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पश्चिम एशिया जंग/अजूबे दावेः दैवीय दावों का हवाला

पश्चिम एशिया कल्पित दावों के सहारे झंझावात में फंसी, सवाल है कि क्या जंग इस इलाके को नया आकार देगी, या...
पश्चिम एशिया जंग/अजूबे दावेः दैवीय दावों का हवाला

पश्चिम एशिया कल्पित दावों के सहारे झंझावात में फंसी, सवाल है कि क्या जंग इस इलाके को नया आकार देगी, या क्या कोई स्थायी हल की ओर ले जाएगी

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्‍प और इज्राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू के ईरान पर ताजा हमले के समर्थन में यूरोपीय देश नहीं दिखे तो वॉशिंगटन में उन्‍हें ईरान विजय के लिए पादरियों के आशीर्वाद और प्रार्थना की जरूरत देख बहुत लोग चौंक सकते हैं। गौर करें कि अंतरराष्‍ट्रीय नियम-कायदों के उलट पुराने मजहबी किस्सों और आख्‍यानों के कथित दैवीय आदेश के दावे के जरिए ही जंग को सही ठहराने की दलील गढ़ी गई है। ईरान के खिलाफ यूरेनियम संवर्धन से लेकर आतंकवाद के अफसाने तो महज आज के फलसफे के बहाने भर हैं।

गौरतलब है कि इज्राएली और कुछ अमेरिकी इवेंजेलिकल हलकों में बाइबिल की भविष्यवाणी के आधार पर मौजूदा भूगोल को आकार देने का जुनून हावी होता दिख रहा है। फरवरी 2023 में इज्राएली वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच एक नक्‍शे के सामने खड़े हुए, जो “ग्रेटर इज्राएल” का बताया गया। उस नक्‍शे में समूचा फलस्तीन, सऊदी अरब का एक-तिहाई हिस्सा, जॉर्डन, लेबनान के कुछ हिस्से, सीरिया, इराक शामिल हैं। उन्होंने कहा, “फलस्तीन जैसी कोई जमीन नहीं है क्योंकि फलस्तीनी लोगों जैसा कुछ है ही नहीं।” नक्‍शे में कोई आधुनिक देश या इलाके नहीं, बल्कि बाइबिल में वादा किए गए इलाके दिखाए गए हैं।

यह नजरिया अमेरिकी इवेंजेलिकल ईसाइयों के बीच भी जुनून बन रहा है। अपने इवेंजेलिकल सलाहकारों के साथ बैठक के कुछ दिनों बाद राष्ट्रपति ट्रम्‍प ने दिसंबर 2024 में ऐलान किया कि ईरानी विरोध प्रदर्शनों की मदद के लिए अमेरिका “आगे बढ़ने को तैयार है।”

पूर्व विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ से 2019 में जब पूछा गया कि क्या ट्रम्‍प को प्रभु ने इज्राएल की रक्षा के लिए भेजा है, तो पॉम्पिओ का जवाब था, “ईसाई होने के नाते मुझे पक्का यकीन है कि यह मुमकिन है।”

इज्राएल के जून 2025 में ईरान के खिलाफ “ऑपरेशन राइजिंग लायन” में भी मजहबी अफसाने का पुट दिखा। उस वक्‍त 200 जेट और मोसाद की विध्‍वंसक टीमें शामिल थीं और 100 से ज्यादा ईरानी जगहों को निशाना बनाया, जिसमें एटमी सुविधाएं भी शामिल थीं। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ऑपरेशन के लिए बाइबिल को उद्धृत किया, जिसमें फारस के खिलाफ “अनवरत लड़ाई” और यहूदी लोगों की रक्षा करने के इज्राएल के “दैवीय दायित्‍व” का जिक्र था।

यह दिखाता है कि यूरेनियम संवधर्न जैसी बातें तो बहाना हैं। मकसद इज्राएल के दबदबे को चुनौती देने की ईरान की क्षमता को खत्म करना, तेहरान को बेरूत से, गजा से जोड़ने वाले ‘‘रेजिस्टेंस एक्सिस’’ को खत्म करना, पश्चिमी हितों के लिए ईरान की किसी भी भविष्य की चुनौती को रोकना और सरकार बदलने की शुरुआत करना है।

