केरल के एक सरकारी अस्पताल ने अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था में छिपी नैतिक दुविधा के बीच एक नेपाली युवती की जान बचाई
अपर्णा उर्फ दुर्गा कामी (22) पिछले छह महीने से ज्यादा समय तक इस उम्मीद में जीती रहीं कि अंग प्रत्यारोपण से जुड़े सख्त नियम, जो स्थानीय लोगों, देश के नागरिकों और विदेशी नागरिकों के लिए अलग-अलग हैं, शायद मौत की कगार पर खड़े इंसान के लिए थोड़े शिथिल हो जाएं। उन्हें आखिरी स्टेज की हार्ट फेल्योर बीमारी थी। जैसे-जैसे समय उनके हाथ से फिसलता जा रहा था, उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी। नियम के अनुसार अंग प्रत्यारोपण में स्थानीय लोगों को पहले प्राथमिकता दी जाती है। सितंबर में जब उनका नंबर आया, तो एक स्थानीय मरीज के आ जाने से उनकी सर्जरी टल गई। उसके बाद उनकी उम्मीद लगभग टूटने लगी। छह महीने से भी ज्यादा लंबे इंतजार के बाद दुर्गा कामी को केरल के एक सरकारी अस्पताल में जगह मिली। वहां सफल हृदय प्रत्यारोपण के बाद अब वे धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही हैं। उन्हें यह दिल तिरुवनंतपुरम के ब्रेन-डेड मरीज से मिला। केरल हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नियमों में विशेष छूट के बाद उनकी यह सर्जरी संभव हो पाई।
कानून और नैतिकता
राज्य के किसी सरकारी जिला जनरल अस्पताल में किया गया पहला हृदय प्रत्यारोपण। इस मामले ने अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था में छिपी उस नैतिक उलझन को भी उजागर किया, जहां पहले राष्ट्रीयता को प्राथमिकता दी जाती है। अपने भाई के साथ नेपाल में एक अनाथालय में रहने वाली दुर्गा की मां की मौत भी दिल की बीमारी से हुई थी। करीब चार साल पहले दुर्गा कामी को भी सांस फूलने जैसी समस्याएं होने लगीं, जो गंभीर हृदय रोग की ओर इशारा कर रही थी।
डॉ. शाजन वर्गीज को उनके एक दोस्त ने उस अनाथालय के बारे में बताया, जहां कामी रहती थीं। डॉ. शाजन कहते हैं, “जब मैंने दुर्गा को देखा, तो समझ आ गया कि उनकी हालत गंभीर है। उन्हें कार्डियक सारकॉइडोसिस है।’’
डॉ. वर्गीज उन्हें एर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल लाए जहां हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी चल रही थी। मेडिकल जांच के बाद डॉक्टरों ने पाया कि उनका हृदय प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इसके बाद का इंतजार लंबा और बेरहम था। हर बार जब संभावित दिल के दान की खबर आती, तो उम्मीद जगती। लेकिन जैसे ही नियम लागू होते, उम्मीद इंतजार में बदल जाती।
सरहद से ऊपर इंसानियत
मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण नियम, 2014 (टीएचओटीए) के नियम 31(4)(ई) के तहत अंग आवंटन का क्रम साफ और तय है। राज्य सूची, क्षेत्रीय सूची, राष्ट्रीय सूची, भारतीय मूल के व्यक्ति और अंत में विदेशी नागरिक।
विदेशी नागरिकों के लिए सख्त प्रावधानों की जड़ें ‘ट्रांसप्लांट टूरिज्म’ से जुड़ी चिंता के कारण है। इन्हीं को देखते हुए, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत में प्रत्यारोपण के लिए आने वाले विदेशी नागरिकों को देश के कानूनों के बारे में जागरूक करने के कदम उठाए हैं। कुशल डॉक्टरों की वजह से भारत अंग प्रत्यारोपण का पसंदीदा गंतव्य बनता जा रहा है।
लेकिन अच्छे इरादों से बनाए गए इन नियमों-शर्तों का दुर्गा कामी के वास्तविक अनुभव से कोई लेना-देना नहीं है। अनाथ दुर्गा के पास मेडिकल टूरिज्म का कोई विकल्प ही नहीं था। वह केरल मरीज के तौर पर नहीं, बल्कि एक डॉक्टर की मानवीय पहल के चलते आई थीं। जैसे-जैसे समय बीतता गया और उनकी सेहत गिरती गई। इन सख्त नियमों में, दुर्गा के लिए करुणा की गुंजाइश बिलकुल नहीं थी।
आखिरकार न्यायिक हस्तक्षेप से उन्हें राहत मिली। इस हस्तक्षेप ने व्यवस्था को याद दिलाया कि कानून भले ही सीमाओं और श्रेणियों को पहचानता हो, लेकिन इंसानियत इन सब सरहदों से परे है।
अंततः सफल प्रत्यारोपण हुआ और दुर्गा कामी को नई जिंदगी मिली। उन्हें शिबू (46) का दिल मिला, जो कोल्लम के रहने वाले थे और ब्रेन-डेड घोषित किए गए थे। दिल को तिरुवनंतपुरम के सरकारी मेडिकल कॉलेज से निकालकर एर्नाकुलम पहुंचाया गया।
यह जटिल सर्जरी केरल की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह सर्जरी जनरल हॉस्पिटल के कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जॉर्ज वल्लूरन के नेतृत्व में की गई। इसके बाद एर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल देश का पहला ऐसा जिला अस्पताल बन गया है, जहां हृदय प्रत्यारोपण किया गया।
बढ़ती दाताओं की संख्या
दो महीने पहले कोच्चि के एक निजी अस्पताल में लगातार दो हृदय प्रत्यारोपण किए गए थे, जो केरल में अंग प्रत्यारोपण के बढ़ते रुझान को दिखाते हैं। केरल स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (के-एसओटीटीओ) के आंकड़ों के अनुसार, 2012 से 2024 के बीच राज्य में कुल 83 हृदय प्रत्यारोपण हुए। इनमें से 72 निजी अस्पतालों में और सिर्फ 11 सरकारी अस्पतालों में किए गए।