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आपदा: तरक्की का भुलावा तबाही को बुलावा

“जलवायु परिवर्तन, धारासार बारिश और भूस्खलन की तबाही का चश्मदीद इस साल ऐसी घटनाओं से एक हद तक अनजान...
आपदा: तरक्की का भुलावा तबाही को बुलावा

“जलवायु परिवर्तन, धारासार बारिश और भूस्खलन की तबाही का चश्मदीद इस साल ऐसी घटनाओं से एक हद तक अनजान हिमाचल प्रदेश बना और लगभग समूचा उत्तर भारत बाढ़ में डूबने-उतराने लगा, हिमालय यही चेतावनी दूसरे इलाकों में दे चुका है लेकिन विकास की धारा अनसुना करने की जिद पर अड़ी, क्या है हल?”

बाढ़ का नाम सुनते ही जेहन में बिहार, असम, बंगाल की तस्‍वीर सहज घूम जाती है। कुछेक साल से उत्तराखंड भी इस शब्‍द की अर्थछवियों में जुड़ गया है। हिमाचल प्रदेश में बाढ़ हमारे जेहन का हिस्‍सा नहीं रही। हिमाचल के लोगों को भी याद नहीं कि इस बार जो घटा है, वैसा पिछली बार कब हुआ था। कोई 1995 कह रहा है, कोई 1978, तो कोई कुल्‍लू के गजेटियर के सहारे 1905 तक का जिक्र कर रहा है। स्‍मृतियां अपनी-अपनी हैं, लेकिन अनुभव सबके एक- कि जो तबाही अबकी हुई है वह कभी नहीं हुई थी। अनुभव के पीछे के कारण भी सबके एक हैं- देवों की धरती पर आई यह आपदा दैवीय नहीं है, मनुष्‍य की पैदा की हुई है।

बादल फटने की घटनाएं

इंसानी हरकतें दो कारणों से ही तबाही का सबब बनती हैं। या तो वह इतिहास से जान-बूझकर सबक नहीं लेता या फिर उसकी स्‍मृति बहुत छोटी होती है। हिमाचल में बाढ़ का इतिहास तो बुजुर्गों को भी ठीक से याद नहीं, लेकिन बीते डेढ़ दशक में की गई हरकतों की स्‍मृतियां भी सिरे से गायब हैं। यह दिक्‍कत केवल लोगों की नहीं, सरकारी अमले की भी है। शायद इसीलिए कुल्‍लू जिले के सैंज में बीते 5 जून को आपदा प्रबंधन की जो मॉक ड्रिल हुई थी, उसमें केवल आग और भूकम्‍प जैसी आपदाओं का पूर्वाभ्‍यास किया गया। बाढ़ का जिक्र तक नहीं आया।

महीने भर के भीतर पर्यटन का सीजन शबाब पर था। नदियों के किनारे अवैध ढंग से बने होटल जगमगा रहे थे। नियमों का उल्‍लंघन करके बनाई गई दुकानें ग्राहकों से भरी हुई थी। सालाना कोई एक करोड़ से ज्‍यादा सैलानियों का स्‍वागत करने वाला सत्तर लाख की आबादी का यह सूबा पानी, बिजली, संसाधनों के दोहरे दबाव में था। तभी जबरदस्‍त बारिश आई। शनिवार 8 जुलाई की शाम को ही सैंज में बिजली चली गई थी। दो दिन धारासार बरसात होती रही। राज्‍य में रेड अलर्ट था। 10 जुलाई को एनएचपीसी की पार्वती परियोजना के दफ्तर में अधिकारियों ने बांध के गेट खोलने के निर्देश दे दिए। एक ओर गेट खोले जा रहे थे, दूसरी ओर छोटे वाले माइक से चेतावनी की मुनादी की जा रही थी जिसकी आवाज बारिश में कहां तक पहुंची होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। पार्वती से थोड़ा ऊपर हिमाचल बिजली विभाग की भी एक परियोजना है। वहां के कर्मचारी खा पीकर उस दिन आराम कर रहे थे। उधर बांध ओवरफ्लो कर गया। गेट में गाद जम गई। जैक लगाकर गेट खोलने पड़े। दोनों बांधों से पानी हहरा कर आया और पूरे सैंज बाजार को बहा ले गया। 

