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राही मासूम रजा : हिन्दुस्तानी मुसलमान जिन्होंने महाभारत को भारत के हर घर तक पहुंचाया

आज उर्दू भाषा के प्रख्यात लेखक राही मासूम रजा की जयंती है। उनका जन्म 1 सितंबर सन 1927 को उत्तर प्रदेश के...
राही मासूम रजा : हिन्दुस्तानी मुसलमान जिन्होंने महाभारत को भारत के हर घर तक पहुंचाया

आज उर्दू भाषा के प्रख्यात लेखक राही मासूम रजा की जयंती है। उनका जन्म 1 सितंबर सन 1927 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था। उनके पिता मशहूर वकील और कांग्रेसी नेता बशीर हसन आबिदी थे। घर में किसी किस्म की कोई कमी नहीं थी। मगर ग्यारह वर्ष की आयु में राही मासूम रजा को टीबी की बीमारी हो गई। तब आज की तरह टीबी का आधुनिक और पक्का इलाज नहीं था। पारंपरिक तरीके से टीबी का उपचार किया जाता था। यह स्थिति बड़ी तकलीफदेह होती थी। हर वर्ष बहुत लोग टीबी से मरते थे। कम उम्र और टीबी की बीमारी का भारी बोझ राही मासूम रजा के शरीर पर था।

 

इलाज के दौरान राही मासूम रजा बिस्तर पर ही लेटे रहते थे। शरीर कमजोर हो गया था। लेटे लेटे राही मासूम रजा ने घर में रखी किताबें पढ़नी शुरु की। पढ़ने का चस्का लग गया। देखते ही देखते राही मासूम रजा ने घर की सारी किताबें पढ़ डालीं। उनके भीतर साहित्य का शौक परवान चढ़ने लगा। बीमारी से ठीक हुए तो कुछ व्यवस्थित ढंग से पढ़ाई लिखाई की। उन्हें पढ़ाने के लिए पिता ने एक मौलवी को रख लिया। अलबत्ता मौलवी साहब पीटते अधिक थे और पढ़ाते कम थे। इस पिटाई से बचने के लिए राही अपनी पॉकेट मनी बतौर रिश्वत मौलवी साहब को पेश कर देते थे। 

 

पढ़ाई करने के लिए राही मासूम रजा अलीगढ़ पहुंचे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। पोलियो होने के कारण राही मासूम रजा जरा लगड़ा कर चलते थे। मगर उन पर शेर और शायरी का वह सुरूर छाया हुआ था कि उनके इर्द गिर्द के लोग भी आशिक हुए जाते थे। बताने वाले बताते हैं कि असरार उल हक मजाज, जिन्हें उर्दू शायरी का कीट्स कहा जाता है, के बाद अगर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की लड़कियां किसी पर फिदा हुईं तो वह राही मासूम रजा थे। अलीगढ़ में ही उनकी मुलाकात नैयरा से हुई, जिनसे उनका विवाह हुआ। 

 

राही मासूम रजा समाजवादी विचार के समर्थक थे। कम उम्र में ही उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी जॉइन कर कर ली थी। वह और उनके बड़े भाई मूनिस रजा कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार प्रसार किया करते थे। एक बार 

गाज़ीपुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के लिए कामरेड पब्बर राम, जो कि एक भूमिहीन मज़दूर थे, को कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव लड़वाया। चुनाव में पब्बर राम के प्रचार की सब जिम्मेदारी राही मासूम रजा पर थी। तभी घोषणा हुई कि नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए राही मासूम रजा के पिता बशीर हसन भी कांग्रेस की तरफ से चुनाव मैदान में उतर गए हैं। पिता और पुत्र पर अपनी अपनी पार्टियों की जिम्मेदारी थी। दोनों ने अपना धर्म निभाया और व्यक्तिगत संबंधों को कर्म की राह में आने नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि एक भूमिहीन मजदूर ने बड़े वकील को चुनाव हराकर नगरपालिका अध्यक्ष पद हासिल किया। 

 

 

राही मासूम रजा का वामपंथी तेवर आपातकाल के समय भी कायम रहा। जब देश के अधिकांश लेखकों ने इंदिरा गांधी और आपातकाल की पैरवी की थी, राही मासूम रजा अकेले खड़े रहकर जुल्म का विरोध करते रहे। तमाम बड़े लेखक राही मासूम रजा को समझाते रहे लेकिन वह अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटे। उनकी दृष्टि में सत्ता, जुल्म, सितम के आगे झुकने पर लेखक की मौत हो जाती है। इसलिए ऐसी मौत से बेहतर है कि वह सरकार की यातनाएं भोग लें। 

 

 

