विश्वसनीय आंकड़ों के बिना संवैधानिक दायित्वों को पूरा कर पाना नामुमकिन है, इसलिए पारदर्शी और पेशेवर नजरिए की दरकार
संविधान के 77वें वर्ष में सार्वजनिक विमर्श बंटा हुआ है। एक हलके में “संविधान खतरे में है” तो दूसरी ओर “न्यू इंडिया” के दावे हैं। सालगिरह सिर्फ नारों पर गौर करने का नहीं, बल्कि यह जानने का मौका होता है कि संविधान सभा ने किस सोच के साथ संविधान तैयार किया, या जिस संस्थागत नजरिए और शासन-पद्धति की परिकल्पकना की गई, क्या आज भी वही ढर्रा कायम है?
जवाहरलाल नेहरू ने संविधान-सभा में विश्व प्रसिद्घ ‘टेनिस कोर्ट शपथ’ का जिक्र किया, जो महज ऐतिहासिक संदर्भ भर नहीं था। वह क्रांतिकारी प्रतिज्ञा का इजहार था। 1789 में फ्रांस में कुछ जनप्रतिनिधि टेनिस कोर्ट में जुटे और शपथ ली कि संविधान तैयार किए बिना वहां से नहीं हिलेंगे। उसके बाद लोग प्रजा नहीं, लोकतंत्र के नागरिक हो गए। भारत की संविधान-सभा के लिए भी वैसी ही महान लोकतांत्रिक और नैतिक मूल्यों को तय करने की चुनौती थी। इसलिए संविधान सिर्फ कानूनी दस्तावेज भर नहीं, सामूहिक प्रतिज्ञा-पत्र है।
संविधान निर्माताओं के लिए यह प्रतिबद्धता सिर्फ चुनाव और कानून तक सीमित नहीं थी। यह महज संयोग नहीं है कि संविधान में योजना या सांख्यिकी का सीधा जिक्र नहीं है, लेकिन उसकी हर घोषणा में यह मौजूद है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में रोजगार, बराबरी और समाज कल्याण के निर्देश हैं। विश्वसनीय आंकड़ों के बिना यह नामुमकिन है। संविधान देश के लोगों का जीवन-स्तर सुधारने का निर्देश देता है, जो वास्तविक जानकारी के बिना संभव नहीं है।
गणतंत्र के प्रारंभिक दशकों में इन संवैधानिक दायित्वों में कोई विचलन नहीं दिखा। औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त हुए देशों में भारत में सबसे ठोस सांख्यिकीय व्यवस्था का निर्माण किया गया। विशाल व्यापक सर्वेक्षण, जनगणना और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ऐसे ढांचे तैयार किए गए, जिससे सरकार को जमीनी हकीकत जानने का मौका मिले। इन व्यवस्थाओं से न सिर्फ देश में नीति-विमर्श को दिशा मिली, बल्कि विश्व मंच पर भी भारत की प्रतिष्ठा बनी।
हाल के वर्षों में इस संवैधानिक पद्धति से अहम विचलन सांख्यिकीय व्यवस्था में देखी गई। खासकर हर दशक में होने वाली जनगणना समय पर नहीं हुई। जनगणना सिर्फ सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह गणतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रथाओं में एक है। जनगणना ही संसदीय प्रतिनिधित्व, वित्तीय संसाधनों का राज्यों के बीच बंटवारे, कल्याणकारी योजनाओं, शहरी नियोजन और सामाजिक नीतियों के लिए आधार मुहैया कराती है। इसी से सरकार को समय-समय पर देश के लोगों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। देश में आखिरी दशकीय व्यापक जनगणना 2011 में हुई थी। गणना में देरी का अर्थ आंकड़ों की कमी ही नहीं है। उसका असर विकास की गुणवत्ता और बराबरी पर पड़ता है।
कोविड-19 महामारी ने निस्संदेह कई सरकारी कार्यों में रुकावट पैदा की। महामारी के दौरान भी देश में बड़े स्तर के लोकतांत्रिक कामकाज जारी रहे, चुनाव निर्बाध कराए जाते रहे, इसी कसौटी पर अगर जनगणना में लंबी देरी को परखा जाए, तो संवैधानिक प्राथमिकताओं को लेकर स्वाभाविक सवाल खड़े होते हैं। समय बीतने के साथ जनगणना अपनी दशकीय अनिवार्यता से दूर होती जा रही है। जनगणना के मौजूदा कार्यक्रम के मद्देनजर, उसके अंतिम नतीजों के आने में लगभग एक दशक का फर्क आ सकता है, जिससे पूरा दशक गंवा देने और जनगणना चक्र टूटने का खतरा है।
गरीबी का आखिरी सरकारी आकलन 2011-12 के घरेलू उपभोग सर्वेक्षण पर आधारित था। तबसे सर्वाधिक घरेलू उपभोग सर्वेक्षणों और बहुआयामी गरीबी सूचकांकों जैसे अनुमानित संकेतों का ही जिक्र किया जाता है। ऐसे सूचकांकों और संकेतों की अहमियत विश्लेषण में तो होती है, मगर उन्हें व्यापक जनगणना और उपभोग-आधारित सर्वेक्षणों का विकल्प नहीं माना जाता है। जब आधारभूत आंकड़े ही न हों, तो ईमानदार नीयत वाली नीतियां भी आंशिक वास्तविकताओं पर आधारित होती हैं।
आंकड़ों की गुणवत्ता और मूल आधारों से उनकी तुलना को लेकर शक-शुबहे सिर्फ देश तक सीमित नहीं हैं। हाल में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने राष्ट्रीय आंकड़ों और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों में पारदर्शिता, पद्धतिगत स्पष्टता और संस्थागत स्वायत्तता के महत्व को लेकर शंकाएं जाहिर की हैं। इसी दौर में देश में सांख्यिकीय आधार वर्षों को अद्यतन करने और आकलन प्रणालियों को आधुनिक बनाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। लेकिन महत्वपूर्ण आंकड़ों की साख बहाल करना है। इस संदर्भ में वैश्विक सांख्यिकीय प्रणाली में भारत की वर्तमान भूमिका विशेष महत्व रखती है। संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग की अध्यक्षता फिलहाल भारत के पास है, जो वैश्विक मानकों के निर्धारण की सर्वोच्च संस्था है। यह पद अवसर और जिम्मेदारी भी मुहैया कराता है कि हम दिखा सकें कि हमारी घरेलू सांख्यिकीय संस्थाएं सुदृढ़, पेशेवर और अल्पकालिक दबावों से मुक्त है।
यह हमें फिर मूल सिद्धांतों की ओर लौटा लाता है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में चेतावनी दी थी कि संविधान के अंतर्गत स्थितियां उलट होती हैं, तो कारण संविधान की त्रुटि नहीं, बल्कि उसे लागू करने वालों की नैतिक विफलता होगी।
इस नजरिए से सांख्यिकीय प्रणाली को अधिक स्वायत्तता, वैधानिक संरक्षण और पेशेवर स्वतंत्रता के साथ दुरुस्त करना सिर्फ प्रशासनिक सुधार भर से नहीं होगा। यह संविधान निर्माताओं की उस प्रतिज्ञा के प्रति निष्ठा का कार्य होगा। 76 वर्ष पूरे करने पर संविधान हमसे श्रद्धा नहीं, ईमानदारी की मांग करता है।

रामा कामाराजू
(नीति आयोग के पूर्व सीनियर कंसल्टेंट। विचार निजी हैं)