कुल्लू के सैंज में भूस्खलन से ढहे मकान-दुकान

कुल्लू के सैंज में भूस्‍खलन से ढहे मकान-दुकान

विडम्‍बना है कि शनिवार से लेकर मंगलवार यानी 11 जुलाई तक जितनी भी तस्‍वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर शाया हुए, उनमें सैंज का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। केवल मंडी और मनाली में बह गए पुलों और कारों की तस्‍वीरें थीं। सैंज की खबर बुधवार को सामने आई। चार दिन बाद किसी तरह बिजली आई। पीडब्‍ल्यूडी मंत्री के दौरे के बाद सैंज-औट मार्ग बहाल हो सका। लोगों का आरोप है कि बांध का पानी छोड़ने से पहले कोई चेतावनी नहीं दी गई थी। फिलहाल आंकड़ा यह है कि यहां 40 मकान और 30 दुकानें बही हैं, लेकिन ये केवल वे हैं जो मुआवजे के हकदार हैं वरना 150 के करीब दुकानें बह चुकी हैं। पूरा बाजार  ही खत्‍म हो गया है।

मानसून से मौतें

सोलन से लेकर कुल्‍लू तक तबाही के और भी मंजर धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं, लेकिन हफ्ते भर बाद भी राज्‍य सरकार के पास मारे गए लोगों, लापता लोगों और पीड़ितों की कोई औपचारिक सूची नहीं थी। कुल्‍लू के वरिष्‍ठ पत्रकार धरम चंद यादव 17 जुलाई की शाम सैंज का दौरा करके लौटे थे। उन्‍होंने पुलिस महकमे से नुकसान की सूची मांगी थी, जो नहीं मिली क्‍योंकि वह थी ही नहीं। ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की संयोजक विद्या नेगी ने आउटलुक को बताया कि हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। खबर लिखे जाने तक मारे गए लोगों की संख्‍या 117 बताई गई थी। इस बीच लार्जी बांध पूरी तरह से बंद पड़ा है। इसके अलावा सतलुज पर बनी नाथपा झाकड़ी और रामपुर परियोजना भी गाद आ जाने के कारण ठप थी। संपर्क मार्ग टूट जाने के चलते निउली, शाकतीमरोड़, शामती जैसे सुदूर गांवों में मकानों और सड़कों के बहने की सूचना धीरे-धीरे आ रही है।

‘विकास’ का मलबा

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार बारिश ने हिमाचल में रिकॉर्ड तोड़ दिया है। सामान्‍य से 200 प्रतिशत ज्‍यादा पानी गिरा है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि तबाही पानी से नहीं, पानी के साथ आए मलबे से हुई है। जब पानी में रोड़ी, मिट्टी, बजरी, पत्‍थर का मलबा मिल जाता है तो उसकी मात्रा, गति और प्रवाह कई गुना बढ़ जाते हैं। आउटलुक ने हिमाचल में जिन लोगों से भी बात की, हर व्‍यक्ति यह बात अपने तजुर्बे से कह रहा है कि अप्रत्‍याशित बाढ़ और नुकसान के पीछे मलबा है। कहां से आया यह मलबा? फोर लेन सड़कों के बनने से, बांधों से, पनबिजली परियोजनाओं से, बस स्‍टैंड के निर्माण से। यह मलबा नदी-नालों में डाल दिया गया या उनके किनारे डम्‍प कर दिया गया। पानी बरसा तो सब एक साथ मिलकर जनजीवन को बहा ले गया। 

