लेकिन इसमें ट्रम्प और नेतन्याहू से नाराज खासकर यूरोपीय देशों से समर्थन मिलने की गुंजाइश कम थी। कुछ विश्लेषकों और खासकर विपक्ष का भी आरोप है कि इसी वजह से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इज्राएल दौरे पर बुलाया गया और उनके लौटने के एक दिन बाद ही हमला शुरू हो गया। यह शंका इसलिए भी बढ़ी कि खामेनेई की मृत्यु पर कोई बयान नहीं आया। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के 4 मार्च के लेख में आलोचना के बाद विदेश सचिव विक्रम मिसरी जरूर ईरानी दुुतावास जाकर शोक पेजिका में दस्तखत किए।
ट्रम्प का दांव
विडंबना देखिए कि ट्रम्प ने ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ तब शुरू किया जब ओमान की मध्यस्थता में ईरान से परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर जेनेवा में बातचीत हो रही थी। बातचीत सकारात्मक दिशा में जाती दिख रही थी। ईरान मिसाइल क्षमता सीमित करने और समृद्ध यूरेनियम के भंडार को घटाने का संकेत दे रहा था। ओमान के विदेश मंत्री ने तब भी और बाद में भी इसकी तस्दीक की। लेकिन अमेरिका ने अचानक बातचीत तोड़ दी। ट्रम्प ने कहा, ‘‘हमारा पाला सनकी लोगों से था और मुझे लगा कि वे पहले हमला कर सकते थे।’’
हकीकत तो यह है कि जंग के लिए ट्रम्प के उद्देश्य भी तेजी से बदलते गए। शुरुआत में हमलों को एहतियाती कार्रवाई बताया गया, जिसका मकसद ईरान की मिसाइल क्षमता को नष्ट करना था। लेकिन फिर कहा गया कि वहां सत्ता परिवर्तन लक्ष्य है। एक टीवी संबोधन में ट्रम्प ने जंग को मानवाधिकार मिशन बताया और कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को उसके ‘‘हत्यारे शासकों’’ से मुक्त कराना है। उन्होंने ईरान की जनता से खुलकर अपील की, ‘‘उठ खड़े हों और अपनी सरकार अपने हाथ में लें... यह आपकी होगी।’’
लेकिन ईरान ने जब उम्मीद के उलट ज्यादा मजबूती दिखाई और सरकार के गिरने के कोई संकेत नहीं मिले, तो ट्रम्प प्रशासन ने फिर अपना रुख बदला। उसके बाद व्हाइट हाउस की प्रेस टीम ने चार मुख्य उद्देश्य बताए। पहला, ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को नष्ट करना। दूसरा, भविष्य में उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम को रोकना। तीसरा, पूरे क्षेत्र में असर की उसकी क्षमता को कमजोर करना। और चौथा, ईरान की जनता को ताकत देना ताकि वह मजहबी राज उखाड़ फेंके। इधर, ट्रम्प ने ईरान को हिदायत दी कि वह उनसे पूछे बिना सर्वोच्च नेता का चुनाव न करे, तो जवाब में ईरान की 88 आलिमों की मजलिस-ए-खुब्रकान यानी विशेषज्ञ परिषद ने खामेनेई के दूसरे बेटे मोजत्बा को सर्वोच्च नेता चुन लिया और उसके बाद इज्राएल पर हमले तेज कर दिए।
ईरान का तंत्र
अमेरिका और इज्राएल को उम्मीद थी कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने से उसकी मजहबी सत्ता तेजी से ढह जाएगी, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ईरान न तो वेनेजुएला है और न ही गजा जैसा छोटा और कमजोर इलाका जिसे आसानी से कुचला जा सके। यह 9.2 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला बड़ा देश है। क्षेत्रफल में भी ईरान दुनिया में 17वां बड़ा देश है, जिसके चारों ओर ऊंची पर्वत शृंखलाएं और विशाल रेगिस्तान हैं, जो ऐतिहासिक रूप से बाहरी आक्रमणकारियों के लिए बड़ी बाधा रहे हैं।
ईरान की लगभग 90 फीसद आबादी शिया मुसलमानों की है। वहां मजहबी संस्कृति में शहादत की अवधारणा बेहद गहरे भावनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व रखती है। मारे गए सर्वोच्च नेता खामेनेई के आलोचक जरूर रहे होंगे, और उनके कुछ सहयोगी उनके जिद्दी स्वभाव से परेशान भी रहे होंगे, लेकिन मौत के बाद उन्हें शहीद के रूप में देखा जा रहा है और उन्हें इमाम या आध्यात्मिक अगुआ के रूप में देख रहे हैं, इस कदर कि उन्हें इमाम हुसैन जैसा दर्जा दिया जा रहा है। ईरान में ट्रम्प और उनके साथियों को हिकारत से ‘एपस्टीन गैंग’ और पापी शैतानी टोली कहा जा रहा है।