अलीगढ़ में रहते हुए राही मासूम रजा एक मकबूल नाम बन चुके थे। उनकी शायरी देश भर में असर पैदा कर रही थी। मगर शायरी के साथ साथ राही मासूम रजा का उपन्यास में भी बराबर दखल था। वह नाम बदलकर कई सालों तक उपन्यास लिखते रहे। यह उपन्यास मूल रूप से जासूसी कहानियों पर आधारित होते थे। अलीगढ़ में ही राही मासूम रजा के फिल्में देखने का शौक दीवानगी बना। राही मासूम रजा एक ही फिल्म कई शो में देखते। उनके मन में था कि वह फिल्मों में काम करें। यही चाहत उन्हें मुंबई ले गई। मुंबई के स्ट्रगल ने राही मासूम रजा को आजमाया। उन्होंने बड़े संघर्ष भरे दिन देखे। कठिन समय में उन्हें हिंदी लेखक कमलेश्वर और धर्मवीर भारती ने मदद। उन्होंने एडवांस देकर राही मासूम रजा से "धर्मयुग" और "सारिका" पत्रिका में लिखवाया। एडवांस के पैसों से राही मासूम रजा ने अपना स्ट्रगल किया। दिन बदले तो बी आर चोपड़ा, राज खोसला और ऋषिकेश मुखर्जी ने राही मासूम रजा को काम दिया। राही मासूम रजा देखते ही देखते बड़े पटकथा लेखक बनकर उभरे। उन्हें "मिली", "मैं तुलसी तेरे आंगन की" और "लम्हे" जैसी फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 

 

यह राही मासूम रजा की महानता थी कि संघर्ष के दिन बिताने के बाद जब उन्हें शोहरत मिली तो उन्हें पैसे से मोह नहीं हुआ। राही मासूम रजा कभी खुलकर किसी निर्माता से पैसे नहीं मांगते थे। जिसने जो भी दिया, वह कुबूल करते और फिल्म लिख देते थे। फिल्म इंस्टीट्यूट में राही मासूम रजा ने पढ़ाई की थी। इस कारण फिल्म इंस्टीट्यूट के लोगों की फिल्में वह मुफ्त में लिख दिया करते थे। उनका ऐसा स्वभाव था कि उनके घर मेहमानों का आना जाना लगा रहता था। मुंबई में ऐसी आवभगत शायद ही किसी घर में होती हो। राही मासूम रजा के घर के दरवाजे हर किसी के लिए खुले रहते थे। जो भी आता, उसका सत्कार होता और उसे भरपेट भोजन उपलब्ध कराया जाता। इंसानियत और आध्यात्म की ड्रामेबाजी से दूर असली अर्थ जीते थे राही मासूम रजा। 

 

 

राही मासूम रजा को कट्टर सोच से ही ऐतराज था। कट्टरपंथी किसी भी धर्म के हों, राही मासूम रजा उनका घोर विरोध करते थे। मुस्लिम होने से ज्यादा उन्हें भारतीय होने पर गर्व था। मजहब से ज्यादा मनुष्यता में रूचि थी उनकी। इसी रुझान के कारण राही मासूम रजा ने उपन्यास "आधा गांव" और "टोपी शुक्ला" लिखा। इन उपन्यासों में राही मासूम रजा ने बताया कि कैसे धर्मांधता और दो राष्ट्र थ्योरी के कारण हुए भारत के विभाजन ने मुसलमानों को ज़ख्म देने का काम किया है। अपनी बात रखने के लिए राही मासूम रजा ने "वसीयत" और "मुसलमान" नाम की नज्म लिखी, हो बहुत मशहूर हुईं। 

 

कट्टरपंथियों को जवाब देने और सबक सिखाने के मकसद से ही राही मासूम रजा ने "महाभारत" टीवी सीरियल लिखा। जब बी आर चोपड़ा ने राही मासूम रजा को महाभारत सीरियल लिखने की पेशकश की तो उन्होंने मना कर दिया। यह बात अखबारों में छप गई। देशभर से लोग बी आर चोपड़ा को खत लिखकर कहते कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है, जो करोड़ों हिंदुओं के होते हुए, वह एक मुस्लिम को महाभारत लिखने का प्रस्ताव दे रहे हैं। जब बी आर चोपड़ा ने यह खत राही मासूम रजा के पास भेजे तो उन्हें महसूस हुआ कि कट्टरपंथियों के मन की कालिख का इलाज़ जरूरी है। राही मासूम रजा ने तब न केवल महाभारत सीरियल लिखा बल्कि इस तरह उसमें जादू रचा कि महाभारत की कहानी संपूर्ण भारतवर्ष में गांव गांव, घर घर पहुंच गई। 

 

 

राही मासूम रजा एक सच्चे हिंदुस्तानी थे। उनका किरदार उदाहरण था कि एक भारतीय में क्या गुण, धर्म होने चाहिए। उन्होंने आजीवन हक, न्याय की बात की। जगजीत सिंह जब राही मासूम रजा के शब्दों को गाते हैं तो एक जादुई संसार की रचना होती है। "हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद" सुनते हुए हर परदेसी अपने घर को याद करने लगता है। यह तासीर किसी सूफी, किसी नेकदिल इंसान के लिखे में ही हो सकती है। यह जादू राही मासूम रजा के शब्दों में ही संभव है। 

 

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