हिमाचल के लोग दो दशक से मलबे के मनमाने निस्‍तारण को देखते आ रहे हैं। सरकार को भी यह पता है। संबंधित विभागों की जानकारी में भी यह समस्‍या है। बिलासपुर जिले में फोर लेन विस्‍थापित एवं प्रभावित समिति के मदनलाल शर्मा ने इसी 18 मार्च को प्रशासन से शिकायत की थी कि किरतपुर नेरचौक फोर लेन और टू लेन के निर्माण से निकल रहे मलबे की अवैध मक डम्पिंग की जा रही है। इस शिकायत पर 25 मार्च को मत्‍स्‍य अधिकारी, संरक्षण ने निरीक्षण कर के शासन को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि “फोर लेन सड़क के निर्माण कार्य से गोविंदसागर जलाशय में डम्पिंग हुई है... टू लेन सड़क के निर्माण कार्य से मंडी भराड़ी से जबली तक बरसाती नालों में डम्पिंग की गई है जो कि बरसात में पानी के साथ सीधे गोविंदसागर जलाशय में जाएगी।”

लाल किले के पीछे रिंग रोड पर यमुना का पानी, बरसों पहले नदी यहीं से बहा करती थी

लाल किले के पीछे रिंग रोड पर यमुना का पानी, बरसों पहले नदी यहीं से बहा करती थी

हर सरकारी चेतावनी की तरह इस निरीक्षण रिपोर्ट को भी फाइलों में डम्‍प कर दिया गया। यही दो दशक से हो रहा है। किन्‍नौर के हिम लोक जागृति मंच के कागजात बताते हैं कि 2005 में ही राज्यस्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन व परिवीक्षा समिति ने करच्छम-वांगतू परियोजना का निर्माण कर रही जेपी कंपनी को निर्देश दिए थे कि वह 2000 में आई बाढ़ के मद्देनजर किसी तरह की मॉक डम्पिंग न करे और न ही कोई निर्माण कार्य किया जाए। इस निर्देश की धज्जियां उड़ाते हुए सरकारी व सेना की जमीन पर कंपनी लगातार मॉक डम्पिंग करती रही। इस इलाके में कभी बाढ़ आई, तो इस मलबे के बहने से गांव के गांव बह जाएंगे। ऐसी त्रासदी हिमाचल के सोलन में 2008 में देखने में आई थी जिसके लिए जेपी कंपनी ही जिम्मेदार थी।

करच्छम-वांगतू परियोजना में जेपी कंपनी को खनन के लिए कोई भी प्रमुख खदान मंजूर नहीं की गई थी। इस कारण कंपनी रेता, पत्‍थर व बजरी नदी किनारे से तथा सुरंगों से निकाले गए मलबे से प्राप्त कर रही थी। सुरंगों से निकाले गए मलबे से बजरी आदि कंपनी तैयार करती है, तो कंपनी को उसके लिए सरकार और संबंधित ग्राम पंचायतों को रॉयल्टी देने का प्रावधान है। इसके उलट कंपनी ने न तो इसके लिए सरकार से कोई इजाजत ली और न ही कोई रॉयल्टी दी। बाद में करच्छम-वांगतू परियोजना का मालिकाना बदला और जेपी से वह जिंदल के हाथ में चली गई, लेकिन अवैध डम्पिंग की समस्‍या कायम रही।

मयूर विहार की मेट्रो लाइन और यमुना के खादर में डूबी झोंपड़ी

किरतपुर-मनाली फोर लेन के खिलाफ हाइकोर्ट और एनजीटी में याचिका डालने वाले पूर्व सैनिक मदनलाल शर्मा बताते हैं कि इस सड़क की जांच पांच साल से अटकी हुई है। वे कहते हैं, “एक तो भाखड़ा से विस्‍थापित हुए लोग अब जाकर किसी तरह सेटल हुए थे, तो अब फोरलेन आ गई। जिन लोगों ने डम्पिंग आदि का विरोध किया, उन पर निर्माण करने वाली गावर कंपनी ने धारा 353 के मुकदमे लाद दिए। 2014 से ये केस चल रहे हैं।”

