Advertisement

पश्चिम एशिया जंग/नजरियाः दादागीरी दिखाने की जंग

जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोहरे मापदंड से बाज नहीं आता, तब तक वैश्विक राजनीति की पहचान दबंगई और...
पश्चिम एशिया जंग/नजरियाः दादागीरी दिखाने की जंग

जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोहरे मापदंड से बाज नहीं आता, तब तक वैश्विक राजनीति की पहचान दबंगई और कत्लेआम की बनी रहेगी

आधुनिक इतिहास में पश्चिम एशिया की घटनाओं पर नजर रखने वाले गौर कर सकते हैं कि 1917 में जारी हुआ बदनाम बाल्फोर डिक्लेरेशन ही आज की अस्थिरता और उथल-पुथल की जड़ है। उस डिक्लेरेशन में ब्रिटेन ने फलस्तीन की ऐतिहासिक जमीन यूरोपीय यहूदियों को देने का वादा किया था, जिनका फलस्तीन पर कोई मालिकाना हक नहीं था। उससे मिसाल कायम हुई कि इस इलाके के बारे में फैसले बाहरी ताकतें लेंगी, जो अमूमन वहां के मूल निवासियों की इच्छा और अधिकारों से अलग होंगी। उस समय से ऐसा कोई वाजिब रास्ता नहीं बचा, जिससे इस इलाके के भविष्य के बारे में भरोसा हो, क्योंकि उसकी नींव ही थोपी हुई व्यवस्थाओं पर रखी गई।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया बोली “फिर कभी नहीं।” इसी सिद्धांत के तहत अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय एक साथ बैठने को रजामंद हुए। संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर ने देशों को “अगली पीढ़ियों को युद्ध के खतरे से बचाने” और “ऐसे हालात बनाने के लिए प्रतिबद्ध किया, जिनमें संधियों और अंतरराष्‍ट्रीय कानून की जिम्मेदारियों के प्रति इंसाफ और सम्मान बनाए रखा जा सके।” ये अच्छे सिद्धांत हैं अगर उन्हें बराबरी से और लगातार लागू किया जाता। तब लाखों जानें बचती और भारी सैन्‍य खर्च की जरूरत नहीं होती, जो इंसानी विकास की कीमत पर होता है।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई युद्ध हुए। लाखों बेगुनाह लोगों ने जान गंवाई। आप्रवासन और विस्थापन की लहरों ने सभी महाद्वीपों को प्रभावित किया। लाखों शरणार्थी अभी भी बिखरे हुए हैं। लाखों लोग गरीबी और कुपोषण झेल रहे हैं। कई देशों में सैन्‍य बजट लोगों की भलाई की कीमत पर बढ़ता गया है। कई उंगलियां अभी भी हथियारों पर हैं और लाखों लोग अभी भी दूसरे की बंदूक के निशाने में जी रहे हैं। हम दुनिया की तबाही के कगार पर जी रहे हैं और एक बड़े युद्ध का डर असलियत से दूर नहीं है।

अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय की नाकामी की कई वजहें हैं। उनमें मुख्य है अंतरराष्‍ट्रीय कानून पर चुनिंदा तरीके से अमल, ताकतवर देशों का मतलबी होना और उत्‍तरी गोलार्द्ध के देशों का दक्षिणी गोलार्द्ध के मामलों में अपनाए जाने वाले खुलेआम दोहरे मापदंड और पाखंड। यह बात अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय के कुछ, खासकर ताकतवर पश्चिमी देशों के इज्राएल के साथ खास बर्ताव में कहीं ज्‍यादा साफ है। यह खास बर्ताव इतना साफ हो गया है कि अब बहुत से लोग खुद अंतरराष्‍ट्रीय कानून की विश्वसनीयता या उसे कायम रखने के लिए बनाए गए बहुपक्षीय व्‍यवस्‍था पर विश्वास नहीं करते।

