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कथक में अंजलि-मुस्कान की नई आमद

कथक नृत्य की मशहूर नृत्यांगना सुश्री विद्या लाल ने अपने रोमांचक नृत्य प्रदर्शन से देश और विदेश में...
कथक में अंजलि-मुस्कान की नई आमद

कथक नृत्य की मशहूर नृत्यांगना सुश्री विद्या लाल ने अपने रोमांचक नृत्य प्रदर्शन से देश और विदेश में कला रसिकों से काफी सरहना अर्जित की है। वे जयपुर घराने की प्रखर नृत्यांगना विदूषी गीतांजलि लाल की पदु शिष्या है। इस समय विद्या भी एक गुरु के पद पर आसीन होकर युवाओं को नृत्य का प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं। उनकी अनेक शिष्यों में अंजलि मुंजल और मुस्कान तेजी से उभरकर सामने आई हैं।

हाल ही में अंजलि और मुस्कान के युगल नृत्य की मनोरम प्रस्तुति इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सभागार में हुई। उनके नृत्य को देखने से लगा कि जिस शिद्दत से गुरु ने उन्हें सिखाया है उसी लगन और समर्पण से उन्होंने सीखा भी है। मंगला चरण के रूप में दोनों ने कार्यक्रम का आरंभ भगवान शिव और शक्ति यानी देवी की अराधना और उपासना में भक्ति भाव में लीन होकर किया। गुरु विद्या लाल द्वारा नृत्य में सुन्दरता से संरचित यह प्रस्तुति राग अड़ाना और ताल झपताल में निबद्ध थी।

उसके उपरांत तीनताल पर परंपरागत कथक का शुद्ध नृत्य के विभिन्न व्याकरणबद्ध प्रकारों को अंजलि और मुस्कान ने शुद्ध चलनों में सूझबूझ से सही लीक पर खूबसूरती से पेश किया। प्रस्तुति में नाच की बंदिशे बोल छन्द आदि की निकास में अंग संचालन हस्तक पैरों के काम आदि में अच्छा संतुलन था। नृत्य में उनका रियाज और तैयारी को देखकर यह अहसास हुआ कि यदि वे पूरी एकाग्रता से नृत्य को निखारने का प्रयास करती रहेंगी तो निश्चय ही नृत्य के ऊंचे पायदान पर पंहुचने की राह खुलती रहेंगी।

अगली प्रस्तुति में राग विहाग में निबद्ध ठुमरी - देखो साखि गायन पर नृत्य और अभिनय में भाव को विविध बोल बनाव के आधार पर अभिव्यक्त करने का प्रयास भी इन युवा नृत्यांगनाओं ने रसपूर्णता से किया। कार्यक्रम का समापन द्रुत तीन ताल की लायात्मक गति में बड़े मनोहारी रूप में हुआ।

नाच के द्रुत चलन में पारंपरिक परन, टुकड़े, तिहाइयां, लयबांट, लयकारी, आदि को प्रस्तुत करने में दोनों ने अच्छा रोमांच और रंग भरा। यह सच है कि इस युग में कलात्मक और सौन्दर्य की दृष्टि से कथक में काफी प्रगति हुई और उसमें नए - नए आयाम जुडे़ हैं। यह देखकर अच्छा लग रहा है कि विद्या लाल जैसी ऊर्जावान और प्रतिभाशाली नृत्यांगना और संरचनाकार से उम्मीद है कि वे अपने शिष्यों को नृत्य में उतारने में उन्हें नए-नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित करेंगी ताकि उनके नृत्य का रंग और रंगत सजीव होकर दर्शकों को मुग्ध कर सकें।

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