स्थानीय निकाय चुनावों में कासरगोड से मलप्पुरम तक कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ की निर्णायक जीत से उत्तरी केरल की तस्वीर बदली, वाम मोर्चा के गढ़ ढहे
वह दिन शायद केरल की राजनैतिक याददाश्त में लंबे समय तक रहे। उस दिन पूरे केरल में जाने-पहचाने रंग बदल गए। कई जिलों में लाल रंग की जगह नीला और हरा रंग छा गया। कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने उत्तर में वामपंथ के लंबे समय के गढ़ों को ढहा दिया। इस बदलाव से राज्य के राजनैतिक फिजा का साफ संदेश मिला। राज्य में दो चरणों में हुए 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में चुनाव आयोग के जारी आंकड़ों ने लोगों के मूड में इस बदलाव को दिखाया। कांग्रेस की अगुआई वाला यूडीएफ 38.81 प्रतिशत वोटों के साथ आगे रहा, जबकि माकपा के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) 33.45 प्रतिशत वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहा। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को 14.71 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बाकी 13.03 प्रतिशत वोट अन्य पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बंट गए।
स्थानीय निकायों के सभी स्तरों पर यूडीएफ ने बढ़त बनाई। पंचायतों, नगर पालिकाओं और निगमों में चुनावों में दबदबा बनाया। यूडीएफ ने 8,021 ग्राम पंचायत वार्ड, 1,241 ब्लॉक पंचायत वार्ड, 196 जिला पंचायत वार्ड, साथ ही 1,458 नगर पालिका वार्ड और 187 निगम सीटें जीतीं।
एलडीएफ के लिए नतीजे कुछ ज्यादा ही निराशाजनक रहे। हालांकि एलडीएफ 6,584 ग्राम पंचायत वॉर्ड, 928 ब्लॉक पंचायत वॉर्ड, 148 जिला पंचायत वॉर्ड, 1,103 नगर पालिका वॉर्ड और 126 निगम वॉर्ड जीतने में सफल रहा। इस बीच, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीएफ ने 1,448 ग्राम पंचायत वार्ड, 54 ब्लॉक पंचायत वॉर्ड, एक जिला पंचायत वॉर्ड, 324 नगर पालिका वॉर्ड और 93 कॉर्पोरेशन वॉर्ड में जीत हासिल करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
यूडीएफ को कुल 82,37,385 वोट मिले। पंचायतों में 39.17 प्रतिशत समर्थन (65,96,415 वोट), नगर पालिकाओं में 38.85 प्रतिशत (10,84,901), कॉर्पोरेशनों में 34.59 प्रतिशत (5,56,069)। एलडीएफ को 70,99,175 वोट मिले, जिसमें पंचायतों में 34.02 प्रतिशत (57,29,020), नगर पालिकाओं में 29.88 प्रतिशत (8,34,427) और कॉर्पोरेशनों में 33.67 प्रतिशत (5,35,728) शामिल हैं।
यूडीएफ ने कासरगोड नगर परिषद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा, जिसका श्रेय काफी हद तक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) को जाता है, जिसने स्थानीय निकाय चुनावों में 39 में से 24 वार्ड जीते। आइयूएमएल उम्मीदवारों ने सिविल स्टेशन, कुंबला, मंजेश्वरम और चेंगला के जिला पंचायत डिवीजनों में भी जीत हासिल की।
पूरे जिले में पैटर्न साफ था। कासरगोड नगर पालिका में यूडीएफ का दबदबा रहा, एनडीए दूसरे स्थान पर रहा और वाम मोर्चा सिर्फ एक सीट तक सिमट गया। नीलेश्वरम में एलडीएफ को मजबूत पकड़ मिली, जबकि कान्हांगड में यूडीएफ और एलडीएफ के बीच 20-20 की बराबरी रही।
कासरगोड नगर पालिका में यूडीएफ की 24 सीटों में 23 आइयूएमएल की हैं, जो उसकी निर्णायक भूमिका को दिखाता है। एनडीए पिछली परिषद की 14 सीटों से घटकर 12 पर आ गया, जबकि एलडीएफ ने अपनी मौजूदा स्थिति में मामूली सुधार करके एक से दो सीटें हासिल कीं। अपनी स्थापना के बाद से, कासरगोड नगर पालिका ज्यादातर यूडीएफ के हाथों में रही है, सिर्फ दो बार एलडीएफ के हाथों सत्ता गंवाई है। यूडीएफ को सबसे निर्णायक जीत में एक केरल की सबसे उत्तरी सीट मंजेश्वरम विधानसभा क्षेत्र में मिली, जहां उन्होंने सभी आठ पंचायतों, ब्लॉक पंचायत और सभी चार जिला डिवीजनों पर कब्जा कर लिया। खास बात यह है कि 2021 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने मंजेश्वरम से चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए थे।
कन्नूर जिले की नौ नगर पालिकाओं और कॉर्पोरेशनों में पलड़ा थोड़ा सा वाम मोर्चा की ओर झुका हुआ था। एलडीएफ पांच में आगे रही, जबकि यूडीएफ चार जीती। अंतुर में एलडीएफ का दबदबा रहा, उसने सभी 29 वॉर्ड जीते। इरिट्टी के 34 वार्डों में वाम मोर्चा ने 16 सीटें जीतीं, यूडीएफ 13 सीटों के साथ पीछे रही, जबकि एनडीए को चार और एक सीट अन्य को मिली, जिससे कोई भी मोर्चा 18 सीटों का बहुमत हासिल नहीं कर सका।
