प्रसिद्ध शायर, गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने अपनी 81वीं सालगिरह (17 जनवरी) मनाई
हिंदी फिल्मों के पटकथा, संवाद लेखक जावेद अख्तर ने हाल में इक्यासी वसंत पार किया और उम्र के इस मुकाम पर, बकौल उनके, वे अपनी कामयाब मंजिलों से आगे बढ़कर नई दिशा की तलाश में हाल ही में प्रसिद्ध शायर, गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने अपनी 81वीं सालगिरह (17 जनवरी) मनाई। जावेद अख्तर ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई है। ग्वालियर में जन्मे जावेद अख्तर ने अपने लेखन से भारतीय सिनेमा को बहुत समृद्ध किया है। शोले, दीवार, जंजीर, डॉन, मिस्टर इंडिया और लगान से ही उनके लेखन का परिचय मिल जाता है। उन्हें पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पद्मश्री और पद्म भूषण सम्मान मिल चुके हैं। हर उम्र और हर दौर के लोगों के अजीज शायर प्यार, दर्द और जिंदगी के सच को सरल शब्दों में बयां करते रहे हैं। जादूनामा नाम से उनकी जीवनी लिखने वाले अरविन्द मण्डलोई से उन्होंने अपने जीवन के कई अनजान किस्से बयां किए
पापा बूढ़े मत होना
‘‘जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, तुम मेरा खयाल रखोगे?’’
‘‘हां, बिल्कुल।’’
‘‘तुम मेरे लिए क्या करोगे?’’
‘‘मैं आपके लिए सिगरेट लाऊंगा।’’
‘‘पैसे कहां से लाओगे?’’
‘‘मम्मी से ले लूंगा।’’
‘‘मम्मी को पैसे मैं देता हूं। अगर मैं नहीं कमाऊंगा, तो मम्मी के पास पैसे कहां से आएंगे?’’
वह बहुत घबरा गया। कुछ देर सोचने लगा। फिर उसने अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया और कहा, ‘‘पापा, बूढ़े मत होना।’’
चार साल का फरहान चाहता था कि उसके पिता जावेद अख्तर कभी बूढ़े न हों। आज जब वे 81 बरस के हो गए हैं, तब अक्सर यह बातचीत याद करते हैं। वे कहते भी हैं कि ‘‘बुढ़ापा आदमी से दस बरस आगे चलता है।’’
पहला कॉन्ट्रैक्ट
1960 का दशक। जावेद अख्तर याद करते हैं, उस जमाने के बॉम्बे में अवैध मयखानों के नाम ‘आंटी का अड्डा’ हुआ करते थे। एक पैग 50 पैसे में मिलता था। लोग ठर्रे (देशी शराब) का आनंद उठाने आंटियों के अड्डे पर जाया करते थे। उन दिनों बांद्रा की एक इमारत में ग्राउंड फ्लोर पर दो कमरे का बेली सेठ का अड्डा हुआ करता था। करीब 40 बरस के बेली सेठ कुर्ता-पायजामा पहनते थे। उनकी शख्सीयत बहुत आला थी। उनके यहां दो जवान लड़के काम करते थे, जो शाम होते ही रिंदों के साकी हो जाया करते थे। सुभाष घई, शत्रुघ्न सिन्हा, कैमरामैन के.के. महाजन और सुदर्शन नाग के अलावा मणि कौल भी यहां नियमित रूप से आते थे। बेली सेठ हमें उधार दे दिया करते थे, जो दुनिया में कहीं और मुमकिन न था। जब हमारे पास पैसे आते, तो हम कर्ज अदायगी कर देते थे। सेठ पीने के बड़े शौकीन थे और सोचा करते थे कि वे किसी दिन एक फिल्म बनाएंगे, जिसका म्यूजिक वे ही देंगे। उन्हें लगता था म्यूजिक में उन्हें महारत हासिल है। हमारे पास जब पैसे नहीं होते थे और हमें पीने का मन करता था, तो हम उन्हें मस्का लगाते, बेली सेठ बहुत दिनों से कोई नई ट्यून नहीं सुनाई आपने? वे जवाब देते, ‘‘देखो यार, धंधे की वजह से भेजा खराब हो गया है, कुछ माइंड में नहीं आता।’’ वे कुछ देर खामोश रहते और फिर अपने नौकर को हारमोनियम लाने के लिए आवाज देते। हम सब फाकामस्ती की कगार पर होते थे। हम उनकी तारीफों का पुल बांध देते थे और कहते, वाह, वाह! क्या बात है! क्या धुन है बेली सेठ! अद्भुत! ये म्यूजिक एक बार आ गया तो आग की तरह फैलेगा। सेठ भावुक हो जाते और कहते, ‘‘आप जानते हैं धर्मेंद्र यहीं आया करते थे और राजकुमार भी। जब लोग अमीर और मशहूर हो जाते हैं वे सबको भूल जाते हैं। आप लोग भी यही करोगे।’’
बेली सेठ को पता था मैं संघर्ष कर रहा हूं। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘तू मेरी पिक्चर का डायलॉग लिखेगा?’’ मैंने जवाब दिया, बेली सेठ, आपने अगर किसी और को काम दिया तो मेरा दिल टूटेगा। उन्होंने बेली प्रोडक्शन के लेटरहेड पर मुझसे दस्तखत करवाया कि एक दिन मैं उनकी फिल्म के डायलॉग लिखूंगा। उन्होंने मेरे सिग्नेचर देखे और अपने नौकर से कहा, ‘‘इस कागज को हिफाजत से रख दो और जावेद के लिए नया पैग लाओ।’’ बतौर डायलॉग राइटर यह मेरा पहला कॉन्ट्रैक्ट था, जिसे मैंने साइन किया था।
फिर तो सभी जानते हैं कि जावेद अख्तर जंजीर के बाद सलीम-जावेद के रूप में कामयाब राइटर हो गए थे।
किस्सा कामयाबी का
नासिर हुसैन ने यादों की बारात पूरी होने पर एक पार्टी रखी थी। उस पार्टी में एक निर्माता मिले। उन्होंने कहा, ‘‘जावेद, अगर कोई कहानी है, तो सुनाओ, मैं एक अच्छी कहानी की तलाश में हूं।’’ मैंने कहा, हमारे पास पटकथा, डायलॉग और सारी चीजें लिखी हुई रखी हैं। परेशानी यह है कि हमें कोई उतना पैसा नहीं दे रहा, जितना हम मांग रहे हैं। निर्माता ने कहा, ‘‘पैसे की दिक्कत नहीं है, मुझे बस एक अच्छी कहानी चाहिए। कल मेरे दफ्तर आकर मुझे कहानी सुना जाओ।’’ मैं निर्माता के दफ्तर पहुंचा और कहानी शुरू करने से पहले कहा, मैं रिलीज होने से पहले एक रुपया लेना नहीं चाहता। मैं पटकथा का रेट अभी बता देता हूं। अगर आपको कहानी पसंद आई और बाद में मैंने दाम बताए, तो आप कहेंगे कि कहानी आपको पसंद आ गई है इसलिए मैं दाम बढ़ा कर बता रहा हूं। तब निर्माता ने पूछा, ‘‘रेट क्या है?’’ दो लाख, मैंने सपाट ढंग से जवाब दिया। निर्माता ने घंटी बजाई और अपने नौकर को कहा कि दूसरे कमरे में बैठे उनके पार्टनर को बुला लाए। पार्टनर के कमरे में आने के बाद निर्माता ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘जो तू मेरे को बोला, इसको भी बोल। एक स्क्रिप्ट के दो लाख रुपये। और वे दोनों ठहाके लगाने लगे।’’
फिर एक समय ऐसा भी आया, जब सलीम-जावेद ने कथा-पटकथा की कीमत किसी स्टार से ज्यादा ली और निर्माताओं ने दी।