यह समझने के लिए किसी को ज्योतिषी होने की जरूरत नहीं है कि इज्राएल पर शुरू से ही अंतरराष्‍ट्रीय कानून के उल्लंघन का आरोप लगता रहा है। इज्राएल का जन्म प्रमाण-पत्र संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा का प्रस्ताव 181 था, जो फलस्तीन के बंटवारे की योजना थी। उसमें फलस्तीन की ऐतिहासिक जमीन का तकरीबन 54 फीसदी हिस्सा इज्राएल और बाकी हिस्सा फलस्तीनी देश के लिए तय किया गया था। 1948 के आखिर तक इज्राएल का करीब 78 फीसदी जमीन पर कब्‍जा हो गया, जबकि प्रस्ताव 181 में यरुशलम के अंतरराष्‍ट्रीयकरण की बात कही गई थी, इज्राएल ने शहर के पश्चिमी हिस्से पर कब्जा कर लिया और बाद में उसे अपनी राजधानी घोषित कर दिया।

पिछले कई दशकों में, इज्राएल को संयुक्‍त राष्‍ट्र के अलग-अलग फोरम में बस्तियों को बढ़ाने, कब्जे की पॉलिसी, फौजी ऑपरेशन और कब्जे वाले इलाकों में आम लोगों के साथ बर्ताव को लेकर कई बार निंदा का सामना करना पड़ा है। फिर भी, कोई सार्थक जवाबदेही तय नहीं हो पाई है। घोषणाओं और उन पर अमल करने के बीच लगातार फर्क अंतरराष्‍ट्रीय कानून को लागू करने में चुनिंदा सोच को दिखाता है। दोहरे मानदंड की चर्चाओं में एक हालिया मिसाल यूक्रेन के साथ युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़ा है। पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ हजारों बंदिशें लगाई हैं। इसके उलट गजा में जारी कत्‍लेआम और वेस्‍ट बैंक में हमलों के बावजूद इज्राएल को खासकर बड़ी पश्चिमी ताकतों से किसी भी स्‍तर के समेकित प्रतिबंध का सामना नहीं करना पड़ा है। इसके बजाय उसे फौजी मदद और राजनैतिक समर्थन जारी रहा है, जिससे यह सोच और पक्की हुई है कि अंतरराष्‍ट्रीय कानून के उल्लंघन का मामला चुनिंदा मामलों में ही बताया जाता है। इसका यही संदेश है कि कुछ कानून से ऊपर हैं। ऐसी सोच पूरे अंतरराष्‍ट्रीय कानूनी व्‍यवस्‍था की वैधता कमजोर होती है।

हाल ही में, पश्चिम एशिया का भविष्य तय करने वाले अहम किरदार अमेरिका के इज्राएल में राजदूत माइक हकबी ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में इज्राएली बस्तियों की खुले तौर पर वकालत की और उस इलाके को बाइबिल के नामों “जूडिया और सामरिया” से बुलाया। अमेरिकी स्‍तंभकार टकर कार्लसन के साथ लंबी बातचीत में हकाबी ने ऐसी बातें कहीं जिन्हें कई कानूनी जानकार मौजूदा अंतरराष्‍ट्रीय कानून और इज्राएल-फलस्तीनी विवाद के बारे में संयुक्‍त राष्‍ट्र की पुरानी नीतियों के खिलाफ मानेंगे। उनसे पूछा गया, अगर इज्राएल अंतरराष्‍ट्रीय कानून का पालन नहीं करता है तो उसकी वैधता पर सवाल खड़े होंगे। जवाब में हकाबी ने कानून लागू करने वाली संस्‍थाओं की कानूनी मान्यता पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्‍ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट (आइसीसी) और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आइसीजे) ‘‘दुष्‍ट संगठन’’ है।

