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नजरिया: कृष्णैया बेमिसाल शख्सियत

अपने कार्यकाल के दौरान एसपी के रूप में एक बार मेरी तैनाती पश्चिमी चंपारण में हुई तो तब वह ‘मिनी...
नजरिया: कृष्णैया बेमिसाल शख्सियत

अपने कार्यकाल के दौरान एसपी के रूप में एक बार मेरी तैनाती पश्चिमी चंपारण में हुई तो तब वह ‘मिनी चंबल’ के नाम से चर्चित था। वहां डकैतों के कई गिरोह थे और अपहरण चरम पर। एक ओर भारत-नेपाल की खुली सीमा से तस्करीहोती थी, दूसरी ओर वल्मीकिनगर व्याघ्र परियोजना के घने जंगल की कीमती लकड़ियों की तस्करी और उस इलाके में करीब आधा दर्जन चीनी मिलें भी हैं। डकैतों का खौफ चीनी मिलों पर इस कदर फैला था कि उन्हें ‘ईजी मनी’ वहीं से मिल जाती थी।

 

उस पर लगाम कैसे लगे, यही सोचे जा रहा था कि वहां डीएम पद पर तैनाती हुई जी. कृष्णैया की। कृष्णैया स्मार्ट, कम उम्र, फुर्तीले और समय, नियम तथा कानून के प्रति सजग थे। उतने ही सहज और विनम्र भी थे लेकिन कानून के पालन में अत्यंत सख्त, प्रो-पीपुल थे। हमारी केमिस्ट्री ऐसी बनी कि हमने कई संयुक्त ऑपरेशन चलाए। सब सफल हुए। एक बार हम दोनों गंडक नहर की चौड़ी सड़क से जंगल के बीचोबीच जा रहे थे। सहसा, कृष्णैया को याद आ गए पुराने दिन। वे कहने लगे कि मेरे घर या कहें झोपड़ी में खाने को दाने तक नहीं रहते थे। पिता कुली थे। खुद कुली के रूप में कृष्णैया ने भी उनका साथ दिया। पर वे मेधावी छात्र थे। मेधा के बल पर ही उनका हरिजन हॉस्टल में नामांकन हुआ, जो उनके घर से नहर से दूसरी ओर था। मैं उनकी बातें सुनकर अचंभित था। नहर में जल प्रवाह को देखते कृष्णैया ने बात जारी रखी कि हॉस्टल में जब उन्हें मां-पिताजी याद आते तो वे नहर में ही छलांग लगा देते और उसकी प्रवाह की गति से गंतव्य तक पहुंच जाते। पर, घर पहुंचते तो खाने को नहीं। सो, फिर भाग कर हॉस्टल में वापस आ जाते। मैंने महसूस किया कि वे जात-पात की संकीर्ण दीवारों से बहुत ऊंचे थे। वे दलित या ब्राह्मण दोनों के मामले एक ही फुर्ती से निपटाते थे। वे सबसे मिलते थे। निर्भीक, हरदिलअजीज शख्स थे। किसी फिल्म के नायक जैसे शांतचित्त, पढ़ाकू। उनकी मेज पर फाइल कभी लंबित नहीं रहती थी। शिकायतों का निपटारा फौरन करते और सरकारी योजनाओं का मुआयना और उसका कार्यान्वयन सख्ती से। बच्चों को स्कूल जाते देख वह पुलकित हो जाते। कहीं खो-से जाते। पार्टी पॉलिटिक्स तो उन्हें आती ही नहीं थी।

 

मैंने एक मीटिंग में कृष्णैया को अवगत कराया कि कैसे चीनी मिलें चाहे डर से या स्वेच्छा से डाकुओं और दबंग लोगों को मदद करती हैं। कैसे उसी मदद से राजनीतिक रोटियां सेंकी जातीं और डाकुओं के गिरोह भी चलते हैं। तेजतर्रार कृष्णैया को वहां के समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र को समझते देर नहीं लगी। मैंने प्रस्ताव दिया। तत्क्षण उन्होंने चीनी मिलों के नाम एक सर्कुलर जारी कर दिया कि किसानों को चालान की राशि नकद नहीं, सीधे बैक अकाउंट में दी जाएगी। इस सर्कुलर ने जंगल को थोड़ा शांत कर दिया पर डाकुओं, मिल प्रबंधन और कथित दबंग लोगों के सीने में आग लगा दी। उनकी काली कमाई पर सीधा प्रहार हो गया था। मामला पटना तक पहुंचा। कई प्रभावी लोग इस सर्कुलर को वापस लेने के लिए कृष्णैया पर दबाव बनाने लगे, लेकिन कृष्णैया टस से मस नहीं हुए।