लेकिन ईरान भी शायद ढाल है, जिसके जरिए रूस और चीन की इस इलाके में पैठ को रोकना है और यहां के संसाधनों पर काबिज होना है। दरअसल रूस के ईरान में बड़े हित हैं। वहां रूस के सालाना हथियारों की बिक्री में 10 अरब डॉलर से ज्‍यादा है, एटमी ऊर्जा में उसका सहयोग है। ईरान का हारना या बर्बाद होना मॉस्को के लिए बड़ा रणनीतिक झटका होगा। सीरिया में रूसी बेस, ईरान में एयर डिफेंस सिस्टम, पूरे इलाके में सलाहकार, ये सभी मिलकर तनाव बढ़ने की ही गुंजाइश है। इसलिए, अगर जंग बढ़ती है तो रूस को सिर्फ कूटनयिक हस्तक्षेप से आगे बढ़कर कदम बढ़ाने पड़ सकते हैं।

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चीन भी सालाना 30 अरब डॉलर से ज्‍यादा की खरीदारी करने वाला ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक है। यही नहीं, चीन का वहां 400 अरब डॉलर का निवेश समझौता है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में है। यह उसके बेल्ट ऐंड रोड के पश्चिम की ओर विस्तार के लिए जरूरी है। विदेशों में मिलिट्री बेस बनाने की चीन की इच्छा से भी पता चलता है कि अगर ईरान की मौजूदा सरकार को बचाने के लिए जरूरत पड़ी तो वह जंग में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकता है। फिलहाल वह भी खुले तौर पर सिर्फ कूटनयिक स्तर पर दबाव बना रहा है। हालांकि खबरें ये भी हैं कि वह गुपचुप ईरान की मदद कर रहा है।

इसलिए इज्राएल के लिए जंग आसान नहीं है। अगर इज्राएल आखिर में अपना दबदबा बना भी ले, तो भी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती। ईरान की ताकत के बिना भी इज्राएल हर वक्‍त निशाने पर बना रहेगा। हिज्बुल्लाह कमजोर हो सकता है, लेकिन लेबनानी नाराजगी खत्म नहीं होगी। हमास की फंडिंग बंद हो सकती है, लेकिन फलस्तीनियों की अपने देश की चाहत खत्म नहीं होगी। जंग के नए मोर्चे ही खुलते रहेंगे।

यूरोप ने 1945 के बाद युद्ध को सैन्‍य दबदबे से नहीं, बल्कि अंतरराष्‍ट्रीय नियम-कायदों के जरिए टाला था। पश्चिम एशिया को भी ऐसे ही फ्रेमवर्क की जरूरत है। जैसे, आपसी निर्भरता पर आधारित आर्थिक तंत्र, विवादों के निपटारे के लिए सुरक्षा इंतजामात और बाहरी दखल का मिलकर जवाब देने के लिए आपसी सहयोग वगैरह।

इतिहास से सीखना चाहिए। मंगोल हमले, क्रूसेड, औपनिवेशिक काल, 2003 के बाद की उथल-पुथल, सभी एक ही सबक सिखाते हैं, क्षेत्रीय बंटवारा बाहरी दबदबे को मुमकिन बनाता है; अंदरूनी झगड़े बाहरी मैनिपुलेशन के लिए टूल बन जाते हैं।

पश्चिम एशिया आज चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता ईरान के साथ टकराव की ओर ले जाता है, जिसे यूरेनियम संवर्धन से सही ठहराया जाता है, जिसे मजहबी नजरिए से देखा जाता है और फौजी हमले के लिए दैवीय आदेश का हवाला दिया जाता है।

यह विकल्‍प तबाही की ओर ले जा सकता है। उसके बाद जो होगा, उसका अंदाजा बहुत कम है, लेकिन बहुत बुरा हो सकता है। ईरान या इज्राएल के टुकड़े, लाखों लोगों का विस्‍थापन, कई देशों में प्रॉक्सी वॉर, तेल की आपूर्ति में रुकावट से दुनिया भर में आर्थिक झटके, आतंकवादी इस अफरा-तफरी का फायदा उठा सकते हैं और तुर्की, रूस और चीन का दखल इस खालीपन को भर सकता है।

पश्चिम एशिया ऐसे ही झंझावात में फंस गया है। सवाल यह नहीं है कि क्या युद्ध इस इलाके को नया आकार दे सकता है। सवाल यह है कि क्या यह इलाका इस बदलाव से बच सकता है और पहले जैसा ही बना रह सकता है। हालात चाहे जिस पक्ष में मुड़ें, पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन पहले जैसा नहीं रह जाएगा।

(लेखक पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। विचार निजी हैं)

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