पटकथा-सा सफर
संघर्ष के दिनों में मैं कमाल स्टूडियो के अंदर सोता था। वहां एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरा बना था। उस चबूतरे पर मेरे अलावा और भी लोग सोते थे। कमाल स्टूडियो के पास एक पान-बीड़ी की दुकान थी। एक बार दुकान पर कुछ काम चल रहा था। वहां मैं एक अनजान आदमी से मिला, जो लुंगी अैर गंजी पहने हुए था। वह सिगरेट खरीदने आया था। उसने बताया कि वह पास के बंगले में रहता है। फिर दुकान पर हम अक्सर मिलने लगे। मैं कभी-कभी उसको अपनी शायरी सुना दिया करता था। वे सी ग्रेड की फिल्में बनाया करते थे। एक दिन उन्होंने कहा, ‘‘बेटे, बारिश का मौसम आने वाला है। आपके लिए यहां सोना ठीक नहीं। आप मेरे घर के बरामदे में सो सकते हैं। मैं नौकर को बता दूंगा।’’ मैंने दिल से उनका शुक्रिया अदा किया। जब भी बारिश होती, मैं उनके बरामदे में सो जाया करता था। जब मेरे एक दोस्त ने मुझे रहने की जगह दे दी तो मैं वहां चला गया और फिर मेरा उनसे कभी मिलना न हुआ।
लंबे अरसे बाद, शबाना और मुझे जुहू में जानकी कुटीर से एक दोस्त के घर जाना था। मैंने अपने ड्राइवर को किसी काम से कहीं भेज दिया था। सो, हम दोनों ने टैक्सी ली। रात हो चली थी। अचानक टैक्सी ड्राइवर ने मुझसे कहा, ‘‘जावेद, तुमने मुझे पहचाना नहीं।’’ मैंने पीछे देखने वाले शीशे में ड्राइवर का चेहरा देखा। वह दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग आदमी था। मैंने माफी मांगते हुए कहा, रोशनी जरा कम है, तो मैं पहचान नहीं पा रहा। फिर उन्होंने अपना नाम बताया। वे वही शख्स थे, जिन्होंने मुझे अपने घर के बरामदे में सोने की जगह दी थी। उन्होंने कहा, ‘‘बड़ी खुशी होती है, जब अखबार या मैग्जीन में तुम्हारे बारे में पढ़ता हूं। अच्छा लगता है। मुझे तो पहले से ही तुमसे उम्मीद थी।’’ सारी यादें तस्वीर बन कर सामने से गुजरने लगीं। मुझे घबराहट होने लगी कि मैं उन्हें पैसे कैसे दूंगा। कृतज्ञता की वजह से मेरे हाथ-पैर फूलने लगे। मैं इतनी भी हिम्मत नहीं जुटा पाया कि उनसे पूछ सकूं कि वे टैक्सी क्यों चला रहे हैं, क्या उनका घर जाता रहा। मैं उस वक्त अजीब महसूस कर रहा था। टैक्सी से नीचे उतर कर मैंने कहा, मीटर क्या बोल रहा है। मुझे अंदाजा हो गया कि वे पैसे की बात करते झेंप रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘नहीं बेटा, भूल जाओ। पैसा फिर कभी लूंगा तुमसे।’’
वह सफर उनकी जिंदगी में किसी फिल्मी कथा-पटकथा की तरह गुजरा।
उम्र के इस मुकाम पर वे अपनी कामयाब मंजिलों को छोड़कर नई दिशा की तलाश में है। हाल ही में शबाना से बात करते हुए वे याद कर रहे थे कि यह उनकी जिंदगी का सबसे कामयाब दौर है। इतनी दौलत और शोहरत उन्हें अपने पूरे करियर में नहीं मिली। उम्र के पड़ाव भले ही बीतते जा रहे हों, लेकिन सफर अब भी जारी है।