देश के कोने-अंतरों में निजी कंपनियों द्वारा सीधे लोगों पर किए जाने वाले ऐसे मुकदमों की सूचना बाहर नहीं आ पाती। मसलन, आज से 13 साल पहले की एक दिलचस्‍प घटना हिमाचल के बिलासपुर में ही घटी थी जहां सोलन में जेपी सीमेंट के अवैध संयंत्र के खिलाफ कुछ कार्यकर्ताओं और वकीलों ने मुकदमा किया था। संयंत्र से होने वाले जान-माल के नुकसान के खिलाफ लंबा संघर्ष चला। नतीजा यह निकला कि वादी और उसके 19 साथियों के राष्ट्रीय राजमार्ग 21 पर से गुजरने पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया। इनमें एक सज्‍जन थे वकील भगत सिंह, जिन्‍होंने 2009 में बिलासपुर में यह कहानी सुनाई थी जब पहली बार हिमाचल प्रदेश के तमाम एक्टिविस्‍ट हिमालयी संसाधनों पर साझा नियंत्रण और अधिकार जताने के लिए 9 अप्रैल को वहां हिम नीति अभियान के बैनर तले ‘हिमालय बचाओ रैली’ में इकट्ठा हुए थे।

हिमालय के लिए एक साझा ‘मॉडल’

हिमाचल के दस परियोजना प्रभावितों को साथ लाने वाले इस अनूठे कार्यक्रम में यह साफ समझ बनी थी कि नवउदारवादी विकास के मौजूदा मॉडल में सरकारें बदल कर पर्यावरणीय दोहन और विनाश का हल नहीं निकाला जा सकता। यही वह समय था जब महज साल भर पहले उत्‍तराखंड के जन संगठनों ने 2008 को ‘नदी बचाओ वर्ष’ घोषित किया था और नदी बचाओ पदयात्राएं निकाली थीं। उत्‍तराखंड के जन आंदोलनों के गार्जियन रहे लोक गीतकार गिरीश तिवाड़ी ‘गिरदा’ ने उस समय कंपनियों के खिलाफ मशहूर गीत गाया:

 सारा पानी चूस रहे हो, नदी समंदर लूट रहे हो

खेल तुम्‍हारा तुम्‍हीं खिलाड़ी, कंकड़-पत्‍थर कूट रहे हो

उफ! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी

जिस दिन डोलेगी ये धरती, सर से निकलेगी सब मस्ती

महल-चौबारे बह जाएंगे, खाली रौखड़ रह जाएंगे

बूंद-बूंद को तरसोगे जब, बोल व्यापारी तब क्या होगा? नगद-उधारी तब क्या होगा?

आज भले ही मौज उड़ा लो, नदियों को प्यासा तड़पा लो / गंगा को कीचड़ कर डालो

लेकिन डोलेगी जब धरती- बोल व्यापारी तब क्या होगा? विश्व बैंक के टोकनधारी- तब क्या होगा? योजनकारी- तब क्या होगा?

2008 में उत्‍तराखंड में ‘नदी बचाओ’ से 2009 में हिमाचल में ‘हिमालय बचाओ’ रैली तक हिमालयी विकास के प्रारूप पर समझदारी तकरीबन एकसम हो चुकी थी। 2010 में हिमाचल के किन्‍नौर में इन दोनों प्रक्रियाओं का समागम हुआ, जब 5 जून को पर्यावरण दिवस पर ‘विकास के बुलडोजर से हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाओ’ के नाम से देश भर के दो सौ से ज्‍यादा संगठन, संस्‍थाएं, अभियान और आंदोलन रेकांग पिओ में हिमालय नीति अभियान के आह्वान पर साथ आए। एक समझ कायम हुई कि सरहदों में बंटकर पर्यावरणीय सवालों को हल नहीं किया जा सकता। यही वह बुनियादी समझदारी है जो बीते कुछ वर्षों के दौरान एक बार फिर गायब होती दिख रही है।