खामेनेई ने शायद अपनी हत्या की आशंका पहले ही भांप ली थी इसलिए उन्होंने सिर्फ अपने पद के लिए ही नहीं, बल्कि मजहबी नेतृत्व, फौज और आइआरजीसी के अहम पदों के लिए भी कई स्तर की उत्तराधिकार व्यवस्था तैयार कर रखी थी। उनकी मौत के फौरन बाद ईरान ने अपने संविधान के अनुच्छेद 111 को लागू किया और एक तीन सदस्यीय अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई। इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, प्रधान न्यायपालिका प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी-एजेई और आलमी परिषद के सदस्य तथा ईरान के मदरसों के प्रमुख आयतुल्ला अलीरेजा अराफी हैं। असल में अमेरिका यह नहीं भांप पाया कि 47 साल पुरानी व्यवस्था समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। आज सत्ता में बैठे कई लोग उसी विचारधारा में पले-बढ़े हैं। यह जरूर है कि अलग-अलग गुटों में टकराव होगा लेकिन शासन को बचाए रखने और उसके ढांचे को टूटने से रोकने के सवाल पर वे पूरी तरह एकजुट हैं। अब मोजत्बा सर्वोच्च नेता चुन लिए गए हैं और वे अपने वालिद से कुछ ज्यादा ही कट्टर बताए जाते हैं।
ईरान की रणनीति में दोहरे लक्ष्य जुड़े लगते हैं। एक, अमेरिका के क्षेत्रीय साझीदारों पर दबाव डालना, या उनके बंदरगाहों, ऊर्जा संयंत्रों, हवाई अड्डे और जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला करना या उन्हें चेतावनी देना, ताकि वे ट्रम्प पर लड़ाई खत्म करने का दबाव बनाएं। दूसरे, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए दबाव बढ़ाकर जंग को अंतरराष्ट्रीय रूप दे देना। इन लक्ष्यों में दसवें दिन तक ईरान कुछ हद तक कामयाब दिख रहा है।
लेकिन कहा जाता है कि अमेरिका अजेरी और कुर्द गुटों को शह दे रहा है, ताकि वे कुछ सक्रियता बढाएं तो उनके बहाने जमीन पर अमेरिकी-इज्राएली फौज उतारा जा सके। ईरान की आबादी में अजेरी समुदाय 15 फीसद और कुर्द 10 फीसद हैं। ये समुदाय इराक और तुर्की में, खासकर सीमाई इलाके में भी हैं। वहां के गुटों को भी शह दी जा रही है। लेकिन अमेरिका में जमीन पर फौज उतारने का विरोध भी काफी हो रहा है। उधर, ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि हम तो इंतजार कर रहे हैं, उन्हें ऐसी शिकस्त मिलेगी, जो याद रखेंगे।
यह सब ट्रम्प के अजीब यू-टर्न जैसा लग रहा है, जो “कभी खत्म न होने वाली लड़ाइयों” को खत्म करने, भविष्य में किसी जंग में अमेरिका के शिरकत न करने और सैनिकों को खतरे से दूर रखने का वादा करके सत्ता में आए थे। ईरान की फौज में 20 लाख जवान हैं। इसलिए जमीनी लड़ाई आसान नहीं होगी।
खाड़ी का स्वरूप क्या बदलेगा
नतीजा चाहे जो भी हो, इस जंग से एक नया पश्चिम एशिया उभर रहा है। ऐसा लगता नहीं है कि खाड़ी के देश इज्राएल के करीब जाएंगे। ट्रम्प के पहले कार्यकाल में कई खाड़ी देशों ने अब्राहम समझौते पर दस्तखत किए थे, जिसका मुख्य मकसद अमन-चैन स्थापित करके आर्थिक फायदा उठाना था। लेकिन, यूएई और बहरीन को छोड़कर, इस क्षेत्र में ज्यादातर इज्राएल को दबंग और सुरक्षा के लिए चिंता का विषय मानते हैं।
अगर खाड़ी देशों में अमेरिका के अड्डे कमजोर पड़ते हैं, तो जवाबी ताकत के तौर पर इस क्षेत्र के देश बड़ा गठबंधन बना सकते हैं। तब पश्चिम एशिया में साझेदारियों और गठबंधनों में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। हालांकि, फिलहाल किसी के लिए भी जंग के दीर्घकालिक भू-राजनैतिक नतीजों का अंदाजा लगाना मुश्किल और खतरनाक है। यह भी कहना मुश्किल है कि जंग कितने दिन चलेगी।