वायनाड में यूडीएफ ने स्थानीय निकाय चुनावों में सबका सूपड़ा साफ कर अपनी राजनैतिक मंशा जाहिर कर दी। पार्टी को जिला पंचायत, सभी चार ब्लॉक पंचायतों और जिले की तीन में से दो नगर पालिकाओं पर जीत हासिल हुई। 23 ग्राम पंचायतों में से 16 यूडीएफ के पक्ष में गईं, जबकि छह एलडीएफ के खाते में आई। कल्पेट्टा नगर पालिका जिले की एकमात्र सीट एलडीएफ के लिए राहत बनकर आई। जिला पंचायत का नतीजा निर्णायक था। 16 डिवीजनों में यूडीएफ को 15 और एलडीएफ को सिर्फ दो सीटें मिलीं।
कोझिकोड में भी एलडीएफ को थोड़ी राहत मिली। फिर भी इस जीत में हार का दर्द था। पहली बार एलडीएफ को वहां बिना पूर्ण बहुमत काम करना पड़ेगा। जबकि लंबे समय से मालाबार उसका गढ़ माना जाता रहा है।
मलप्पुरम जिले में यूडीएफ ने अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन किया। उसने नगर पालिकाओं, ग्राम पंचायतों, ब्लॉक पंचायतों और जिला पंचायत में एलडीएफ को निर्णायक रूप से हराया। मलप्पुरम में यूडीएफ ने पूरा नक्शा ही बदल दिया। हालात यह है कि यहां पहली बार मलप्पुरम जिला पंचायत बिना किसी विपक्ष के काम करेगी। यहां की सभी 33 सीटें यूडीएफ को मिलीं हैं। यूडीएफ को जिले की 12 नगर पालिकाओं में से 11 और 94 ग्राम पंचायतों में से 87 के साथ 15 ब्लॉक पंचायतों में से 14 पर जीत मिली है।
निलंबूर नगर पालिका पर 2020 में एलडीएफ ने कब्जा कर लिया था, लेकिन इस बार इस नगर पालिका पर वापस यूडीएफ का कब्जा हो गया है। यूडीएफ ने 26 वॉर्ड जीते, जबकि वाम को छह वॉर्डो पर जीत हासिल हुई है। चार वॉर्ड अन्य के खाते में गए हैं। बदलाव की यह लहर पी.वी. अनवर के विधायक पद से इस्तीफे देने के बाद ही शुरू हो गई थी। उनके इस्तीफे के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में एलडीएफ की हार के बाद वहां की राजनैतिक लहर का बदलाव देखा जा सकता था।
तीन दशक बाद एलडीएफ के नियंत्रण से पेरिंथलमन्ना निकल गया। 37 सदस्य परिषद में यूडीएफ ने 15 सीटें जीतीं, एलडीएफ को 14 मिलीं, जबकि निर्दलियों ने बाकी आठ सीटें हासिल कीं, जिनमें से ज्यादातर यूडीएफ के साथ थे।
यूडीएफ की जीत की वजहें
यह बदलाव सरकार से मोहभंग की कथा बता रहा है। कुंदारा के विधायक पी.सी. विष्णुनाथ बताते हैं कि मालाबार में सबरीमाला मुद्दे ने गहरी छाप छोड़ी। हालांकि यह मंदिर दक्षिण केरल में है, लेकिन एलडीएफ के कार्यकाल के दौरान मंदिर से सोने की चोरी के आरोपों से हिंदू नाराज हो गए।
लोकसभा चुनावों के बाद, मुस्लिम समुदाय में भी बेचैनी बढ़ गई। विष्णुनाथ कहते हैं, “मुख्यमंत्री की मलप्पुरम पर की गई टिप्पणियों से अलगाव का डर बढ़ गया। आलोचकों ने माकपा पर उदार हिंदुत्व की ओर बढ़ने और अपनी पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष छवि की कीमत पर हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।”
उत्तरी केरल में वामपंथी नेतृत्व से मोहभंग व्यापक है। जैसा कि कृषक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष माजूश मैथ्यू ने बताया, मुख्यमंत्री का एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लापल्ली नटेसन के साथ लगातार जुड़ाव, मुसलमानों के बारे में उनकी भड़काऊ टिप्पणियों के बावजूद, समाज के बड़े वर्गों को परेशान कर गया। मुसलमानों के केरल की प्रमुख आबादी बनने की नटेसन की चेतावनी ने आक्रोश पैदा किया, जिससे मुस्लिम लीग ने उन्हें ‘केरल तोगड़िया’ का नाम दिया।
मैथ्यू कहते हैं, “पहाड़ी क्षेत्रों में असंतोष गहरा था, जहां वन्यजीवों के खतरे ने रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानी बढ़ा दी है। प्रशासन की कथित उदासीनता और स्थानीय प्रयासों के प्रति उसके विरोध ने कभी-समर्थक रहे ईसाई समुदायों को भी वामपंथ के खिलाफ कर दिया।”
फिर वह पल आया जिसे, स्थानीय कई लोग ‘शफी असर’ कहते हैं। कोझिकोड के पेरम्ब्रा में केरल पुलिस का वडकरा के सांसद शफी परम्बिल पर हमले की गूंज हर जगह सुनाई दी। शफी पुलिस लाठीचार्ज के शिकार हुए थे। कोझिकोड जिले के कूराचुंडू के एक स्कूल शिक्षक प्रिंस एम. ने कहा, “लोगों ने इसे साफ-साफ राज्य सरकार का हमला माना।” वडकरा, पेरम्ब्रा, नाडापुरम और कुट्टियाडी में यूडीएफ की जीत ने उस मौन लेकिन निर्णायक प्रतिक्रिया को जाहिर किया।