हिमालय नीति अभियान के अध्‍यक्ष पर्यावरणविद कुलभूषण उपमन्‍यु बताते हैं कि 1994 में जब टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन चल रहा था तब पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने एक बैठक बुलाई थी और हिमालय बचाओ आंदोलन का एक परचा निकाला था। उसमें विकास के मॉडल पर बात हुई थी। इससे भी पहले योजना आयोग ने एसजेड कासिम की अध्‍यक्षता में एक पैनल बनाया था और 1992 में उसने अपनी एक रिपोर्ट हिमालयी पारिस्थितिकी में विकास पर सरकार को सौंपी थी।

आउटलुक से बातचीत में उपमन्‍यु कहते हैं, “उस समय शांता कुमार मुख्‍यमंत्री थे। रिपोर्ट डम्‍प हो गई। फिर तो भाजपा की सरकार आ गई। योजना आयोग खत्‍म कर के नीति आयोग बना दिया गया। उसने एक हिमालयन रीजनल काउंसिल बनाई। उसके अध्‍यक्ष डॉ. सारस्‍वत थे। उसकी सिफारिशों का क्‍या हुआ, कुछ अता-पता नहीं है। सरकारें अब किसी आपदा की स्थिति में फायरफाइटिंग का तरीका अख्तियार कर रही हैं। कायदा यह होना चाहिए कि आग ही मत लगने दो। अगर जरूरत सामरिक हो, तो फंडिंग ठीक से करो।”

‘पाइपलाइन’ वाला तंग नजरिया

उपमन्‍यु कहते हैं, “हिमालय की आपने उपेक्षा की, अब दिल्‍ली का बाजा बजा हुआ है। बाढ़ आएगी तो ये थोड़ी देखेगी कि कोई कांग्रेसी है या भाजपाई।” पानी, पहाड़, नदी, जंगल आदि के मसलों पर केंद्र और राज्‍य या राज्‍यों के बीच की पार्टीबाजी वाली लड़ाई एक बड़ी अड़चन है जो समस्‍या को समग्रता में देखने से रोकती है, समाधान तो दूर की बात है। इसका ताजा उदाहरण दिल्‍ली की बाढ़ है जिसके लिए दिल्‍ली की सरकार ने हरियाणा सरकार को पानी छोड़ने का दोषी ठहराया है।

आउटलुक से बातचीत में पर्यावरणविद डॉ. गोपाल कृष्‍ण इस समस्‍या को परिप्रेक्ष्‍य में रख कर समझाते हैं। वे कहते हैं कि नदियों को अपनी पाइपलाइन की तरह काट कर देखना, नदी और पहाड़ को अलग-अलग देखना, नदी और घाटी को अलग-अलग देखना, गंगा और यमुना को अलग-अलग देखना, यह नजरिया अंग्रेजों का दिया हुआ है। इसी तरह हिमालय को केवल भारत के नजरिये से देखने का भी कोई मतलब नहीं, उसे समूचे हिमालयी क्षेत्र के हिसाब से बरतना होगा।

इस साल यमुना में आई अप्रत्‍याशित बाढ़ के कारण गिनाते हुए डॉ. गोपाल कृष्‍ण नदी के साथ हुई मानवीय छेड़छाड़ को गिनाते हैं। आर्थिक प्रगति के नाम पर यमुना को अपने स्रोत यमुनोत्री से लेकर वजीराबाद तक ऐतिहासिक रूप से कई हस्तक्षेपों का सामना करना पड़ा है। यमुना में पहला हस्तक्षेप 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह तुगलक द्वारा किया गया था जब उसने यमुनानगर में ताजेवाला नहर बनाई थी। फिर 1830 में वहां ताजेवाला बैराज का निर्माण किया गया और बाद में एक बांध का निर्माण भी।

वे कहते हैं, “यमुना में मानव हस्तक्षेप के 600 से अधिक साल हो गए हैं, लेकिन हम अभी तक नदी के पानी की गुणवत्ता और मात्रा के बीच संबंध को समझ नहीं पाए हैं। हमारी नदियों में पानी की गुणवत्ता के बारे में हमारी समझ को विकृत करने वाला असल दोष नदी घाटियों का परस्पर संबंध है। गंगा और यमुना नदी बेसिन का चालीस प्रतिशत हिस्सा साझा है। इसलिए यमुना को बचाने की किसी भी बात को अनिवार्य रूप से गंगा बेसिन के संदर्भ में बरता जाना चाहिए। कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां हमें यमुना में अधिक और गंगा में कम पानी मिलता है। इसलिए गंगा जलग्रहण क्षेत्र के संदर्भ में यमुना को देखना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों घाटियों के बीच कोई सीमांकन रेखा नहीं है।”