इज्राएल की वैधता के बचाव में हकाबी ने बाइबिल, खासकर जेनेसिस 12 और 17 का हवाला दिया और उन्हें जमीन पर एक दैवीय “मालिकाना हक” के तौर पर पेश किया। इससे तर्क अंतरराष्‍ट्रीय कानून से हटकर मजहब की ओर मुड़ जाता है। ऐसा पढ़ने से माना जाता है कि अब्राहम से किए गए वादे सिर्फ यहूदियों पर लागू होते हैं और अब्राहम को बाद में “यहूदी” बताया जाता है, हालांकि यह शब्द इतिहास में बहुत बाद में आया। अगर तर्क के लिए मान भी लिया जाए, तो अब्राहम के वंशजों में इश्माएल और केतुरा के बच्चे शामिल हैं। सिर्फ अब्राहम के वंश पर आधारित दावा उसी कुल परंपरा से जुड़े दूसरे खानदानों को बाहर नहीं कर सकता।

अंतरराष्‍ट्रीय कानून के बजाय चुनिंदा मजहबी व्याख्या पर वैधता को आधार बनाकर हकाबी देश के आधुनिक कानूनी ढांचे से अलग हट जाते हैं। अगर उनकी बात ही मानी जाए तो इससे न सिर्फ इज्राएल-फलस्तीनी सवाल मुश्किल हो जाएगा, बल्कि दुनिया भर में अंतरराष्‍ट्रीय नियम भी बेमानी हो जाएगी। कई देश इलाके में विस्तार को सही ठहराने के लिए पुरानी किताबों या ऐतिहासिक दावों का हवाला दे सकते हैं, जिससे 1945 के बाद बनी आम सहमति मिट जाएगी, जो ठीक ऐसे ही विवादों को रोकने के लिए बनाई गई थी।

इसलिए मुद्दा सिर्फ फलस्तीन या इज्राएल का ही नहीं, अंतरराष्‍ट्रीय कानून का भी है। जब ताकतवर देश कानूनी सिद्धांतों को चुनिंदा तरीके से, विरोधियों के खिलाफ सख्ती से और सहयोगियों के खिलाफ लचीले तरीके से लागू करते हैं, तो वे उन सिद्धांतों को खत्म कर देते हैं। लिहाजा, विश्‍व व्‍यवस्‍था बिखर गई है, जहां ताकत का इस्तेमाल ज्यादा होता है और जहां छोटे देश अपनी रक्षा करने वाली संस्‍थाओं में भरोसा खो देते हैं।

फलस्तीनियों के लिए इस बदलाव का मतलब है लंबे समय तक कब्जा, रुका हुआ देश का दर्जा और यह एहसास कि उनकी तकलीफ दूसरों को मिलने वाली वैसी नैतिक जरूरत महसूस नहीं कराती। बड़े इलाके में इससे अस्थिरता और कट्टरता बढ़ती है और अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यवस्‍था के लिए यह कानून के तहत समान न्याय के वादे से खतरनाक तरीके से पीछे हटने का संकेत है। अगर “फिर कभी नहीं” की प्रतिबद्धता का कोई मतलब है, तो उस पर दुनिया भर में अमल होना चाहिए। अंतरराष्‍ट्रीय कानून सुविधा के टूल की तरह काम नहीं कर सकता। वह सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। ऐसा न होने पर नियम-कानून पर आधारित व्यवस्था खोखला नारा बनकर रह जाती है।

पश्चिम एशिया में प्रस्तावों, घोषणाओं या कानूनी ढांचों की कमी नहीं है। समस्‍या असमान लागू होने की है। जब तक अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय दोहरे मापदंडों की सच्चाई का सामना नहीं करता, तब तक चुनिंदा कार्रवाई वैश्विक राजनीति की पहचान बनी रहेगी और अंतरराष्‍ट्रीय कानून की कमी जारी रहेगी।

(भारत में फलस्तीन के राजदूत, विचार निजी हैं)

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से
Advertisement
Advertisement
Advertisement
  Close Ad