 

जब छोटे प्रभावी लोगों से बात नहीं बनी तो सूबे के शीर्ष पर बैठे एक नेता खुद बेतिया पहुंच गए। उसके बावजूद कृष्णैया अड़े रहे। उनका सीधा तर्क था कि इससे किसान खुश हैं। सर्वे करा लीजिए। मैं एक मौन श्रोता की तरह इन बातों को देखता-समझता और गवाह था। वे बेमिसाल थे। जब भी मौका मिलता हम दोनों जंगल की ओर जाते या किसानों के बीच। जिलाधिकारी कक्ष में हर उस जमींदार से वह वैसे ही मिलते, जैसे किसी गरीब से। सबकी समस्या वे सुनते और तुरंत निपटारा करते। वहां उनकी लोकप्रियता गजब की थी। उनके परिवार के लोगों से मेरी बातचीत होती रहती है। जब उनका तबादला गोपालगंज हुआ तो खुश नहीं थे। लेकिन वहां भी उनकी गरीबों और आम लोगों के बीच गहरी पैठ बन गई। गजब के ईमानदार अधिकारी थे।

 

1985 बैच के इस आइएएस अधिकारी की हत्या की खबर जब मुझे दिसंबर 1994 में मिली तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उसे भला कौन मारेगा? वे तो नायक हैं। वे मेरे मित्र नहीं, उससे भी बढ़ कर थे। कई दिनों तक मुझे चैन नहीं मिला। हत्या के हर पहलू को जानने की कोशिश करता रहा। पर, मेरी भी सीमाएं थीं और हैं। अगर वे बेतिया या गोपालगंज में रहते तो मारे नहीं जाते। एक निश्छल, हंसमुख और विनम्र कलेक्टर।

 

बहरहाल, मुझे समझ में नहीं आता कि यहां कानून बनता कैसे है? पुराने नियमों को विलोपित कैसे कर दिया जाता है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो डिबेट होनी चाहिए, यह सब करने के लिए। ज्यूरी बैठनी चाहिए। यहां तो ऐसे कानून बनता है जैसे रात में सपना देखा और दिन में कानून बना दिए। शराब वाले में क्या हुआ? कोर्ट ने आखिर पूछ ही लिया - कैसे कानून बनाए थे? सर्वे कराए थे या नहीं? जहां तक मैं समझता हूं कि कानून तो समाज में समरसता और सुचारु संचालन के लिए बनाया जाता है। 2012 के जेल मैन्युअल के एक संवेदनशील खंड को विलोपित कर दिया गया। डिबेट हुई? नहीं। ज्यूरी बैठी? नहीं। लोकतांत्रिक सिस्टम नहीं है यह। अब मामला तो सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। अब इस पर सबके अपने अलग-अलग तर्क हैं। कुछ कन्विंसिंग और कुछ अनकन्विंसिंग, क्या कहा जाए? मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, देखिए आगे क्या होता है। 

 

(बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद ने आउटलुक के साथ पूर्व आइएएस अधिकारी जी. कृष्णैया के बारे में अपनी यादें साझा कीं। गोपालगंज के तत्कालीन जिला अधिकारी की 1994 में भीड़ ने मुजफ्फरपुर में हत्या कर दी थी, जिसकी अगुआई कथित तौर पर पूर्व सांसद आनंद मोहन कर रहे थे। बिहार सरकार के हाल में जेल मैन्युअल के एक प्रावधान में संशोधन के बाद आजीवन कारावास की सजा काट रहे आनंद मोहन की विवादों के बीच रिहाई हुई) (संजय उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)

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