वे कहते हैं कि हमारी सरकारें नदियों को पक्षपातपूर्ण तरीके से देखने की आदी हैं। यमुना को सरकारें पाइपलाइन के रूप में देखती हैं। दिल्ली यमुना के अपने विस्तार से चिंतित है, उत्तराखंड अपने हिस्‍से में और हरियाणा और राजस्थान अपने-अपने हिस्‍से को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने यमुना को क्षेत्रीय सीमाओं में विभाजित कर दिया है।

वे बताते हैं, “इस दृष्टिकोण को पहली बार चीन में मेकांग घाटी द्वारा अपनाया गया था जो नदियों को पूर्णता में देखता है। भारत में भी समाधान मेकांग नदी घाटी में अपनाए गए नदी बेसिन दृष्टिकोण में निहित है जो एक नदी को उसकी पूर्णता में देखने की कोशिश करता है। जब जयराम रमेश केंद्रीय पर्यावरण मंत्री थे, तब आइआइटी ने गंगा नदी बेसिन मास्टर प्लान तैयार किया था। इस संयुक्त अध्ययन ने गंगा नदी बेसिन के सिर्फ 79 प्रतिशत हिस्से को संबोधित किया और वैध तर्कों के साथ उन्होंने जो कुछ भी स्वीकार किया था, उसे व्यावसायिक मजबूरियों के नाम पर निष्कर्ष में खारिज कर दिया गया।”

स्‍मृति से सबक

योजना आयोग की 1992 की रिपोर्ट हो चाहे नदियों पर आइआइटी की रिपोर्ट या स्‍थानीय स्‍तर पर नदियों में डम्पिंग की निरीक्षण रिपोर्ट, सभी मलबे की तरह कारोबारी मुनाफे की नदी में डम्‍प कर दी जाती हैं। कुलभूषण उपमन्‍यु के अनुसार इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि “ठेकेदारों के हाथों में सारी गवर्नेंस है।’’ इसके उलट, जहां कहीं लोगों के आंदोलन जिंदा हैं, वहां उन्होंने अपने जंगल, जमीन, पहाड़ को बचा लिया है। आज जो ब्यास नदी में बाढ़ आई है उसमें सबसे कम नुकसान तीर्थन घाटी में हुआ है क्योंकि यहां के लोगों ने आंदोलन खड़ा कर के नौ पनबिजली परियोजनाओं को सरकार से रद्द करवा दिया था। 

जहां आंदोलन नहीं हैं, वहां समाज की सामूहिक स्‍मृति उम्‍मीद जगाती है। मसलन, दिल्‍ली की बाढ़ में पहली बार कई लोगों को यह बात एक साथ याद आई है कि यमुना नदी अपना रास्‍ता वापस मांग रही है। इसी तरह हिमाचल के लोगों को तबाही के बाद इस बात का अहसास हुआ है कि बाढ़ की विभीषिका में कुछ योगदान उनका भी है। उपमन्यु इस संदर्भ में लगातार बढ़ रहे उपभोक्तावाद और लालच को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह अहसास अपने आप में किसी सुखद बदलाव की शुरुआत हो सकता है, बशर्ते इसके साथ योजना और नीति की दृष्टि समग्र हो।      

डॉ. गोपाल कहते हैं, “एकमात्र समाधान यही है कि हम अपनी सभी नीतियों- भूमि नीति, जल नीति, कृषि नीति, वन नीति, परिवहन नीति– को नदी बेसिन को केंद्र में रखते हुए तैयार करें। जब तक आप नदी बेसिन को केंद्रीय नीति निर्माण के मूल में नहीं रखते तब तक कुछ भी हल नहीं किया जा सकता है।” बेशक, प्रकृति के कोप से बचना है तो न सिर्फ पहाड़, नदी, निर्माण, बसावट सबके बारे में नए सिरे सोचना होगा।

मध्य हिमालय में बाढ़ और भूस्खलन का इतिहास

ब्यास का उफानः कुल्लू में ब्यास नदी के किनारे बनी सड़क पर कटान

ब्यास का उफानः कुल्लू में ब्यास नदी के किनारे बनी सड़क पर कटान

1868: बड़े भूस्खलन के कारण उत्तराखंड की बिरही नदी की उपधारा बाधित हो गई और एक  नकली झील बन गई। झील के फटने और बाढ़ आने से 75 लोग मारे गए।

1880: नैनीताल में भूस्खलन में 151 लोगों की मौत, जिनमें 42 अंग्रेज थे। इसी साल शारदा  नदी में आई बाढ़ में ब्रह्मपुर शहर डूब गया, यहीं पर बाद में टनकपुर बसा।

1894: बिरही नदी से बनी गौना झील फटने से चमोली, कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग, श्रीनगर और  देवप्रयाग के निचले हिस्से डूब गए।

1951: भारी बारिश और बादल फटने से उत्तराखंड की नयार नदी उफान पर आ गई। इसमें 20 बसें बह गईं जिनमें 100 से ज्यादा सवारियां थीं।

1967: लगातार बारिश के कारण उत्तराखंड का नानक सागर बांध टूट गया जिसमें 35 गांव बह गए और 80 लोग मारे गए।

1970: 76 साल बाद बिरही नदी भूस्खलन के कारण फिर से उफान पर आई जिससे बेलाकुची की बसाहट बह गई और 70 से ज्यादा लोग मारे गए।

1977: उत्तराखंड के तवाघाट और उसके आसपास के गांवों में भारी बारिश के कारण 44 लोग मारे गए जिसमें आइटीबीपी के 25 कर्मी भी थे।

1979: भारी भूस्खलन से चमोली में मंदाकिनी घाटी में 50 लोग मारे गए

1980: उत्तरकाशी के पास ग्यांंसू गांव में 45 लोग भूस्खलन मे मारे गए। इसी साल उत्तरकाशी गंगोत्री हाइवे पर भूस्खलन में 15 सरकारी कर्मचारी मारे गए।

1983: कुमाऊं के बागेश्वर में बादल फटने से कपकोट ब्लॉक के कर्मी गांव में तबाही आई, 37  लोगों की मौत हो गई।

1990: ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला के पास भूस्खलन से 100 से ज्यादा तीर्थयात्रियों की मौत हुई।

1998: बादल फटने से रूद्रप्रयाग के उखीमठ के दर्जन भर से ज्यादा गांव तबाह हो गए, 109 लोग मारे गए।

1998: कैलाश मानसरोवर के नीचे जबरदस्त भूस्खलन के कारण 169 तीर्थयात्री मौके पर ही दफन हो गए।

2009: समूचे उत्तरराखंड में भूस्खलन, बाढ़ आदि घटनाओं में 70 से ज्यादा लोग मारे गए।

2013: 2004 की सूनामी के बाद उत्तराखंड में बादल फटने से आई इस बाढ़ को सबसे बड़ा हादसा माना जाता है जिसमें चार राज्य प्रभावित हुए और 6000 से ज्यादा लोग मारे गए। केदारनाथ में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

2021: चमोली में हुए भारी भूस्खलन से ऋषिगंगा, धौलिगंगा और अलकनंदा में फरवरी में बाढ़ आ गई।  माना जाता है कि 200 से ज्यादा लोग मारे गए या लापता हो गए।

2023:  जोशीमठ में एनटीपीसी की परियोजना के चलते भू-धंसाव से कई मकानों में दरार, पलायन। मानसून में भारी बारिश से हरिद्वार जलमग्न। केदारनाथ कई दिन बंद रहा।

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